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फ़िरोज़ खान कहे तो ‘प्रेम’ राहुल गांधी से कार्यकर्ता कहे तो ‘चमचाई’ झाड़ू लगाने तैयार थे ज्ञानी जैलसिंह कठिन होगी चमचाई की दुकानदारी* *वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी…

‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे’ ये बात किसी फिल्म में शर्मिला टैगोर से कार में घूमते हुए फ़िरोज़ खान ने कही थी।

यानि दिन को रात कहने को भी तैयार है बंदा। है न प्रेम की पराकाष्ठा…..। या फिर संभव है कि कार दहेज की हो, शर्मिला टैगोर के मायके से आई हो तो फिरोज खान नतमस्तक हो रहा हो।

बहरहाल… कारण चाहे कुछ भी हो पर पे्रम की पराकाष्ठा तो है न।

फिरोज़ खान शर्मिला टैगोर के आगे नतमस्तक है और अपन फिरोज़ खान के प्रेम की पराकाष्ठा के आगे….। सारे देश के प्रेमी प्रेमिका के लिये दिन को रात और रात को दिन कहने वाले इस प्रेम को आदर्श मानकर चलते हैं।

दूसरी ओर ऐसे ही नतमस्तक होने का अनुपम उदाहरण कांग्रेस० में देखने को मिलता है। जहां गांधी परिवार के प्रति उनके कार्यकर्ता नतमस्तक होते दिखते हैं। उम्र की कोई सीमा नहीं है, जेण्डर का कोई बंधन नहीं है।

चर्चा है कि गांधी परिवार के प्रति किसी भी स्तर पर जाकर आस्था दिखाने में कोई भी संकोच किसी कांग्रेसी को नहीं होता।

अफसोस है कि जलनखोर लोग इस प्रवृति को भला-बुरा कहते हैं। क्यांे भैया ? शर्मिला टैगोर और फिरोज खान का प्रेम प्रेम है और हम वही काम करें तो थू… थू…

फोकट की हायतौबा !!!!

झाड़ू लगाने को तैयार ज्ञानी जैलसिंग

मैडम इंदिरा के कहने से

बात 1982 की है जब राष्ट्रपति पद का चुनाव होना था तो तत्कालीन गृहमंत्री ज्ञानी जैलसिंग को इंदिरा गांधी ने इस पद पर बिठाने का मन बनाया। उस समयं ज्ञानी जैलसिंग का ये बयान कि *अगर मैडम मुझे झाड़ू देकर सफाई करने को कहंेगी तो उससे भी मैं पीछे नहीं हटूंगा’।

हालांकि इसकी काफी चर्चा और नो डाउट भत्र्सना भी हुई लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि ये वफादारी और प्रेम की पराकाष्ठा है। व्यर्थ ही लोग इसे चमचागिरी का नाम देते हैं। ये किसी तौर दिन को रात कहने से कम नहीं।

भक्तों द्वारा इंदिरा इज इण्डिया और इण्डिया इज इंदिरा कहा जाना सर्वविदित है। इसी कड़ी में आगे चलकर शंकर सिंग बाघेला ने सोनिया गांधी के लिये कहा था कि ‘भारतीय राजनीति के इतिहास में सोनिया गांधी जैसा महान त्याग किसी और ने नहीं किया’।

एक भक्त ने सोनिया गांधी को झांसी की रानी के रूप में दिखाकर बैनर छपवा लिये। इस पर भी असंतुष्टों ने काफी हाय-तौबा मचाई। ये भी दिन को रात कहने से अधिक नहीं लेकिन जलनकुकड़े इस प्रेम की पराकाष्ठा को भी चमचागिरी कहते नहीं थकते। इंदिरा गांधी से चला ये सिलसिला सोनिया और अब राहुल गांधी तक जारी है।

खाली बर्तन में टनटनाता है चम्मच

एक दृष्टिकोण ये भी है कि बर्तन भरा होता है तभी उसे चम्मच मिलता है और जैसे ही बर्तन खाली होने लगता है चम्मच भी शोर करने लगता है, दांए-बांए होने लगता है। फिर यदि बर्तन के भरे होने की गुंजाईश होने लगती है तो चम्मच चिपका रहता है।

पर अब तो चम्मचों के लिये बड़े असमंजस के दिन आ गये हैं। मोदी को किसी का लिहाज ही नहीं है। मोदी चमचाई को कोई जवज्जो ही नहीं देते। मोदीजी छांट-छांट कर नये सिक्के लाते हैं और उन्हें चलाने लगते हैं। ऐसे में जो पुराने आस लगाए बैठे होते हैं उन्हें बेहद निराशा होती है।

और फिर पता नहीं कब पुराने बर्तन फिर से भरे भी जाएंगे या नहीं, पुराने नेताओं को फिर से नंबर लगेगा भी या नहीं, यही सोच-सोच कर चम्मच दुबले हुए जा रहे हैं। पता चला कि जिसके आगे-पीछे चप्पलें घिस दीं, उसका खुद का ही नंबर नहीं लगा तो हो गया न जीवन व्यर्थ।


जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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