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सूनी रही गांधी जयन्ती, ननकीराम-रेणुकासिंह की हिम्मत, सरकार ने चलाई थी सस्ती गाड़ी, लोगों ने मार ली पैर पे कुल्हाड़ी, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

गांधी हमारे नहीं

पाकिस्तान के राष्ट्रपिता

2 अक्टूबर को देश में जो माहौल था उससे ये साफ लगा कि लोग अब लकीर के फकीर नहीं रहे और किसी बात पर मुखर होकर बोलते हैं। शायद यही कारण है कि इस बार गांधी जयन्ती पर गांधीजी को कम याद किया गया।

पहले सोशल मीडिया पर गांधी के नाम का डंका बजा करता था। पर पिछले कुछ वर्षों से इस उत्साह में कमी दिखी है। इस बार तो लगभग सूना सा रहा माहौल।

दूसरी ओर 2 अक्टूबर को पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जयंती के रूप में मनाने वालों की पहले की तुलना में बहुतायात रही।

दिलचस्प तो यह है कि गायक अभिजीत ने एक बयान में कहा कि गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता नहीं हैं, भारत तो पहले से ही था। राष्ट्रपिता तो वे पाकिस्तान के हैं क्योंकि उन्होंने ही पाकिस्तान बनाया।

देश का मिजाज और सोच बदल रही है।

प्रशासन में बेईमानी: ननकीराम

सरकार में रावण: रेणुका

याद हो अगर तो जब भाजपा के शासन में ननकी राम कंवर गृहमंत्री हुआ करते थे तो अपने ही अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों की शिकायम सरेआम किया करते थे।

शायद देश में ये पहला मामला था कि गृहमंत्री अपने अधीनस्थ विभाग की शिकायत करे।

अब एक बार फिर ननकीराम ने बगावत का झण्डा उठाया है। वे शासन से नाराज हैं और बगावती हो गये हैं। सरकार बदलने का दावा करते हैं और शासन ने भी उन्हें नजरबंद कर रखा है।

हालांकि जिन वरिष्ठ अधिकारियांे से वे क्षुब्ध हैं उन्हीं अधिकारियों को वे अपने शासन में संरक्षण भी दिया करते थे, ऐसी चर्चा है।

माहौल तब भी ऐसा ही था जैसा अब है।

ऐसे ही स्वर विधायक रेणुकासिंह के भी सुनाई पड़े। 2 अक्टूबर को ही दशहरे के दिन भाजपा विधायक ने बड़ी हिम्मत दिखाई। एक प्रोग्राम मे बोलते हुए समाज के साथ सरकार में भी रावण के होने की घोषणा कर दी।

कहा तो उन्होंने सच ही पर इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है टिकट वितरण में। टिकट के लिये तो यस सर, सही बात सर, चलता है। दिमाग और अपने विचार नहीं चलते।

लेकिन एक पहलू ये भी है कि उन्हें शायद ये लगता हो कि टिकट वितरण के मापदण्ड बदल चुके हैं और केवल जीहुजूरी से सफल नहीं हुआ जा सकता। इसके लिये मोदी फार्मूले में खरा उतरना पड़ेगा।

बड़ी सुविधा दी रेल्वे ने

इसका दुरूप्योग न करें

हम सबको याद है कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। ़गोंदिया से बालाघाट और आगे जबलपुर तक तथा रायपुर से धमतरी छोटी लाईन की रेल चला करती थी। बड़ा मजा आता था। खासतौर पर बड़ी लाईन वालों को तो बेहद आनंद आता था जिन्हें साल-छह महीने में उस लाईन में जाना पड़ता था। किसी टाॅय ट्रेन जैसी लगती थी।

इस ट्रेन में आगे चलकर जो परेशानी महसूस हुई वो ये कि ये समय अधिक लेती थी इसलिये कामकाजी लोग बस आदि से सफर करना अधिक पसंद करते थे।

निचला तबका जो छोटे-मोटे काम करता था इससे अधिक सफर करता था। मसलन रायपुर के आसपास से मजदूर वर्ग रायपुर आने-जाने के लिये छोटी लाईन का प्रयोग करता था।

लेकिन ये हमेशा घाटे में चलती थी, क्योंकि लोग इसमें टिकट नहीं लेते थे। रेल्वे की अनदेखी कहा जाए कि यहां टीटीई भी नहीं होते थे यानि चैकिंग भी नहीं होती थी।

अब सरकार ने रायपुर, अभनपुर और धमतरी में बड़ी लाईन बिछाने का काम चालू किया है। काफी सफलता मिल चुकी है और आगे भी काम चालू है। भविष्य में आगे जगदलपुर तक लाईन बिछाने का मंसूबा है।

खैर… अब बड़ी लाईन में परिवर्तित होने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि सरकार इसे घाटे में जाने का मौका न हीं देगी। सतत् निगरानी से इसे सफल बनाया जा सकता है।

अपने ही माल की लूट

पहले गाड़ियों में लिखा देखा जाता था कि ‘सरकारी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है’। तो बस लोगों ने इन संपत्तियों को अपना समझ लिया और चूंकि इनमें अपना पसीना नहीं बहाया होता लिहाजा उसे नष्ट करने में कोई दर्द महसूस नहीं करते थे और संपत्तियों का दुरूप्योग शुरू कर दिया।

 जब छोटी लाईन थी तो एक समय धमतरी से रायपुर पांच रूप्ये टिकट लगती थी तब भी लोग टिकट नहीं होते थे। पांच रूपये भी लोगों की लालच की आहुति चढ़ जाते थे।

जब घाटे से परेशान होकर सरकार ने ट्रेन बंद कर दी तो मजबूरी में साठ रूप्ये खर्च कर बस से आना-जाना पड़ता था। अभी जो ट्रेन चालू हुई है उसमें अभनपुर तक 15 रूप्ये किराया लागू किया गया है। जबकि बस में अभनपुर का 30 लगता है।

बस की तुलना में ट्रेन को किराया आधे से भी कम होता है और समय भी कम लगता हैै। अफसोस है कि तब भी लोग ट्रेन की सुविधा का दुरूप्योग करने से नहीं चूकते।


जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक,चिन्तक, विश्लेषक मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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