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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक … देश चलता नहीं, मचलता है, मुद्दा हल नहीं होता, सिर्फ उछलता है। जंग मैदान में नहीं, सोशल मिडिया पर जारी है, आज मेरी, तो कल तेरी बारी है।

‘भूलन कांदा’ नामक उपन्यास प्रसिद्ध साहित्यकार संजीव बख्शी ने एक दशक पहले लिखा था । जिस पर छत्तीसगढ़ के नौजवान सिने निदेशक मनोज वर्मा ने छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘भूलन द मेज’ नामक फिल्म बनाई जो राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली यह पहली क्षेत्रीय फिल्म है।
भूलन कांदा सुनकर याद आया हमारे दादा जी बताते थे जंगल में कंदमूल का एक पौधा होता है भूलन कांदा, जिस पर यदि किसी का पांव पड़ जाए तो आदमी हो जानवर अपना रास्ता भटक जाते है। वह तब ही इस भूलन से उबर पाता है, जब कोई दूसरा आदमी या जानवर उसे स्पर्श कर ले।
भूलन कांदा और भूलन द मेज को देख कर याद आया कि एक मजेदार फ़िल्म राजनीति में कुर्सी को लेकर बनाई जा सकती है भूलन द कुर्सी जिसमें बैठने के बाद नेता को कई बातों को भूलने की बीमारी पीछे लग जाती है और राजनीति में फीलगुड महसूस कराती भूलन द कुर्सी नेता को हकीकत का धरातल पर तभी ला पाती है जब उस फीलगुड वाली भूलन द कुर्सी पर कोई दूसरा काबिज होता है ।
छत्तीसगढ़ की राजनीति भी इन दिनों मतिभ्रम , वादाखिलाफी , भूलने भुलाने की बातों के इर्दगिर्द घूम रही है । कांग्रेसी मोदी की गारंटी और विष्णु देव की सांय सांय करती सरकार की वादाखिलाफी , जीएसटी के धोखे , बिजली बिल की बढ़ोत्तरी , पटरी से उतरी कानून व्यवस्था , बिगड़ चुकी स्वास्थ्य व्यवस्ता , सड़को पर मरती गौमाता , गड्ढों से सड़क तलाशती जनता व खाद के नाम पर ठगे जा रहे किसानों , युवामोर्चा के नेताओ की गुंडागर्दी को कांग्रेस की गुंडागर्दी से जस्टिफाई करते नवांकुरित नेताओ को ले मजे ले रही है । कांग्रेस के आक्रमक रुख पर भाजपाई कका राज के गोबर , दवा दारू से लेकर शराब व कोयला घोटाले के नाम पर लट्ठ ले पीले पड़ी है कांग्रेसी मुद्दे होंने के बाद भी अपनी सरकार के कार्यकाल के घपले घोटालों के चलते बैकफुट पर चले जाती है ।
खैर बात यंहा भूलन कांदा व भूलन द मेज को लेकर बात चालू हुई थी तो क्या है न राजनीति में लकड़ी की कुर्सी जिस पर बैठ कर फीलगुड महसूस होता है वही राजनीति का केंद्र बिंदु है जिस पर बैठने की चाहत आदमी को पहले चमचा या भक्त , फिर नेता और नेता से लबरा बना देती है । कुर्सी की चाहत में आम आदमी से चमचा , भक्त , नेता और नेता से लबरा बनने तक कुर्सी के सफर तय करने के लिए आदमी को भूलन कांदा पर पैर रखना ही पड़ता है , भूलने की बीमारी को अपना अनिवार्य अंग बनाना ही पड़ता है ।
क्या है न नेता बेचारा जनता जनार्दन के लिए पब्लिक फीगर , रहनुमा , मसीहा , आदर्श और न जाने क्या क्या होता है । अपने नेतागिरी की खाल में विभिन्न रोल को अभिनीत करते करते बेचारा खुद को भी भूल जाता है । अब बेचारा कितना और क्या-क्या याद रखेगा ? झूठ बोलने की अदा और भूलने की बीमारी ना हो तो बेचारा पगला नही जाएगा , दिमाग नहीं फट जायेगा । नेता ने मन की शांति और निःफिकर जीवन के लिए खुद को याद रखने की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त किया हुआ है । नेता फील गुड कराने वाली अपनी भूलन द कुर्सी पे बैठते ही पुराने दिन भूल जाते हैं। वाकई, नेता को कुछ भी याद नहीं रहता है। जनता से किया वायदा, ली गई शपथ , संस्कार, नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी के साथ साथ भूलने के ढेर सारे मुद्दे भी जरूर रहते हैं। भूलन कांदा की तरह कुर्सी का फील गुड बहुत कुछ बारी-बारी से भुला देता है। अधिकांश नेता तो अपनी पार्टी , धर्म , खानदान तक भूल जाते हैं। बस नेताओं को फील गुड कराने वाली वो लकड़ी की कुर्सी जरूर और किससे कब किंतना कमीशन कब कहा आएगा किससे दोस्ती करने से फायदा है यही याद रहता है।
भूलन कांदा का असर इन दिनों कबीरधाम जिले की जनता देख और महसूस कर रही है । कांग्रेस के दबंग कहे जाने वाले क्षेत्र बदलकर अपना झंडा बुलंद करने वाले अकबर भगवा लहर के चलते ऐसे हारे की पलट कर अपने क्षेत्र की ओर आये नही मानो भूलन कांदा का असर हो गया और क्षेत्र को भूल गए दूसरी ओर महिला शोषण के आरोपो से घिरे युवा मोर्चा के विवादों में घिरे रहने वाले सरदार भूल गए कि उनकी गाड़ी को कांग्रेसियों ने काले झंडे दिखाए , उनकी गाड़ी के आगे चल रही काली गाड़ी में उनके कार्यकर्त्ता का चोला ओढ़े भक्त किस कदर गुंडाई करते है । मुझे नही मालूम मैं तो था ही नही जैसे रटे रटाये जुमले , कांग्रेसियों की गाली से अपनी गाली को जस्टिफाई करते नेताओ पर मानो भूलन कांदा असर कर रहा है ।
भूलन कांदा पर पैर रखने से भूलने और स्पर्श से याद आने के अनुभव करने वालों के भी कई किस्से हमने सुन रखे है अब इसमें कितनी सच्चाई है ये तो नही मालूम पर इस लोक अनुभव को आधार बनाकर बनाये गए किस्सों को सुन आज की राजनीति में इसके अनुभव जरूर मिलते है ।

चलते चलते :-
(1) चिल्फी बैरियर में लठैत किसके सरकारी या वसुलीबाज अफसर के ?
(2) चिल्फी बैरियर में वाहन चालकों से वसूली की खबरे सच है या कोरी अफवाह ? सच है तो कहाँ कहाँ पहुंचता है हिस्सा ?

और अंत में :-
देश चलता नहीं, मचलता है,
मुद्दा हल नहीं होता, सिर्फ उछलता है।
जंग मैदान में नहीं, सोशल मिडिया पर जारी है,
आज मेरी, तो कल तेरी बारी है।
#जय_हो 14 अक्टूबर 2025 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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