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पीके (प्रशान्त किशोर) साबित होंगे वीके (वोट कटवा) वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी…

बिहार में चुनाव हैं, चुने जाने हैं नेता। हालांकि सियासी समझ वालों का कहना है कि फिर से सत्ता एनडीए के पाले में जाएगी। भाजपा और नीतिश फिर से सत्तानशीन होंगे और नीतिश फिर से सीएम बनेंगे।
किंगमेकर ने की
किंग बनने की घोषणा
तीन धड़े हैं। भाजपा, नीतिश और लालू। नीतिश जिससे मिल जाते हैं उसकी सरकार बन जाती है। इन तीन के अलावा बाकी पार्टियों का कोई विशेष अस्तित्व नहीं है। हां इस बार एक और पार्टी ने अपना बैण्ड बजाया है और चाहती है कि जनता उसके सुर को स्वीकार करे। सुर मिलाए।
जो शख्स इससे पहले विभिन्न नेताओं को जिताने के जतन करता था और लगभग कामयाब भी होता रहा, वह खुद ही इस बार मैदान में उतरा है। ताल ठोककर।
प्रशांत किशोर ने कई लोगों को गणित बनाए और कईयों के बिगाड़े हैं। कहा जा सकता है कि प्रशान्त का प्रभाव देश की राजनीति में बना हुआ है।
प्रशान्त किशोर एक कामयाब किंगमेकर हैं यानि उनकी कंपनी जिस नेता को सपोर्ट करती है वो किंग बन जाता है यानि जीत जाता है।
पर इस बार इस किंगमेकर ने स्वयं ही किंग बनने का सपना संजो लिया।
देश के किसी भी कोने में चुनाव हो, इस शख्स की कंपनी की सेवाएं कोई न कोई अवश्य लेता है और नो डाउट पीके यानि प्रशान्त किशोर का साथ लेने वाले को आशातीत सफलता भी मिलती है। कह सकते हैं कि सियासी गणित का अच्छा जानकार और सफल व्यापारी है।
क्या पीके
बनेंगे वीके
पर इस बार बड़ा अजीब खेल खेला इस शख्स ने। उनके रवैये से सियासी पण्डित ये कयास लगा रहे हैं कि पीके यानि प्रशान्त किशोर इस बार वीके यानि वोट कटवा साबित होंगे।
तो क्या यही सच है या कोई अंदरूनी खेल खेला जा रहा है ?
पीके ने काफी पहले से बिहार में अपनी पार्टी बनाई जनसुराज पार्टी और अपनी पार्टी के बैनर तले पदयात्राएं भी कीं। जनता के बीच पहुंचे। दहाड़ा। बेईमानों को दुत्कारा। सरकार बनने पर सौ भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजने का ऐलान किया। बड़ा शोर रहा पीके का।
यूं प्रशान्त किशोर का नाम काफी इज्जत से लिया जाता रहा है सियासत में। उनके दांव प्रायः खाली नहीं जाते। पर इस बार राजनैतिक खिलाड़ी असमंजस में हैं कि पीके कर क्या रहे हैं।
दरअसल अपने कद के हिसाब से पीके ने सीधे तेजस्वी यादव यानि लालू यादव के पुत्र को चैलेंज किया और उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।
लगा कि चुनाव बड़ा दिलचस्प होगा। ये सीट देखने लायक होगी। पूरा देश पीके के दावे पर टकटकी लगाए बैठा था।
लेकिन एकाएक पता नहीं क्या हुआ…. कि पीके गरजते-गरजते एकाएक यू टर्न ले बैठे और बरसने से मना कर दिया।
पीके ने ऐलान कर दिया कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे।
उन्होंने घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी ने निर्णय लिया है कि वे यानि प्रशान्त किशोर चुनाव नहीं लड़ें ताकि वे अपनी पार्टी के अन्य प्रत्याशियों के लिये काम कर सकें।
सफर थोड़ा आसान हुआ
फिर भी किनारा कर लिया
जाहिर है ये एक बहाना है। यहां प्रश्न ये उठ रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने और सरकार बनने पर सौ दिन के अंदर उन्हें अंदर करने का दम भरने वाले पीके पीछे क्यांे हो गये। जबकि यही तो अच्छा मौका था।
अभी हाल ही में लालू यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और उनके पुत्र तेजस्वी यादव के खिलाफ लैण्ड फाॅर जाॅब और अन्य मामलों में आरोप तय कर दिये गये हैं। यानि उनके जेल जाने की आशंका बलवती हो गयी है।
ऐसे में तो प्रशांत ताल ठोककर लड़ सकते थे कि देखो जो बेईमानी के आरोप हमने लगाए थे वे सच साबित हो रहे हैं। फिर सीधे सियासी समर से कतराना क्यांे ? हार के डर ने हौसलों को पस्त कर दिया।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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