
जिले के जल संसाधन भी इस सफलता की गवाही दे रहे हैं। ग्रामीण तालाबों की संख्या 757 से बढ़कर 4852 हो गई है जबकि जलाशय तीस से तैंतीस तक पहुंच गया है। कुल जलक्षेत्र 1316 हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 3888 हेक्टेयर हो चुका है। इनमें से 3796 हेक्टेयर पर सक्रिय मछलीपालन हो रहा है यानी उपलब्ध जलक्षेत्र का 97 प्रतिशत में मत्स्यपालन किया जा रहा है। मत्स्यपालन विभाग ने इन पच्चीस सालों में स्वयं 66 हेक्टेयर रकबा के नए तालाब बनाए हैं। वर्ष 2000 में मछली पालन के लिए 301 ग्रामीण तालाबों की 370 हेक्टेयर जल क्षेत्र को पटटे पर दिया गया था, जो अब बढ़कर 903 ग्रामीण तालाबों के लगभग 903 हेक्टेयर जल क्षेत्र हो चुकी है।
बस्तर अब मत्स्य बीज में न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर और पड़ोसी राज्य ओडिशा को भी पर्याप्त मात्रा में मत्स्य बीज आपूर्ति कर रहा है। बस्तर में मछली का प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 3.20 मीट्रिक टन तक पहुंच गई है। राज्य में यह जिला मत्स्य उत्पादन और बीज उत्पादन में 17 वें स्थान पर है, लेकिन कृषि दर्जे के बाद इसमें और तेजी आने की पूरी संभावना है।
नई तकनीकों ने भी मत्स्यपालन को नई ऊंचाई दी है। निजी किसानों ने बायोफ्लॉक तकनीक से 13 इकाइयां स्थापित की हैं। इस वर्ष अभी हाल ही में एक किसान ने बायोफ्लॉक तालाब बनाकर मत्स्यपालन शुरू किया है और वर्तमान में तीन तालाब निर्माण प्रगति पर हैं। झींगा पालन के लिए 28 हेक्टेयर जलक्षेत्र चयनित हो चुका है, जहां जल्द ही झींगा पालन शुरू किया जाएगा। कोसारटेडा मध्यम सिंचाई जलाशय में जिला खनिज न्यास निधि से 96 केज लगाए गए हैं, जहां मछुआरा समितियां मत्स्यपालन कर अतिरिक्त आय कमा रही हैं। जिले में सहकारी समितियों की संख्या भी 19 से बढ़कर 37 हो गई है। मत्स्यपालन विभाग के उप संचालक मोहन राणा बताते हैं कि शासन की योजनाएं और किसानों का परिश्रम मिलकर बस्तर को मत्स्यपालन का मजबूत केंद्र बना रहे हैं। अभी नतीजे उत्साहजनक हैं जो निश्चित तौर पर अब बस्तर में नीली क्रांति का आगाज है।








