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गणतंत्र-संविधान क्या है, शिक्षा कैसी हो, सोना-चांदी, कांच की बोतल,भगदड़ से मौतें-संतों का अहम्-वीआईपी की जिद, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी

 

गणतंत्र दिवस को प्रायः लोग नहीं समझते, बच्चे तो बिल्कुल नहीं समझते। आम आदमी तो ये भी नहीं समझता कि इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था। क्योंकि हमने हमारी सरकारों ने कभी समझाया ही नहीं।

*बच्चों को यही नहीं बताया जाता कि संविधान किस चिड़िया का नाम है।
26 जनवरी को गणतंत्र दिवस क्यों कहा जाता है… आदि।
दरअसल हम लोग बेसिक नाॅलेज से दूर हैं। हमारी शिक्षा में जो कुछ भी रटाया जाता है वो आम जीवन में किसी काम का नहीं है। यानि जाॅब ओरिएन्टेड शिक्षा नहीं है।
*जो शिक्षा आगे चलकर कमाने के रास्ते बताए वही असली शिक्षा है।
इन दोनों बातों पर सरकार को ध्यान देना होगा।

*खतरनाक सोना-चांदी*
*खतरनाक कांच की बोतल*

जानकार जब सोना और चांदी एक साथ बढ़ते हैं तो ये कोई सामान्य घटना नहीं है, ये असहज है। जबसोना चांदी एक साथ बढ़ते हैं तो कुछ न कुछ असामान्य होने वाला है। सोना 70 प्रतिशत से अधिक चढ़ा और चांदी में 140 प्रतिशत से अधिक।
ये 2025 की एक असामान्य घटना है। सोना चांदी कोयले की खान में एक साथ निकलते हैं।
*इतिहास बताता है कि पिछले कुछ सदियों में ये दोनो एक साथ बढ़े तो कई मध्यम वर्गीय परिवारों पर बिजली गिरी। इसलिये सावधान….

अन्य कुछ सूबों में शराबियों की सुविधाओं को नजर में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार बोतल बदलने जा रही है। नहीं समझे।
*जिन लड़खड़ाते मस्तानों की कांच की बोतलें गिरने से टूट जाया करती हैं।* *उन्हें अब घबराने की जरूरत नहीं है* अब सरकार उनके लिये फाईबर की बोतलों का इंतजाम करने जा रही है। फाईबर की बोतलें शराब सप्लाई के लिये प्रयोग की जाएंगी।

*चलो कम से कम अब ये बोलकर कि बोतलें फूट गयीं हेराफेरी नहीं की जा सकेगी जैसे बताया जाता है कि अनाज गोदाम में हजारों बोरियां धान चूहे खा गये।* छत्तीसगढ़ में बेईमान लोग जो न करें वो कम है।

*टूटते नियम*
*मचती भगदड़*
*जवाबदार कौन*

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मौनी अमावस्या पर विशेष स्नान में भाग लेना था तो वे पालकी में संपूर्ण तामझाम के साथ आगे बढ़े। कायदा, भीड़, व्यवस्था के नाम पर पुलिस ने रोका तो बिफर पड़े। नाराजगी,धरना, सरकार को कोसना।

*पिछले कई सालों से देख रहे हैं कि धार्मिक स्थानों पर कहीं पर थोड़ी सी भी अव्यवस्था होने पर भगदड़ मच जाती है और इस भगदड़ में हर कोई अपने और अपने अपनों को बचाने के चक्कर में दूसरों के प्रति असहज हो जाता है।* येन केन प्रकारेण वे वहां से निकलना चाहते हैं और जब सभी ऐसा चाहते हैं तो स्वाभाविक है कि चारों ओर भगदड़, अव्यवस्था, मौतें और घायल दिखते हैं।

क्या किसी भी इंसान को खासतौर पर किसी संत को ये शोभा देता है कि अपनी शानबान दिखाने के लिये कई जानों को खतरे में डाल दे।
*यहां तो स्वामीजी के चेलों ने धक्का-मुक्की और मारपीट को अमली जामा पहना दिया। सुरक्षा की दृष्टि से ये सर्वथा अनुचित है ही, अमानवीय भी है*।
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जवाहर नागदेव,
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700

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