
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के पुरातत्त्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय रायपुर के तत्वावधान में मंगलवार को जगदलपुर में बस्तर का पुरातत्त्वीय एवं सांस्कृतिक परिदृश्य विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला का गरिमामयी शुभारंभ हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन का उद्घाटन जगदलपुर के महापौर संजय पांडेय ने किया, जहाँ उनके साथ पार्षद निर्मल पाणिग्रही, एमआईसी सदस्य लक्ष्मण झा तथा शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आरंभ में उप संचालक डॉ. पीसी पारख और प्रभारी संग्रहाध्यक्ष डॉ. दीप्ति गोस्वामी ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि सत्रों का संचालन पुरातत्ववेत्ता प्रभात कुमार सिंह ने किया।
अपने उद्घाटन उद्बोधन में संजय पांडेय ने बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक विरासत को विश्व पटल पर रेखांकित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बस्तर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आदिम संस्कृति और परंपराओं का एक जीवंत संग्रहालय है। आज की युवा पीढ़ी और शोधार्थियों पर यह महत्वपूर्ण दायित्व है कि वे इस विरासत को न केवल जानें, बल्कि इसके वैज्ञानिक संरक्षण और संवर्धन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएं। महापौर ने आयोजकों के इस प्रयास की सराहना करते हुए विश्वास जताया कि यह कार्यशाला बस्तर के इतिहास को देखने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करेगी।
संचालक विवेक आचार्य के मार्गदर्शन में आयोजित हो रही इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बस्तर की ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक धरोहरों पर अकादमिक विमर्श करना और युवा पीढ़ी को इससे जोड़ना है। इस आयोजन में शहीद महेंद्र कर्मा बस्तर विश्वविद्यालय, काकतीय महाविद्यालय, दंतेश्वरी महिला महाविद्यालय, और दंतेश्वरी महाविद्यालय दंतेवाड़ा सहित संभाग के विभिन्न महाविद्यालयों के लगभग 75 चयनित विद्यार्थी और शोधार्थी भाग ले रहे हैं। पहले दिन के बौद्धिक सत्रों में बस्तर के इतिहास और संग्रहालय विज्ञान पर गंभीर चर्चा हुई। प्रथम सत्र में प्रख्यात लेखक और चिंतक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर में इतिहास लेखन की परंपरा, दृष्टिकोण, बाधाएं और निदान के उपाय विषय पर अपना व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने बस्तर के इतिहास को देखने की नई दृष्टि प्रदान की।
इसके उपरांत द्वितीय सत्र में पंडित गंगाधर सामंत बाल पुरातत्त्व संग्रहालय, जगदलपुर की संग्रहाध्यक्ष डॉ. दीप्ति गोस्वामी ने बस्तर की पुरासम्पदा का दर्पण विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिभागियों को संग्रहालय में संरक्षित दुर्लभ कलाकृतियों और उनके ऐतिहासिक महत्व से विस्तार से अवगत कराया। यह कार्यशाला 31 जनवरी तक चलेगी, जिसके आगामी दिनों में बस्तर की ऐतिहासिक पर्यटन संभावनाओं, रीवां उत्खनन, आदिम भाषा विरासत और संरक्षित स्मारकों की स्थिति जैसे विषयों पर कुल 10 तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे। कार्यशाला के अंतिम दिन 31 जनवरी को प्रतिभागियों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों का परिभ्रमण भी कराया जाएगा।







