Ro no D15139/23

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक ..ख़बर छुपाई जाती है, अफ़वाह उड़ाई जाती है, यह वो जमाना है जहाँ, कहानी कुछ और होती है, सुनाई कुछ और जाती है ।

भारतीय राजनीति भी अजब गजब है यहां जो कहा जाता है वह किया नही जाता और जो किया जाता है वह कहा नही जाता । भारतीय राजनीति का रंगमंच इन दिनों अपनी नई पटकथा को लेकर फिर से चर्चा में है और इस बार की पटकथा में नारी वंदन के बहाने “महिला आरक्षण” के गिरने और 300 माननीयों की “भ्रूण हत्या” के बाद के रुदाली रुदन के भी दृश्य का भी है । महिला आरक्षण के औंधे मुंह गिरते ही 300 माननीयों की “भ्रूण हत्या” हो गई बताई जा रही है। राजनीति के मंच का यह दृश्य इतना करुण और इतना हास्यास्पद भी है कि जनता जनार्दन तय नहीं कर पा रही कि ताली बजाएँ या सिर पकड़ लें।
बताया जा रहा है कि राजनीति के भ्रूण दरअसल कोई साधारण भ्रूण नहीं थे। ये वे माननीय थे जो अभी पैदा भी नहीं हुए थे, पर उनकी सुख-सुविधाओं, बंगले, गाड़ी, सुरक्षा, पीए , रसोइए , वेतन भत्ते , मुफ्त का फाइव स्टार इलाज ,हवाई यात्रा और सबसे अहम पेंशन का बोझ जनता पहले से ही अपने कंधों पर महसूस करने लगी थी। भावी माननीयों के गर्भपात से जनता जनार्दन ने राहत की साँस ली चलो बच गए ?
महिला आरक्षण को लेकर गप्पू भैय्या , पप्पू और टोंटी चोर पर ऐसे बरस रहे हैं जैसे महिला आरक्षण नहीं, बल्कि कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो, उनके भाषणों में जो दर्द है, क्रोध है उसका बखान नही किया जा सकता और सबसे ज्यादा राजनीतिक गणित का गहरा ज्ञान कि वे बताते हैं कि कैसे विपक्ष ने कैसे महिलाओं के अधिकारों को कुचल दिया।
जबकि पप्पू और टोंटी चोर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान कुछ और ही कहानी कहती है। पप्पू और टोंटी चोर भी कम नहीं है वे इस पूरे घटनाक्रम को सत्ता की बदनीयती का मास्टरस्ट्रोक बता रहे हैं। उनके मुताबिक, यह सब एक सोची-समझी चाल थी । पहले आरक्षण का सपना दिखाओ, फिर उसे गिराकर सहानुभूति बटोर लो और इस बीच, जनता को समझाओ कि असली लड़ाई तो अभी बाकी है।
राजनीति के मंच के आरक्षण के इस पूरे नाटक में सबसे दिलचस्प किरदार है जनता जनार्दन। ये वही जनता है जो हर चुनाव में उम्मीदों और सपनों का नया लखटकिया सूट पहनकर निकलती तो है किंतु लखटकिया सूट पाँच साल में ही फटकर पोंछे के लायक भी नही रहता ।
महिला आरक्षण का मुद्दा अपने आप में गंभीर है किंतु हमारे माननीय गम्भीर मुद्दों पर गम्भीर कहाँ रहते है । यहाँ हर गंभीर मुद्दा पहले राजनीतिक अखाड़ा बनता है, फिर टीवी डिबेट का मसाला और अंत में व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी का सिलेबस। यहाँ महिलाओं के अधिकारों से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि किसे कितनी सीट मिलेगी और किसकी कुर्सी खिसकेगी। विडंबना देखिए जो नेता कल तक महिलाओं के सशक्तिकरण के बड़े-बड़े भाषण दे रहे थे, वही आज सीटों के गणित में उलझकर यह तय कर रहे हैं कि यह सशक्तिकरण राजनीति के अखाड़े में किसे नुकसान पहुँचाएगा और किसे लाभ । जो नेता आज आरक्षण के गिरने पर दुखी हैं, वे भी भीतर ही भीतर यह गणना कर रहे हैं कि अगली बार टिकट वितरण से लेकर सत्ता के दरवाजे तक कैसे उनका पलड़ा भारी रहेगा।
राजनीति के रंगमंच में खेले जा रहे नारी वंदन के बहाने महिला आरक्षण की पटकथा ने एक बात साफ कर दी है कि भारतीय राजनीति में कोई भी मुद्दा “पवित्र” नहीं है वरन हर मुद्दा एक अवसर है किसी के लिए सत्ता में बने रहने का और किसी के लिए सत्ता तक पहुँचने का।
और जनता जनार्दन ? वह अब भी वहीं खड़ी खड़ी ताली बजा भी रही है और तंज भी कस रही है । उसे पता है कि ये 300 “अजन्मे माननीय” भले ही आज पैदा नहीं हो पाए, पर लोकतंत्र की इस उर्वर भूमि में ऐसे बीज कभी खत्म नहीं होते वे फिर किसी न किसी बहाने जन्म लेंगे नई शक्ल में, एक नए नारे के साथ और नई सुविधाओं के पूरे पैकेज के साथ ।

चलते चलते :-
होलिका , सीता हो या पद्मावती समाज उन्हीं औरतों को पूजाता है जो जल के मरने को तैयार हों वरना ज़िंदा रहने और लड़ने वाली औरतों को या तो फूलन देवी या फिर शूर्पणखा कह कर हंसी उड़ाई जाती है ।

और अंत में :-
ख़बर छुपाई जाती है, अफ़वाह उड़ाई जाती है,
यह वो जमाना है जहाँ,
कहानी कुछ और होती है, सुनाई कुछ और जाती है ।
#जय_हो 18 अप्रेल 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़)
(डिस्क्लेमर : बात बेबाक सिरिफ सिस्टम ऊपर काल्पनिक वियन्ग हे , जीवित या मुरदा नेता , अधिकारी या अउ काखरो ले कोनो सम्बंध नई हावय । काखरो ले समानता हर मात्र संयोग होही ।)

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