Ro no D15139/23

जो डर गया वो मर गया, जो डरा नहीं वो जीत गया : जय बांग्ला !

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन विरोधी राजनीतिक पार्टियां कभी भी करा नहीं सकती है। ना ही करा पायी हैं। यहां का चुनावी इतिहास इस बात की तस्दीक करता है। बंगाल में सत्ता परिवर्तन,आज तक वाममोर्चा हो या स्वयं तृणमूल कांग्रेस की अधिष्टाता ममता बनर्जी ; ने नहीं कराया है। सत्ता तब बदली है जब यहां के वोटर भय से मुक्त हो कर मतदान किया है। 1947 से 1977 तक सिद्धार्थ शंकर राय की कांग्रेस सरकार रही हो या 1977 से 2011 तक 34 साल तक लगातर 7 बार की वाममोर्चा सरकार। वर्तमान में 2011 से 2026 की तृणमूल सरकार की निर्वाध तीसरी पारी तक।
1977 में वाममोर्चा की सरकार तब बनी जब पांव में स्लिपर कान में आधी जली बीड़ी फंसा कर घूमने वाले कॉमरेडो ने बंगाल की आम जनता, खेतीहर मजदूर, चाय बगान के श्रमिकों, कारखाने में काम करने वाले 5 रुपए साप्ताहिक मजूदरी पाने वाले जुट मिल मजदूर वर्गों को उनके मालिकों के प्रति विद्रोही बना दिया। पूरे बंगाली जनमानस के साथ यूपी, बिहार और ओडिशा के प्रवासी मजदूरों के अंदर से मिल -फैक्ट्री के मालिकों द्वारा काम से ही निकाल बाहर करने के ‘डर’ को पूरी तरह से निकाल नहीं दिया। इसके लिए धोती और बगैर प्रेस किए हुए कुर्ता -कमीज़-पैंट पहनने वाले कॉमरेडो ने लगातार 15 साल तक बंगाल की जनता को भय मुक्त किया था। उनका वामपंथ के प्रति विश्वास जीता था।
इसके उपरांत ही बंगाल की सत्ता पर दखल के बाद मात्र पहली वाममोर्चा सरकार ने यूनियन बाजी का ऐसा कुचक्र चलाया कि टाटा, बाटा, हिन्द मोटर, हिंदुस्तान लिवर जैसी कम्पनियां बर्बाद हो गई। जुटमिल मालिक तबाह हो गएं। 5 रुपए पाने वाला मजदूर 350₹ हप्ता पाने के बावजूद हड़ताल और तालाबंदी की वजह से बद से बदहाल होते गए। पलायन को मजबूर हो गए। गांवों के दरिद्र हो गए किसानों और मजदूर अपनी बेटियों तक को बेचने मजबूर हो गए। ऐसे में जब बंगाल की आम जनता वामपंथी राजनीति से ऊब कर फिर से कांग्रेस की तरफ मुड़ना चाहा तो यही आधी तक बीड़ी पीने फिर उसे जमीन पर रगड कर दुबारा पीने के लिए कान में खोसने वाले कॉमरेडो ने अपना असली चाइनीज रूप दिखा दिया । 1982 के बाद से वोटरों को डराने -धमकाने, हत्या, लूट और बलात्कार वाला राजनीतिक रक्त चरित्र का तांडव शुरू कर दिया। डर और दहशत का वो रौद्र रूप दिखाया कि आम चुनाव से लेकर पंचायतों तक वोटरों की घेराबंदी कर दी गई। वास्तविक वोटरों के वोट कैडर डालने लगें। कहते हैं कि 34 साला शासन में नौजवानो की पूरी एक पीढ़ी यह तक नहीं जान पायी कि वोट देते कैसे हैं।
जिनसे जरा भी संदेह था उस व्यक्ति से लेकर मोहल्ले और गांवों तक को मतदान बूथ तक नहीं पहुंचने दिया गया। बूथों पर कब्जा कर कैडरों से वोट गिराए गए। बंगाल की तब की 7 करोड़ जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठी।
इसी त्राहिमाम से रक्षा करने माँ, माटी और मानुष का नारा देकर ममता बनर्जी ने कांग्रेस से निकल कर तृणमूल पार्टी का गठन किया। फिर लगातार 10 वर्ष संघर्ष कर एक बार फिर बंगाल की जनता के विश्वास को जीतने सफल हो गई। इसके लिए ममता बनर्जी ने सबसे पहले उनके अंदर से वामपंथियों का डर को निकाला। और सिंगूर के रस्ते पश्चिम बंगाल की सत्ता से वाममोर्चा सरकार को उंखाड़ फेंका। ऐसा कि अब न यहां कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व बचा नाही वामपंथियों का नाम लेवा। कमाल की बात यह की बिलकुल वही वामपंथी डराकर रखने वाली राजनीति को ही तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भी मूलमंत्र बना लिया। इतना जबरदस्त डर कि मजाल है कि टीएमसी के विरोध में आमलोगों को सपना तक आ जाए। बोलना तो दूर।
परंतु दूसरे कार्यकाल के बाद तृणमूल सरकार ने जब देश भर में भाजपा की पकड़ और एक एक कर गैर भाजपा सरकार वाली राज्यों में बीजेपी की सरकार बनते देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अंदर भी डर दिखने लगा। अपने इसी डर को उन्होंने वापस दोगुनी ताकत से बंगाल के वोटरों पर ही काबिज करा दिया। हां यह अलग बात है कि इस बीच अपने तीसरे कार्यकाल में बंगाल की महिलाओं पर लक्खी भंडार, युवा भत्ता आदि का सुनहरा जाल फेंक दिया। दूसरी तरफ जिन बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ ममता बनर्जी ने अपनी मातृ पार्टी कांग्रेस को छोड़ा। अपनी तृणमूल पार्टी खड़ा किया। वाजपेयी सरकार का समर्थन कर केंद्र की राजनीति और NDA में मंत्री तक बनी। आज वो ही बांग्लादेशी और रोहंगिया तृणमूल के सबसे बड़ा वोट बैंक बन चुका है। इसके एवज में बंगाल के मूल बंगाली, भद्र लोग उनकी महिलाएं, उनकी जमीन, उनके गांव, उनके मोहल्ले। इनकी संस्कृति, पूजा, त्यौहार और संस्कार तक पर अंकुश और डर का आतंक कायम हो चुका है। मुस्लिमों को इसके उलट तमाम तरह की छूट और मनमानी करने का जैसे लाइसेंस मिल गया है। मध्य बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल और ग्रेटर कोलकाता तक गांव के गांव, शहर से महानगर तक। कस्बा से मेट्रोपोलीटन शहर तक बिलकुल वही क्या उससे भी कई गुना ज्यादा डर और दहशत का माहौल है।
आज 2026 के विधानसभा चुनाव घोषणा के बाद से पश्चिम बंगाल की जनता डर के उस माहौल में सांस ले रही है कि उस सांस तक को कराहने की इजाजत नहीं है। तृणमूल के गुंडे हर एक विधानसभा सभा वोटिंग क्षेत्र में रात क्या दिन के उजाले में पैरा मिलिट्री, सुरक्षा बलों की 800 कम्पनीयों की मौजूदगी में भी, यह डर बैठाने में कामयाब होते दिख रहे हैं कि यें कम्पनीयां जब लौट जाएंगी और तुम यहीं रहोगे…. फिर देख लेना यदि दीदी के विरुद्ध जाने का अंजाम…… क्या हो सकता है?
अब एक बार फिर तीसरी बार बंगाल की जनता डर से निकलने आतुर तो है। परंतु सम्भवतः मोदी और शाह के सरपरसती के बावजूद शुबेन्दु अधिकारी और बंगाल भाजपा लगातार अपनी तमाम शक्तियों के साथ ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार को उंखाड़ फेंकने जद्दोजहद में है। योगी, हिमंता बिस्वसरमा के दमदार और धुआँधार प्रचार के बावजूद भाजपा, आर आर एस के साथ बीजेपी की सभी अनुसंगिक संस्थाएं दिन रात होम कर रही है कि बस एक बार, सिर्फ एक बार आम वोटर, सनातनी हिन्दू महिला, पुरुष और युवा दीदी की डर और उनके गुंडों, कैडरो की दहशत को उतार कर वोट डाल दे बस।
4 मई और दीदी गई का आह्वान किया जा रहा है…. डर के आगे जीत है…. गब्बर सिंह कह के गया जो डर गया वो मर गया… यानि बंगाल से ममता बनर्जी की सरकार को पूरी तरह से निडर जनता ही बेदखल कर सकती है, भाजपा नहीं।
सच में आज की तारीख में पश्चिम बंगाल की जमीनी और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अराजकता और निरंकुशता का ऐसा डरावना माहौल है कि सच में इस राज्य में लोकतंत्र, संविधान के साथ केंद्र और राज्य का संघीय ढांचा खतरे में दिख रहा है। इसका धाराशयी होना नितांत जरूरी है। वर्ना अभी नहीं तो वोटिंग के रास्ते से पश्चिम बंगाल से ममता मनमर्जी की सत्ता कभी भी परिवर्तित हो ही नहीं सकती। गृहयुद्ध भड़कने से कोई नहीं रोक सकता। बंगाल एकबार फिर नोआखाली की इतिहास को दुहरा सकता है। इति शुभम…..

–  वरिष्ठ पत्रकार राजनीतिक विश्लेषक साहित्यकार, राष्ट्रीय कवि कुमार जगदली ‘ सुनील वर्तमान में  रायपुर, छत्तीसगढ़। मोब :-7999515385   में निवासरत है  अपने जीवन का बहुमूल्य समय कलकत्ता में बिताया है         (कलकत्ता यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन ). 2000 से 2005 टक असम, उड़ीसा,झारखंड, यू पी में भी पत्रकारिता में सक्रिय रहे है। 20008 से छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में सक्रिय है।

  • Related Posts

    (अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषण) युद्धविराम का मिथक और वैश्विक शांति का संकट। विश्व ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता का दौर।

    अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच समय-समय पर घोषित होने वाले युद्धविराम और शांति प्रयासों ने विश्व समुदाय के सामने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जब जब युद्धविराम…

    Read more

    बद्रीनाथ मंदिर चढ़ावा चोरी मामला: आरोपी के पास से शालिग्राम पत्थर और लैपटॉप बरामद

    Badrinath Temple Donation Theft : बद्रीनाथ मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले में पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है. पुलिस द्वारा गठित एसआईटी टीम ने आरोपी प्रमोद नौटियाल के पास से…

    Read more

    NATIONAL

    (अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषण) युद्धविराम का मिथक और वैश्विक शांति का संकट। विश्व ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता का दौर।

    (अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषण) युद्धविराम का मिथक और वैश्विक शांति का संकट। विश्व ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता का दौर।

    विधानसभा मे पद्मविभूषण तीजन बाई को दी गई श्रद्धांजलि, उनके नाम से दिया जायगा राज्य अलंकरण

    विधानसभा मे पद्मविभूषण तीजन बाई को दी गई श्रद्धांजलि, उनके नाम से दिया जायगा राज्य अलंकरण

    खान सर को मिली अग्रिम जमानत, जेल में बंद दोनों बॉडीगार्ड्स को भी सिविल कोर्ट से राहत

    खान सर को मिली अग्रिम जमानत, जेल में बंद दोनों बॉडीगार्ड्स को भी सिविल कोर्ट से राहत

    पूरे यूपी में आज लगेंगे 35 करोड़ पौधे, गोरखपुर से CM योगी ने हरियाली अभियान का किया शुभारंभ

    पूरे यूपी में आज लगेंगे 35 करोड़ पौधे, गोरखपुर से CM योगी ने हरियाली अभियान का किया शुभारंभ

    गोरखपुर से CM योगी का विपक्ष पर प्रहार, बोले- ‘रामभक्तों के खून से सना है सपा-कांग्रेस का इतिहास’

    गोरखपुर से CM योगी का विपक्ष पर प्रहार, बोले- ‘रामभक्तों के खून से सना है सपा-कांग्रेस का इतिहास’

    खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों के बाद अमेरिका ने पूरा किया सैन्य अभियान, 140 ठिकानों को बनाया निशाना

    खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों के बाद अमेरिका ने पूरा किया सैन्य अभियान, 140 ठिकानों को बनाया निशाना