
मुख्त्यार अंसारी और अतीक अहमद के केस की सुनवाई करने वाले जज भागते फिरते थे। कोई तबादला करवा लेता था तो कोई छुट्टी पे चल देता था। माननीय न्यायाधीशों को इन लोगों को केस न उगलते बनता था न निगलते। कोई भी इन गुण्डों के मामलों में फंसना नहीं चाहता था।
क्या राहुल गांधी के केस में भी ऐसा ही कुछ है। पहले तो जज साहब ने एफआईआर का आदेश दे दिया। फिर कुछ ही घंटों के बाद जो पहले कभी नहीं हुआ ऐसा रिकाॅर्ड बना डाला अपने ही आदेश को खुद ही बदल दिया। ऐसा देश के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। कभी भी कोई भी जज अपने आदेश को बदल नहीं सकता। इसमें केवल और केवल अपील हो सकती है।
ऐसे में ये अंदेशा होना स्वाभाविक है कि कारण चाहे जो भी हो, लेकिन क्या मुख्त्यार और अतीक जैसे परिस्थितियां बन गयी हैं।
केस को लंबा करना, अन्य कानूनी व्यावधान पैदा करना कब तक सफल होगा।
जेल और आजादी के
झूले में झूल रहे राहुल
सोनिया भी संकट में

राहुल भी उपर-नीचे, उपर-नीचे होते दिख रहे हैं। जाने कब भाग्य साथ छोड़ दे और उन पर बिजली गिर जाए। अब तो सोनिया गांधी का भाग्य भी लड़खड़ाता दिख रहा है। वास्तव में सोनिया गांधी ने 1983 में भारत की नागरिकता ग्रहण की। लेकिन आश्चर्य है कि वोट उन्होंने 1980 में ही दे दिया था। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का मामला न्यायालय में लंबित है। आखिर कब तक वक्त बचाएगा इस परिवार को।
दीदी को भी भरोसा नहीं
कि तृणमूल जीतेगी

एक सभा मे ममता दीदी को कहते सुना कि ‘रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे’। इसमें छिपी दीदी की मनःस्थिति समझिये। रहा तृणमूल तो…. ये तो ही उनके कम होते आत्मविश्वास को दर्शाता है। इस एक लाईन से समझ ेमें आता है कि तृणमूल के रहने में भी उन्हें संदेह है।
2016 के विधानसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा ने 294 मे से 3 सीटें जीती थीं। जबकि 2021 में लगभग 40 प्रतिशत वोट पाकर 77 सीटंे पा लीं। ज्योतिषियों के अनुसार इस बार 175 से अधिक सीट भाजपा जीत सकती है, यानि लगभग सौ सीटें अधिक।
कुछ भी करें
कोई संकोच नहीं

वोटों को प्रभावित करने के लये दीदी सब कुछ कर सकती हैं। सबकुछ यानि सबकुछ। कभी हिंदुओं को गाली और मुसलमानों को गले लगाना तो कभी हवा का रूख देखकर मंच से मां चण्डी का पाठ करना ताकि हिंदुओं को बरगलाया जा सके।
एक मजाक चल पड़ा है कि वे मच्छर के काटने पर भी हाथ में पट्टी बांध लें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। एक बार पैर में मामूली चोट आने पर पास के अस्पताल नहीं जाकर दूर-दराज के अस्पताल गयी।
वहां पर उन्होने भारी-भरकम प्लास्टर चढ़वाया और व्हील चेयर पर चलने लगीं। भरपूर सहानुभूति बटोरी और चुनाव निपटाया। बस चुनाव के तत्काल बाद ही बिना संकोच के कुर्सी से उठ खड़ी हुईं।
सुना है कि इस बार दीदी ने ये भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि भाजपा आई तो प्रदेश में मछली पर बैन लगा देगी। है न हंसने की बात। क्या कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी प्रदेश में ये संभव है ? जल्द ही लोगों ने इस प्रोपेगोण्डा को समझ लिया। मछली के नाम से छली न जा सकी जनता।
बड़ी मछली नहीं
मगरमच्छ है अमेरिका
मछली बात निकली है तो बता दें कि खबर है कि हमारे देश से हमारे प्रदेश छत्तीसगढ़ से दुधावा बांध (कांकेर), बांगो बांध (कोरबा) और सरोदा बांध (कवर्धा) से हर साल लाखों टन मछलियां अमेरिका जाती हैं। वर्तमान में युद्ध के चलते हजारों टन मछलियां पड़ी हुई हैं। जल्दी समाधान नहीं हुआ तो मछुवारों को करोड़ों का नुकसान हो जाएगा।

कहावत है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। अमेरिका तो खुद मगरमच्छ है मगर इस मगरमच्छ ने ईरान को मछली समझ कर निगलने का प्रयास किया लेकिन बाद में समझ मे आया कि ईरान भी मगरमच्छ है मछली नहीं। ईरान अमेरिका को नाकांे चने चबवा दिये।
इससे पहले अमेरिका ने अपनी दादागिरी से कईयों का जीना हराम कर रखा था। पर इस बार उसे ये भारी पड़ता दिख रहा है।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700







