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दिल्ली-मुंबई छोड़ कोलकाता क्यों पहुंचे मार्को रूबियो? 14 साल बाद ‘सिटी ऑफ जॉय’ में अमेरिकी विदेश मंत्री, 3 फैक्ट और 4 थ्योरीज में समझें

Marco Rubio Kolkata Visit: अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा इस बार कई वजहों से चर्चा में है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत नई दिल्ली या मुंबई जैसे पारंपरिक शहरों से नहीं, बल्कि कोलकाता से की. 23 मई 2026 की सुबह उनका जहाज कोलकाता में उतरा.  करीब 14 साल बाद कोई अमेरिकी विदेश मंत्री कोलकाता पहुंचा है. इससे पहले साल 2012 में हिलेरी क्लिंटन ने ‘सिटी ऑफ जॉय’ का दौरा किया था. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को ही पहली मंजिल क्यों चुना गया?

इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक कई तरह की चर्चाएं और एक तरह की कॉन्सिरेसी थ्योरीज (लोगों द्वारा लगाए जा रहे आंकलन) भी सामने आ रही हैं. हालांकि इसके पीछे कुछ ठोस कूटनीतिक कारण भी बताए जा रहे हैं.

पहला फैक्ट: बंगाल की नई राजनीतिक स्थिति

मार्को रूबियो का दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब पश्चिम बंगाल में हाल ही में बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की सरकार का पतन हो चुका है. अब बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद राज्य राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका यह समझना चाहता है कि पूर्वी भारत की नई राजनीतिक दिशा क्या असर डाल सकती है. कोलकाता का चुनाव इस बदले राजनीतिक माहौल को करीब से समझने की रणनीति भी हो सकता है.

दूसरा फैक्ट: QUAD और पूर्वी भारत की रणनीतिक अहमियत

भारत-अमेरिका संबंधों में अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सबसे अहम मुद्दों में शामिल है. कोलकाता भौगोलिक रूप से बंगाल की खाड़ी और पूर्वी एशियाई समुद्री मार्गों के काफी करीब माना जाता है. यही वजह है कि QUAD देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया  के बढ़ते सहयोग के बीच पूर्वी भारत का महत्व बढ़ गया है.  रूबियो के दौरे में ऊर्जा, रक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख हैं. रूबियो इस दौरे पर क्वॉड देशों के विदेश मंत्रियों के साथ मीटिंग भी करने वाले हैं. ऐसे में कोलकाता से यात्रा शुरू करना एक प्रतीकात्मक रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है.

तीसरा फैक्ट: मदर टेरेसा कनेक्शन

रिपोर्ट्स के मुताबिक मार्को रूबियो मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय ‘मदर हाउस’ भी जा सकते हैं. यह संस्था मदर टेरेसा से जुड़ी हुई है और दुनिया भर में मानवीय सेवा के प्रतीक के रूप में देखी जाती है. अमेरिका अक्सर अपनी विदेश नीति में ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ का इस्तेमाल करता रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ईसाई धार्मिक प्रतीकों का खुल कर इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में कोलकाता दौरे को मानवीय और सांस्कृतिक संदेश से भी जोड़ा जा रहा है.

अब बात कॉन्सिरेसी थ्योरीज की…

थ्योरी 1: क्या बंगाल की राजनीति पर अमेरिका की नजर?

सोशल मीडिया पर कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि अमेरिका पश्चिम बंगाल की नई राजनीतिक स्थिति को लेकर विशेष रुचि दिखा रहा है. कुछ यूजर्स का कहना है कि यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों को समझने की कोशिश भी हो सकता है. हाल ही भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के शपथ ग्रहण में भी गए थे. यह थोड़ा हैरान करने वाली खबर थी.

चूंकि पिछले लगभग दो साल से बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का पतन, मोहम्मद यूनुस का भारत विरोधी रवैया और तारिक रहमान की वापसी ने भारत के पड़ोसी देश में काफी हलचल मचा रखी थी. शेख हसीना ने तो यहां तक कह दिया था कि अमेरिका ने खुलकर कहा था कि उसे बांग्लादेश का सेंट मार्टिन आईलैंड चाहिए. इसी के बाद हसीना की मुलाकात दिल्ली में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से भी हुई थी. हालांकि, फिर भी उनकी सरकार नहीं बच सकी. दबी जुबान कहा गया कि इसके पीछे अमेरिका का हाथ था. इस बाबत एक अमेरिकी डिप्लोमैट की रिकॉर्डिंग भी वायरल हुई थी. हालांकि,  तमाम इस दावे का कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है.

स्ट्रेटजिक एक्सपर्ट नवरूप सिंह ने सोशल मीडिया पर इस बारे में बात की. उन्होंने कहा कि कोलकाता में एक तैयार एसेट का नुकसान और सीमा पार से जमात की पाइपलाइन! हमारे खुफिया जासूसों ने ‘ईस्टर्न कॉरिडोर’ की उन योजनाओं पर पानी फेर दिया है, जिनके लिए ढाका में तख्तापलट किया गया था. हालांकि, यह श्रीमान सिंह के निजी विचार हैं, प्रभात खबर इससे इत्तेफाक नहीं रखता.

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