
काशी में सदा की तरह उनके ठहरने की व्यवस्था दत्तराज कालिया (काले) के निवास पर हुई थी। काशी में उनका पूर्ण विश्राम हो, यह ध्यान में रखते हुये कोई कार्यक्रम नहीं रखे गये।
आते ही श्रीगुरुजी ने कार्यक्रमों के बारे में पूछा तब उन्हें बताया गया कि आपको यहाँ पूर्ण विश्राम करना है। प्रतिबन्ध हटने के बाद देशभर में उनके स्वागत कार्यक्रमों के कारण श्रीगुरुजी अत्यधिक श्रमित-थकित थे, इसलिये यह निर्णय लिया गया था।
उत्तर सुनते ही श्रीगुरुजी गम्भीर हो गये और समझाने लगे कि विश्राम की यह कल्पना ठीक नहीं है। कार्यक्रम अवश्य होने चाहिये।
नगर कार्यवाह डा. बनर्जी बोले- इस समय आप हमारे चार्ज में हैं और हमने कोई कार्यक्रम न रखकर आपके विश्राम की योजना बनायी है।
फिर श्रीगुरुजी कुछ नहीं बोले। पर रात होते ही उन्हें खाँसी का जोर पकड़ने लगा। दूसरे दिन प्रातः को देखा तो खाँसी से उनका बुरा हाल हुआ है, यह ध्यान में आया और सब चिन्तित हुये। वे रातभर खाँसते रहे। चेहरा, आँख लाल थीं। स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा था।
‘गुरुजी! यह क्या बात है? सोचा था विश्राम से आपको लाभ होगा किन्तु आपकी डा. बनर्जी ने पूछा स्थिति देखकर चिंता हो रही है।
गुरुजी बोले ‘मैं क्या कहूँ ? जो आप सबने सोचा उसी का यह परिणाम हो रहा है।
इस पर हम सबकी आँखों में आँसू आ गये। डॉ. बनर्जी का गला रुँध गया और वे श्रीगुरुजी से बोले- ‘हमने तो आपके स्वास्थ्य के हित में ही सारा विचार करके विश्राम का आयोजन किया था। उसका ऐसा उलटा परिणाम कैसे? आपके स्वास्थ्य में यह गिरावट देखकर हम सभी बन्धु बहुत व्याकुल हैं। बताइये हम क्या करें?’
गुरुजी बोले ‘देखो डॉक्टर ! तुम सोच रहे हो कि पूर्ण विश्राम से यह शरीर अच्छा हो जायेगा किन्तु ऐसी बात नहीं है। सच पूछो तो इस शरीर में ऐसा कुछ ज्यादा बचा नहीं है जिसके द्वारा यह चल सके।
डॉक्टरों के हिसाब से यह शरीर कभी का समाप्त हो चुका है। जब ये कार्य से अलग करवा दिया गया तो यह शरीर अपनी स्वाभाविक अवस्था की ओर जा रहा है।
सच्चाई तो यह है कि मैं दिनरात संघकार्य में लगा रहता हूँ इसी के कारण यह शरीर सथा हुआ है और चल रहा है। यदि तुम चाहते हो कि यह शरीर स्वस्थ रहे तो पूर्ण विश्राम के बजाय यथाविधि कार्यक्रम चलने दो।
तुरंत ही लोगों ने वैसा ही किया। देखते देखते ही फिर वार्तालाप और कार्यक्रमों के बीच श्रीगुरुजी की वही हँसी, वही ठहाका आरम्भ हो गया और दो तीन दिन में ही स्वास्थ्य पहले जैसा हो गया।
जीवन और जीवनकार्य इतने एकरूप हो सकते हैं, इसकी कभी कल्पना भी नहीं थी। सबकी आँखों के सामने यह एक जीता जागता उदाहरण था।
तब लोगों के समझ में आया कि इस महापुरुष ने तन से एवं मन से अपने आपको कार्य से एकाकार कर लिया है। अब शरीर से जीवनकार्य नहीं चल रहा है, अपितु जीवनकार्य ही शरीर को चला रहा है।







