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(अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषण) युद्धविराम का मिथक और वैश्विक शांति का संकट। विश्व ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता का दौर।

अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच समय-समय पर घोषित होने वाले युद्धविराम और शांति प्रयासों ने विश्व समुदाय के सामने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जब जब युद्धविराम की घोषणा हुई, कुछ ही समय बाद नए हमले, नई सैन्य कार्रवाइयाँ और नए आरोप सामने आ गए हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि शांति केवल कूटनीतिक घोषणा बनकर रह गई है, जबकि ज़मीनी स्तर पर संघर्ष समाप्त होने के बजाय और जटिल होता जा रहा है।। आज पूरा विश्व महँगाई, ऊर्जा संकट, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का सामना कर रहा है। युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता उसका प्रभाव तेल की कीमतों, खाद्यान्न, परिवहन, निवेश, रोजगार और आम नागरिक के जीवन तक पहुँचता है। यही कारण है कि मध्य-पूर्व का प्रत्येक तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
अमेरिका लंबे समय से इज़रायल का प्रमुख सहयोगी रहा है। उसके समर्थकों का तर्क है कि वह अपने सहयोगी की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, जबकि आलोचकों का मानना है कि अमेरिका के दोहरे मानदंड उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। दूसरी ओर इज़रायल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है, जबकि उसके विरोधियों का आरोप है कि अत्यधिक सैन्य बल से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है।
ईरान स्वयं को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता रहा है। अनेक पश्चिमी देश और कुछ क्षेत्रीय सरकारें आरोप लगाती रही हैं कि ईरान कुछ सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता है, जबकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है और अपनी नीति को राष्ट्रीय सुरक्षा तथा क्षेत्रीय संतुलन का हिस्सा बताता है। यही परस्पर अविश्वास इस संघर्ष को और गहरा करता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अनेक अवसरों पर कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे।।वहीं उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान वार्ता के लिए आगे आता है तो अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है। इन दो संदेशों।कड़े सैन्य रुख और कूटनीतिक संवाद के बीच का विरोधाभास विश्व समुदाय को असमंजस में डालता है।।इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार यह कहते रहे हैं कि इज़रायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और आवश्यकता पड़ने पर हर खतरे का जवाब देगा।।उनके अनुसार ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताएँ इज़रायल के अस्तित्व के लिए चुनौती हैं।
दूसरी ओर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और ईरानी नेतृत्व बार-बार यह कहते रहे थे कि ईरान किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अपनी संप्रभुता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करेगा।।ईरान यह भी आरोप लगाता है कि अमेरिका और इज़रायल क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं।
इन परस्पर विरोधी बयानों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सभी पक्ष स्वयं को शांति का समर्थक बताते हैं, तो युद्ध की आग बार-बार क्यों भड़क उठती है? क्या युद्धविराम वास्तव में स्थायी शांति का माध्यम है, या केवल सैन्य और कूटनीतिक पुनर्संयोजन का अवसर?
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कई बार सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और तत्काल तनाव कम करने की अपील की है। उनका स्पष्ट मत रहा है कि  मध्य-पूर्व किसी और युद्ध का भार नहीं उठा सकता। यह कथन केवल एक क्षेत्र की चिंता नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के भविष्य की चेतावनी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि महाशक्तियाँ शक्ति प्रदर्शन के बजाय विश्वास निर्माण को प्राथमिकता दें। इतिहास यह सिद्ध करता है कि युद्ध की राख से कभी स्थायी शांति नहीं जन्म लेती; स्थायी शांति केवल संवाद, पारस्परिक सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के निष्पक्ष पालन से ही संभव है।
इस प्रकार के संतुलित और सत्यापन योग्य उद्धरण आपके आलेख को अधिक विश्वसनीय और प्रकाशन-योग्य बनाते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शांति वार्ताएँ अक्सर युद्ध की तैयारी के समानांतर चलती दिखाई देती हैं। एक ओर बातचीत होती है, दूसरी ओर हथियारों की खरीद, सैन्य तैनाती और रणनीतिक गठबंधन तेज़ हो जाते हैं। इससे विश्व समुदाय के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युद्धविराम वास्तव में शांति के लिए है या केवल अगली सैन्य तैयारी के लिए समय जुटाने का माध्यम? संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता भी इस संकट में कठोर परीक्षा से गुजर रही है। यदि विश्व की सबसे बड़ी संस्थाएँ स्थायी शांति स्थापित करने में सफल नहीं होतीं, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमज़ोर पड़ता है।
आज जरूरत किसी एक देश का पक्ष लेने की नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक व्यवस्था की है जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और संवाद को हथियारों से अधिक महत्व मिले। विश्व युद्ध की आशंका, परमाणु हथियारों का खतरा और बढ़ती आर्थिक अस्थिरता मानव सभ्यता के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
इतिहास गवाह है कि युद्ध का कोई स्थायी विजेता नहीं होता। विजेता और पराजित दोनों की कीमत अंततः आम नागरिक चुकाते हैं। इसलिए विश्व नेतृत्व को शक्ति प्रदर्शन से अधिक विश्वास निर्माण, पारदर्शी कूटनीति और स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। यही मानवता के हित में सबसे बड़ा निवेश होगा।

संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,

कविता,
संजीव-नी।

तेरे मेरे शहर को इश्क़ का इक जहान बना दे।

तेरे शहर का हसीन मौसम, मेरे शहर का रंगीन मौसम,
क्यों दोनों को मिलाकर, मोहब्बत का हसीन अंजाम बना दे।

फ़ासलों की धूल को बरसात-ए-दिल से धो दे,
शिकवे को भूल कर, हसीन पैग़ाम बना दे।

न तेरी जीत, न मेरी हार का कोई ज़िक्र रहे,
दिल की इस अदालत में मुहब्बत का निज़ाम बना दे।

तेरी हँसी की रौशनी से मेरे रात भी जगमगा उठें,
मेरी वफ़ा को तेरे होंठों का मीठा-सा कलाम बना दे।

जो ख़्वाब अधूरे रह गए, उन्हें ताबीर मिल जाए,
दुआ के सभी लम्हों को ख़ुशियों का मुकाम बना दे।
ताबीर-परिणती,

नफ़रतों की आग कब तक घर जलाती ही रहेगी,
चलो उल्फ़त की इक बारिश से हर दिल गुलिस्ताँ बना दे।

हवाएँ भी गुनगुनाएँ, चाँद भी ठहर कर मुस्कुराए,
इश्क़ की इस दास्ताँ को रूह का इनाम बना दे।

संजीव बस यही दुआ है, उम्र भर ये साथ यूँ महके,
तेरे और मेरे शहर को इश्क़ का इक   जहान बना दे।

संजीव ठाकुर,रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415415,

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