
एक समझौता, तीन देश और बदलता पश्चिम एशिया. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का में हुआ नया रक्षा समझौता ऐसे समय में सामने आया है, जब ईरान के साथ सैन्य तनाव ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है.
इस समझौते में एक पर हमला, तीनों पर हमला जैसी सामूहिक सुरक्षा की भाषा इस्तेमाल की गई है.
हालांकि इसकी पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हैं, लेकिन सऊदी अरब के नजरिए से देखें तो यह समझौता सिर्फ पाकिस्तान और तुर्की को साथ लाने की कवायद नहीं, बल्कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था तलाशने की कोशिश भी है.
1. सऊदी अरब का सबसे बड़ा सवाल, ‘अमेरिका कब तक?’
मक्का समझौते को समझने के लिए सबसे पहले सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता को समझना होगा.
ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में हुए मिसाइल, ड्रोन और क्रूज मिसाइल हमलों ने सऊदी अरब समेत कई देशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि सिर्फ अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के भरोसे अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती.
यही वह बिंदु है जहां सऊदी अरब ने वैकल्पिक साझेदारियों की तलाश शुरू की. पाकिस्तान के साथ पहले से मौजूद रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाते हुए अब तुर्की को भी इसमें शामिल करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
इसका संदेश है- ‘अगर एक सुरक्षा छतरी कमजोर पड़ती है, तो दूसरी बनाई जाए.’
2. पाकिस्तान क्यों? पैसा सऊदी का, सैन्य ताकत पाकिस्तान की
लेकिन यहां एक अहम सवाल भी है, क्या यह समझौता संकट की स्थिति में पाकिस्तान को सऊदी की ओर से सीधे सैन्य हस्तक्षेप के लिए बाध्य करेगा? उपलब्ध बातचीत में इस संभावना को लेकर स्पष्टता नहीं है. पुराने सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौते के बावजूद ईरान के हमलों के दौरान पाकिस्तान की भूमिका सीमित रही थी.
3. तुर्की की एंट्री क्यों अहम है?
सऊदी अरब के लिए तुर्की केवल एक और सैन्य सहयोगी नहीं है. तुर्की के पास ड्रोन, रक्षा तकनीक, सैन्य उद्योग और एक बड़ा औद्योगिक आधार है.
यही वजह है कि नए समीकरण में पाकिस्तान और तुर्की की क्षमताएं एक-दूसरे को पूरक करती दिखाई देती हैं.
लेकिन इसे सीधे ईरान विरोधी सुन्नी गठबंधन कहना भी जल्दबाजी होगी. पाकिस्तान में बड़ी शिया आबादी है और तुर्की के ईरान के साथ लंबे समय से संबंध रहे हैं. इसलिए इस समझौते को केवल शिया बनाम सुन्नी के चश्मे से देखना इसकी जटिलता को कम कर देगा.
4. क्या असली लक्ष्य सिर्फ ईरान है? इजराइल भी समीकरण में है
ईरान इस समझौते की सबसे स्पष्ट सुरक्षा चिंता जरूर है, लेकिन इजराइल भी एक महत्वपूर्ण factor है.
गाजा और लेबनान में इजराइली सैन्य कार्रवाइयों को लेकर मुस्लिम देशों में असंतोष बढ़ा है. पाकिस्तान और सऊदी अरब के इजराइल के साथ औपचारिक संबंध नहीं हैं, जबकि तुर्की और इजराइल के संबंध भी तनावपूर्ण रहे हैं.
इसलिए मक्का समझौता पश्चिम एशिया में केवल ईरान के खिलाफ शक्ति-संतुलन की कोशिश नहीं हो सकता.
यह उस व्यापक असुरक्षा का भी हिस्सा है, जिसमें ईरान, इजराइल और अमेरिकी भूमिका- तीनों क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को प्रभावित करते हैं.
5. सऊदी अरब का ‘प्लान B’: अमेरिका रहे या न रहे, विकल्प तैयार
मक्का समझौते का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि सऊदी अरब अब एकल सुरक्षा गारंटर पर निर्भर नहीं रहना चाहता.
अमेरिका पिछले डेढ़-दो दशक से पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका को कम करने और एशिया की ओर रणनीतिक ध्यान बढ़ाने की बात करता रहा है. लेकिन क्षेत्रीय संघर्षों ने अमेरिकी pivot को आसान नहीं होने दिया. साथ ही, सऊदी और दूसरे खाड़ी देशों में अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता को लेकर सवाल भी उठे हैं.
ऐसे में पाकिस्तान और तुर्की के साथ रक्षा सहयोग को सऊदी अरब के प्लान B के रूप में देखा जा सकता है.
हालांकि इसे अभी कहना जल्दबाजी होगी. एक पर हमला, तीनों पर हमला जैसी भाषा राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव जरूर पैदा करती है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यह तय होगा कि किस तरह के हमले पर समझौता सक्रिय होगा, किस देश की सेना कब हस्तक्षेप करेगी और साझा सैन्य अभियान की वास्तविक व्यवस्था क्या होगी.






