
छत्तीसगढ़ को देश का धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की मिट्टी, जलवायु और किसानों की परंपरा धान की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल रही है। राज्य में खरीफ ऋतु के कुल क्षेत्रफल का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा धान की खेती के अधीन है। पिछले कई वर्षों में धान की खरीद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अच्छा लाभ मिला और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में छत्तीसगढ़ का योगदान सराहनीय रहा। लेकिन इस एकल फसल आधारित कृषि व्यवस्था की वजह से कई समस्याएं भी उभरकर सामने आई हैं। लगातार धान की खेती से मिट्टी की उर्वरता घट रही है, पानी की खपत अत्यधिक बढ़ गई है और भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। कई जिलों में भूजल की स्थिति गंभीर हो चुकी है। ग्रीष्मकालीन धान की खेती में भारी मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, जो जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है। साथ ही बाजार की अनिश्चितता और मौसम के जोखिम के कारण किसानों की आय में स्थिरता नहीं आ पा रही है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने कृषक उन्नति योजना को नया रूप दिया है। योजना का मूल उद्देश्य किसानों को धान के अलावा अन्य लाभकारी और टिकाऊ फसलों की ओर प्रोत्साहित करना है। अब जो किसान धान की जगह अन्य खरीफ फसलें बोएंगे या दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी तथा कपास की खेती करेंगे, उन्हें प्रति एकड़ 15,000 रुपये की सीधी आदान सहायता मिलेगी। यह राशि बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनीकरण और अन्य जरूरी आदानों की खरीद पर खर्च करने के लिए दी जाएगी। विशेष रूप से धान से अन्य फसलों पर स्विच करने वाले किसानों को प्राथमिकता दी जाएगी। योजना खरीफ-2026 से लागू होगी, जिससे इस सीजन से ही किसान इसका लाभ उठा सकेंगे।
लाभार्थियों के चयन और सहायता वितरण की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी होगी। किसानों को एकीकृत किसान पोर्टल पर पंजीयन करना होगा। एग्रीस्टैक के माध्यम से उनके खेतों का डिजिटल क्रॉप सर्वे किया जाएगा, जिससे फसल की सही पहचान और सत्यापन सुनिश्चित होगा। इससे लाभ केवल वास्तविक खेती करने वाले किसानों तक ही पहुंचेगा और किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सकेगा। सरकार का लक्ष्य है कि इस योजना के माध्यम से दलहन-तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों का क्षेत्रफल कई लाख एकड़ तक बढ़ाया जाए।
इस पहल का प्रभाव बहुआयामी होगा। फसल विविधीकरण से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार आएगा। दलहन फसलें प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। कोदो, कुटकी और रागी जैसे छोटे अनाज जलवायु अनुकूल हैं। ये फसलें कम पानी और कम आदानों में भी अच्छी पैदावार देती हैं। मक्का और कपास नकदी फसलें हैं, जो किसानों को बेहतर बाजार मूल्य दिला सकती हैं। इससे कृषि में जोखिम कम होगा क्योंकि एक फसल की असफलता पूरे वर्ष की आय को प्रभावित नहीं करेगी। बहु-फसली प्रणाली अपनाने से किसानों की कुल आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।
पर्यावरणीय दृष्टि से यह योजना अत्यंत महत्वपूर्ण है। धान की खेती में प्रति एकड़ औसतन 1200 से 1500 मिलीमीटर पानी की जरूरत पड़ती है, जबकि मक्का, दलहन या छोटे अनाजों में यह मात्रा आधी से भी कम होती है। योजना के सफल क्रियान्वयन से भूजल संरक्षण होगा, नदियों और तालाबों का जल स्तर सुधरेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद मिलेगी। लंबे समय में कृषि क्षेत्र अधिक टिकाऊ और जल-कुशल बनेगा।
आर्थिक रूप से देखें तो यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाली है। वैकल्पिक फसलों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ रही है। दलहन और तिलहन से पौष्टिक आहार उपलब्धता बढ़ेगी तथा प्रोसेसिंग उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और युवा पीढ़ी कृषि की ओर आकर्षित होगी। सरकार का अनुमान है कि योजना से किसानों की औसत आय में अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी, जिससे उनका जीवन स्तर सुधरेगा।
आधुनिक खेती तकनीक, बाजार लिंकेज और भंडारण की जानकारी देने की जरूरत है। इसके लिए सरकार को एक्सटेंशन सेवाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और बीज उत्पादन पर अधिक ध्यान देना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सत्यापन के लिए इंटरनेट पहुंच और जागरूकता बढ़ाने की चुनौती भी है, जिसके समाधान के रूप में हेल्पडेस्क और शिविरों का आयोजन किया जाएगा। बाजार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक फसलों पर भी समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था विकसित करने और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।
कृषक उन्नति योजना का यह नवीन स्वरूप छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए एक बड़ी राहत और प्रोत्साहन है। प्रदेश के किसान अब धान के साथ-साथ मक्का, अरहर, सोयाबीन या रागी की खेती करके अतिरिक्त लाभ ले सकेंगे। प्रति एकड़ 15,000 रुपये की सहायता उनके लिए नई उम्मीद जगाएगी। यह योजना केवल वर्तमान पीढ़ी के किसानों को सशक्त नहीं बनाएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी टिकाऊ कृषि की मजबूत नींव रखेगी। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय किसान-केंद्रित विकास का उत्तम उदाहरण है।









