
पिछले दिनों अल्पसंख्यक सलाहकार समिति के बैठक में राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा कि ‘अगले एक साल के अंदर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदाई तय है’। यह सुनकर देश ये सोचने को मजबूर हो गया कि ये कैसे संभव है। इससे पहले भी कई बार राहुल ने ऐसे समयावधि की जानकारी दी है कि बस अब इस बार इस समय मोदीजी जाएंगे। अब इस सरकार को काई बचा नहीं सकता। जो लोग राजनीति पर थोड़ी भी नजर रखते हैं वे राहुल गांधी के इस बयान को गंभीरता से नहीं ले रहे।

फेरबदल से ताकत बढ़ाएगी
प्रदेशों में फेरबदल कर अच्छे लोगों को और नये लोगों को मौका देकर कांग्रेस अपना दम बढ़ाना चाहती है। दरअसल वास्तविकता तो ये है कि कितना भी जोर लगा ले पर जब तक हिंदुओं को हिकारत और मुसलमानों को मोहब्बत (नाजायज) से देखना बंद नहीं करेगी, विधानसभा में विजय पताका फहराने में कामयाब नहीं होगी।
जब तक हिंदु देवी-देवताओं की उपेक्षा और अपमान करना बंद नहीं करेगी, हिंदुओं को जोड़ नहीं पाएगी।
आगामी लोकसभा चुनाव 2029 को घ्यान में रखते हुए कांग्रेस अपने सिपहसालारों में से कुछ को हटा सकती है तो कुछ नये नियुक्त कर सकती है। स्वाभाविक ही है। पश्चिम बंगाल, राजस्थान और दिल्ली के प्रभारी विषेश रूप से टॉरगेट में हैं। प्रदेशो में भी व्यापक स्तर पर बदलाव देखा जा सकता है।
पलटू पारस क्या करे….
ये सारी कवायद राजनीति का एक हिस्सा है और समझदार संगठन ऐसे कदम उठाता ही है लेकिन फिर भी यहां यह पलटू नामक संत की ये लाईनें लागू होती हैं कि ‘पलटू पारस क्या करे जो लोहा खोटा होए’। पारस पत्थर में लोहे को छू भर लेने से उसे सोना बना देने की क्षमता होती है लेकिन अगर लोहे में जंग लगा होगा तो पारस उसका कुछ नहीं कर सकता। लोहे को शुद्ध होना आवश्यक है तभी पारस भी काम कर पाएगा।
यहां तो कांग्रेस की अपनी नींव खोखली नजर आ रही है। जड़ और तने में सड़ांध व्याप्त है। ऐसे में कितना भी फेरबदल कर लें पेड़ फल देने में सफल होगा इसकी संभावना कम है।
भाई-भतीजावाद, पैसांे से पद की परम्परा हमेशा से रही है और पार्टी में चाटुकारों की चमक कायम है, ऐसे में किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
बात अगर केवल छत्तीसगढ़ की करें तो जब भाजपा ने पंद्रह साल काम कर लिया था तो चुनाव में कांग्रेस जीती नहीं थी बल्कि भाजपा हारी थी।
भाजपा की अपनी कमजोरियां थीं जिन्होंने उसे सत्ता से अलग कर दिया। कांग्रेस ने कोई पहाड़ नहीं खोद लिये थे कि जनता ने उसके सर राजमुकुट रख दिया।
हां ये कह सकते हैं कि तब कांग्रेसी नेताओं ने बहुत मेहनत कर भाजपा की एन्टी इंकमबैंसी को साध लिया था। अवसर का भरपूर लाभ उठाने में कामयाब रहे थे। चूके नहीं। भूपेष बघेल, टीएस सिंहदेव, चरण दास महन्त जैसे नेताओं ने अथक प्रयास किये और बड़ी समझदारी से परिस्थितियों को भुना लिया। बस। इतना ही। वरना अपनी हार के लिये जवाबदार भाजपा खुद ही रही थी।
ऐसे में राहुल गांधी को ये मुगालता हो जाए कि वे बड़े प्रभावषाली नेता हैं और जनता ने उनकी ‘सुनी’ तो ये उनका बचपना ही होगा। कमोबेश कांग्रेस के जो नेता जीत जाते हैं उसमें उनकी खुद की काबिलियत या सामने वाले की नाकाबिलियत होती है उसमें राहुल गांधी की कोई भूमिका नहीं होती। हां प्रधानमंत्री को कोस कर वे कांग्रेस को नुकसान जरूर पहुंचाते हैं।
अब नहीं चलता
कांग्रेस में बगावत पर डण्डा
जो कुछ कमजोरियां कांग्रेस में हैं वे भाजपा में नहीं हैं ऐसा नहीं है लेकिन कमोबेश भाजपा कहीं अधिक साफ-सुथरी है और भाजपा हाईकमान का मजबूत डण्डा लटकता है तो थोड़े दांएं-बाएं होने वाले नेता भी भाजपा के बढ़ते ग्राफ और साथ ही कांग्रेस की गिरती साख के चलते शान्ति से परिस्थितियों से समझौता कर चल पड़ते हैं।
कोई हठ या बगावत नहीं दिखाते। इसी तरह कभी ढीले दिखने वाले कार्यकर्ताओं को भी बड़ी आसानी से दुरूस्त कर दिया जाता है जिसका कांग्रेस में अभाव है।
मोदी के लिये अपशब्द
राहुल के नंबर घटाते हैं
बार-बार अपने बयानों में राहुल गांधी द्वारा मोदीजी के लिये ‘उसे, आएगा’ ‘जनता उसे भगा देगी’ जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जाना भी जनता को नहीं सुहाता। सारे बड़े नेता चाहे कितने भी कट्टर विरोधी हों, ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करते।
मंच से एक-दूसरे के लिये सम्मानजनक षब्द जैसे ‘उन्हें, वे, आएंगे’ का प्रयोग करते हैं पता नहीं राहुल क्यों ऐसे दोयम दर्जे के बयान और दोयम दर्जे के शब्दों का प्रयोग कर अपनी ही किरकिरी करवा लेते हैं।
क्या ये उनकी खीझ है, असफलता से उपजी झुंझलाहट है ?







