

तिथियां जरूरी नहीं जानकारी जरूरी है। बरसों पहले मुम्बई के हीरो सलमान खान ने चार लोगों की ज़िंदगी का खाता बंद कर दिया था। बेचारे, बिना सहारे, सो रहे थे सड़क किनारे। सड़क किनारे याने फुटपाथ पर। सबको पता है कि मुंबई में सड़क किनारे बहुत से लोग रात को अपनी गृहस्थी बसा लेते हैं जो होते हैं बिना घरद्वारे।
सलमान ने उनकी मुलाकात सीधे भगवान से करा दी। अपनी हाथी जैसी भारी-भरकम गाड़ी उन पर चढ़ा दी। मर गये चारों।
छत्तीसगढ में ऐसा ही हादसा हुआ है। यहां़ का सलमान खान है बेमेतरा का मेहरसिंह सलूजा। गाड़ी है करोड़ रूप्ये की डिफेण्डर। कुचल दिया 8 लोगांे को। 26 अक्टूबर की रात। सभी पहुंचे अस्पताल।
पर एक जीवनराम साहू का किसी ने इलाज नहीं किया।क्योंकि उसे इलाज की जरूरत ही महसूस नहीं हुई, क्योंकि वो बेचारा तो सबसे पहले उपर पहुंच गया था।
एक रईस की उछलकूद और एक गरीब की जान। बाकी सात का इलाज चल रहा है।
एक रसूखदार की मौजमस्ती बाकियों की सांसें।
निश्कर्ष:-
बरसों बरस मुम्बई के सलमान पर चलता रहा केस। निचली अदालत ने लगा दी पांच साल की। मगर हमारी कानून व्यवस्था में किसी रईस को सजा होती है भला ? कानून बोला ये क्या हुआ, सलमान को सजा ? क्या धरम-ईमान मर गया है ? छोड़ो उसे।
माननीय को बाइज्जत छोड़ दिया गया। बाल भी बांका नहीं हुआ। हां कमाया हुआ धन जरूर मामूली सा घट गया। एक्सीडेन्ट से बढ़ी लोकप्रियता से अपना रेट बढ़ाकर धन मेकअप कर लिया।
तो बस समझ लीजिये बेमेतरा के हीरो मेहरसिंह का भी कुछ नहीं बिगड़ना। छत्तीसगढ़ में रईसों का कभी-कभार ही कुछ बिगड़ता है। वरना तो कानून तो सिर्फ लोअर मिडिल क्लास और लोअर क्लास पर लागू होता है।
क्या करना चाहिये:-
पुलिस को क्या करना चाहिये ये पुलिस को पता है, यहां ये नहीं बताया जा रहा है। ऐसी जुर्रत नहीं कर सकते, आखिर हम भी बाल-बच्चेदार हैं। घायलों और मृतक के परिजनों को क्या करना चाहिये, ये बात हो रही है।
पीड़ितों को निसंकोच पैसा ले लेना चाहिये। गुस्से और दुख को काबू करें अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा। पैसा ले लें। यहां इंसान के जान की कीमत मिल सकती है, किसी को सजा नहीं मिल सकती। कानून बैठा है आरोपी को बचाने के लिये।
कम्पनसेशन:-
इसे कानून की भाषा में कहते हैं ‘कम्पनसेशन’। कितना वजनदार शब्द है न कम्पनसेशन, जान दो कम्पनसेशन लो। बड़ा इंसाफ पसंद और उदार कानून है हमारा।
करोड़ों की गाड़ी से कुचलने वाले को भयमुक्त करने के लिये शासन-प्रशासन के बड़े लोग उनके घर पहुंचेंगे, उनके भय को, थोड़ा सा अगर होगा तो कम्पनसेट करेंगे और फिर पीड़ितों के घर जाकर कम्पनसेट करेंगे ये बोलकर कि ‘अब जो हो गया सो हो गया। क्या होगा कोर्ट-कचहरी से ? सालों निकल जाएंगे। पेशी पर पेशी। तारीख पर तारीख। हासिल कुछ नहीं होना।
इसलिये पैसा ले लो आगे बच्चों का भविष्य देखो। बस। जयराम जी की। यही है इंसाफ।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’
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