लेख-आलेख

मुझे राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी, नहीं लौटा सकते तो उनके पास यहीं मिट्टी में मिल जाने दीजिए।
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मुझे राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी, नहीं लौटा सकते तो उनके पास यहीं मिट्टी में मिल जाने दीजिए।

मुझे राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी, नहीं लौटा सकते तो उनके पास यहीं मिट्टी में मिल जाने दीजिए। आपने देखा है न उन्हें। चौड़ा माथा, गहरी आंखे, लम्बा कद और वो मुस्कान। जब मैंने भी उन्हें पहली बार देखा, तो बस देखती रह गयी। साथी से पूछा- कौन है ये खूबसूरत नवजवान। हैंडसम! हैंडसम कहा था मैंने। साथी ने बताया वो इंडियन है। पण्डित नेहरू की फैमिली से है। मैं देखती रही। नेहरू की फैमिली के लड़के को। कुछ दिन बाद, यूनिवर्सिटी कैंपस के रेस्टोरेन्ट में लंच के लिए गयी। बहुत से लड़के थे वहां। मैंने दूर एक खाली टेबल ले ली। वो भी उन दूसरे लोगो के साथ थे। मुझे लगा, कि वह मुझे देख रहे है। नजरें उठाई, तो वे सचुच मुझे ही देख रहे थे। क्षण भर को नजरे मिली, और दोनो सकपका गए। अगले दिन जब लंच के लिए वहीं गयी, वो आज भी मौजूद थे। कहीं मेरे लिए इंतजार। मेरी टेबल पर वेटर आया, नैपकिन लेकर, जिस पर एक कविता लिखी थी।...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,  नारायण नारायण “राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक बधाईयाँ” 30 मई 1826 को पंडित युगुल किशोर शुक्ल जी ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन व संपादन आरम्भ कर पत्रकारिता को जन्म दिया । जिसकी याद में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है । कालांतर में 16 नवम्बर 1966 को भारतीय प्रेस परिषद का गठन किया गया और प्रत्येक वर्ष 16 नवम्बर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाने लगा परंतु पत्रकारिता के लगभग 19 दशक से अधिक के सफ़र में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद कुकरमुत्तों की तरह उग रहे वेब पोर्टलो की बाढ़ के चलते पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वह सोचनीय व चिंतनीय है । पत्रकारिता जो कभी एक मिशन हुआ करती थी ।
खास खबर, छत्तीसगढ़ प्रदेश, लेख-आलेख

वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, नारायण नारायण “राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक बधाईयाँ” 30 मई 1826 को पंडित युगुल किशोर शुक्ल जी ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन व संपादन आरम्भ कर पत्रकारिता को जन्म दिया । जिसकी याद में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है । कालांतर में 16 नवम्बर 1966 को भारतीय प्रेस परिषद का गठन किया गया और प्रत्येक वर्ष 16 नवम्बर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाने लगा परंतु पत्रकारिता के लगभग 19 दशक से अधिक के सफ़र में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद कुकरमुत्तों की तरह उग रहे वेब पोर्टलो की बाढ़ के चलते पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वह सोचनीय व चिंतनीय है । पत्रकारिता जो कभी एक मिशन हुआ करती थी ।

     बात बेबाक चंद्र शेखर शर्मा 【पत्रकार】 9425522015 नारायण नारायण "राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक बधाईयाँ" 30 मई 1826 को पंडित युगुल किशोर शुक्ल जी ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन व संपादन आरम्भ कर पत्रकारिता को जन्म दिया । जिसकी याद में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है । कालांतर में 16 नवम्बर 1966 को भारतीय प्रेस परिषद का गठन किया गया और प्रत्येक वर्ष 16 नवम्बर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाने लगा परंतु पत्रकारिता के लगभग 19 दशक से अधिक के सफ़र में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद कुकरमुत्तों की तरह उग रहे वेब पोर्टलो की बाढ़ के चलते पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वह सोचनीय व चिंतनीय है । पत्रकारिता जो कभी एक मिशन हुआ करती थी । कारपोरेट घरानो के प्रवेश के साथ व्यवसाय बन गयी । व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता में शर्म है कि आती नही और बेशर्मी जात...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, हमें तो अंग्रेजो से आजादी पैदा होने से पहले मिल गई थी । अब कंगना की खनक को 2014 में किससे मिली ये तो वो जाने । अपनी बचपन और जवानी के हसीन सालों में किसकी गुलाम रही वही बेहतर बता सकती है । वैसे रील और रियल लाइफ में बहुत अंतर होता है झांसी की रानी का रोल कर लेने से कोई झांसी की रानी नही बन
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, हमें तो अंग्रेजो से आजादी पैदा होने से पहले मिल गई थी । अब कंगना की खनक को 2014 में किससे मिली ये तो वो जाने । अपनी बचपन और जवानी के हसीन सालों में किसकी गुलाम रही वही बेहतर बता सकती है । वैसे रील और रियल लाइफ में बहुत अंतर होता है झांसी की रानी का रोल कर लेने से कोई झांसी की रानी नही बन

हमें तो अंग्रेजो से आजादी पैदा होने से पहले मिल गई थी । अब कंगना की खनक को 2014 में किससे मिली ये तो वो जाने । अपनी बचपन और जवानी के हसीन सालों में किसकी गुलाम रही वही बेहतर बता सकती है । वैसे रील और रियल लाइफ में बहुत अंतर होता है झांसी की रानी का रोल कर लेने से कोई झांसी की रानी नही बन जाता पर्दे में चरित्र को क्षणिक जिया जाता है असली जीवन मे उतारने के लिए पूरी जीवन शैली बदलनी पड़ती है । जब जब देश मे गप्पू भाई के खिलाफ माहौल बनता है तो कोई न कोई बेतुका बयान के साथ अवतरित होता है और चौकीदार की चौकीदारी पर लगने वाले दाग को धोने निकल पड़ता है । वैसे गप्पू भाई की टीम वालों ने माइंड वास में लिए हेमा जया सुषमा वाला निरमा चुन लिया है कंगना और एकता निरमा के साथ मिलने वाली बाल्टी की तरह मुफ्त में मिली उपहार की तरह है । विरोधियों ने सर्फ एक्सेल चुना और चमत्कार की उम्मीद में आक्सीजन बूस्टर का इंतज़...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, बाल दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ* करोना आँटी के लंबे लॉक डाउन के बाद मिली छूट में कर्फ्यू के बदनुमे दाग के बीच नवरात्रि , ईद , दिवाली के कुछ फुर्सत के पलों में अक्सर टहलते टहलते चाचा नेहरू के नन्हे मुन्नों की खुशहाली देखने की कोशिश में बस स्टैंड , होटल , मंदिर व चाट ठेले की ओर चक्कर लगाने के दौरान ऐसी जगहों पर कुछ बच्चे मोमोज , चाउमीन , मंचूरियन , गुपचुप ,चाट- पकोड़े के बीच मस्ती करते दिखे , कुछ मैले कुचैले कपड़ो में चंद पैसों की आस में उनके मां बाप की ओर लालच भरी नजरों से निहारते हाथ फैला –
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, बाल दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ* करोना आँटी के लंबे लॉक डाउन के बाद मिली छूट में कर्फ्यू के बदनुमे दाग के बीच नवरात्रि , ईद , दिवाली के कुछ फुर्सत के पलों में अक्सर टहलते टहलते चाचा नेहरू के नन्हे मुन्नों की खुशहाली देखने की कोशिश में बस स्टैंड , होटल , मंदिर व चाट ठेले की ओर चक्कर लगाने के दौरान ऐसी जगहों पर कुछ बच्चे मोमोज , चाउमीन , मंचूरियन , गुपचुप ,चाट- पकोड़े के बीच मस्ती करते दिखे , कुछ मैले कुचैले कपड़ो में चंद पैसों की आस में उनके मां बाप की ओर लालच भरी नजरों से निहारते हाथ फैला –

      बात बेबाक चंद्र शेखर शर्मा 【पत्रकार】9425522015 *बाल दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ* करोना आँटी के लंबे लॉक डाउन के बाद मिली छूट में कर्फ्यू के बदनुमे दाग के बीच नवरात्रि , ईद , दिवाली के कुछ फुर्सत के पलों में अक्सर टहलते टहलते चाचा नेहरू के नन्हे मुन्नों की खुशहाली देखने की कोशिश में बस स्टैंड , होटल , मंदिर व चाट ठेले की ओर चक्कर लगाने के दौरान ऐसी जगहों पर कुछ बच्चे मोमोज , चाउमीन , मंचूरियन , गुपचुप ,चाट- पकोड़े के बीच मस्ती करते दिखे , कुछ मैले कुचैले कपड़ो में चंद पैसों की आस में उनके मां बाप की ओर लालच भरी नजरों से निहारते हाथ फैला - " ऐ कुछ देना , भैया 10 रुपया दे ना ,  कुछ खिला ना " दर्द व करुणा भरी आवाज आजादी के 7 दशकों बाद भी आसपास सुनाई देती है । देश का भविष्य मैले कुचैले कपड़ो में हाथ फैलाये कुछ पाने की आस में पुकार लगाता है । कुछ दयालु रुपये दो रुपये दे देते है , कुछ खा...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक ,  ” हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमका मिली ” राजेश खन्ना अभिनीत 80 के दशक की फ़िल्म जनता हवलदार का यह गाना कल गोपाष्टमी पर गाय के प्रति लोगो के दिखते प्रेम और सड़कों पर डंडे खाती , गन्दगी में मुंह मारती , सडकों पर भटकने को मजबूर , आवारा सुवरों व कुत्तों के साथ गन्दगी कूड़ा साझा करती गौ माता को देख अनायास ही जुबा पर आ गया । ढेर में सुवरो के साथ संघर्ष कर अपना भोजन ढूंढती और कचरे से पेट की आग शांत करती चौक-चौराहों
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक , ” हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमका मिली ” राजेश खन्ना अभिनीत 80 के दशक की फ़िल्म जनता हवलदार का यह गाना कल गोपाष्टमी पर गाय के प्रति लोगो के दिखते प्रेम और सड़कों पर डंडे खाती , गन्दगी में मुंह मारती , सडकों पर भटकने को मजबूर , आवारा सुवरों व कुत्तों के साथ गन्दगी कूड़ा साझा करती गौ माता को देख अनायास ही जुबा पर आ गया । ढेर में सुवरो के साथ संघर्ष कर अपना भोजन ढूंढती और कचरे से पेट की आग शांत करती चौक-चौराहों

      बात बेबाक चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार) 9425522015 गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ.. " हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमका मिली " राजेश खन्ना अभिनीत 80 के दशक की फ़िल्म जनता हवलदार का यह गाना कल गोपाष्टमी पर गाय के प्रति लोगो के दिखते प्रेम और सड़कों पर डंडे खाती , गन्दगी में मुंह मारती , सडकों पर भटकने को मजबूर , आवारा सुवरों व कुत्तों के साथ गन्दगी कूड़ा साझा करती गौ माता को देख अनायास ही जुबा पर आ गया । अपने स्तन में अमृत रखने वाली गुणों की खान हमारी गौमाता पूरे दिन भूख मरती प्लास्टिक की झिल्ली , पिन लगी कार्टून के डब्बे , गन्दगी और कूड़े के ढेर में सुवरो के साथ संघर्ष कर अपना भोजन ढूंढती और कचरे से पेट की आग शांत करती चौक-चौराहों , सडकों पर डंडे खाती फिरती दिखती है । ऐसे हालात तब है जब हम धर्मभीरु कृषि प्रधान देश में रहते है , जहां राजनीति गऊ माता से प्रारंभ हो राम मंदिर पर चमकी और च...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, अकबर की छवि नया क्षेत्र होने के बावजूद मैनेजमेंट से चुनाव जीतने वाले नेता की रही है। यही वजह है कि कांग्रेस में वो जहां से चाहे वहां से टिकट मिल जाता है हाँलाकि राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि 60 हजारी लोकप्रिय अकबर के लिए 2023 का चुनाव केवल मैनेजमेंट के भरोसे जीतना आसान नहीं होगा अब
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक, अकबर की छवि नया क्षेत्र होने के बावजूद मैनेजमेंट से चुनाव जीतने वाले नेता की रही है। यही वजह है कि कांग्रेस में वो जहां से चाहे वहां से टिकट मिल जाता है हाँलाकि राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि 60 हजारी लोकप्रिय अकबर के लिए 2023 का चुनाव केवल मैनेजमेंट के भरोसे जीतना आसान नहीं होगा अब

बात बेबाक चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार) 9425522015 राजनीति एक ऐसी चीज है जहां हर कोई खुद को दूसरों से बेहतर बताकर अपना राजनीतिक हित साधना चाहता है । इस हित में और कुछ नहीं ‘सत्ता की मलाई के रसास्वादन का हित’ होता है | चुनाव नजदीक आते आते राजनीतिक उठापटक भी तेज होने लगती है । रोज नए नए समीकरण बनते बिगड़ते है । कोई साथ छोड़ता है तो कोई दामन थामता है । ऐसा किसी एक पार्टी में नहीं वरन दोनों बड़ी पार्टियो भाजपा व कांग्रेस में होता रहता है । कार्यकर्ताओ व पदाधिकारियो का आना जाना लालच , भय या सत्ता की मलाई के रस के चलते लगा रहता है । विगत चुनाव में कांग्रेस ने कवर्धा विधानसभा क्षेत्र के लिए मो अकबर पर अपना भरोसा जताया था और अकबर ने डॉ रमन के गढ़ में 60 हजारी जीत हासिल कर इतिहास रचा था । यंहा बताना लाजमी होगा कि अकबर राज्य विभाजन के बाद अजीत जोगी के तीन वर्षीय सरकार में मंत्री रह चुके साथ ही लगातार ...
(आलेख : बादल सरोज)   ध्रुवीकरण, विभाजन और उन्माद ही भाजपा के अंतिम अस्त्र
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(आलेख : बादल सरोज) ध्रुवीकरण, विभाजन और उन्माद ही भाजपा के अंतिम अस्त्र

  (आलेख : बादल सरोज) उर्दू के शायर सदा नेवतनवी साहब का शेर है कि : “अब है तूफ़ान मुक़ाबिल तो ख़ुदा याद आया हो गया दूर जो साहिल तो खुदा याद आया !!” 🔴 इन दिनों यह शेर पूरी तरह यदि किसी पर लागू होता है, तो वे हैं नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा में – गिनती जहाँ पूरी हो जाती है उस – दो नम्बर पर विराजे अमित शाह!! तीन महीने बाद फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के भाजपाई अभियान के प्रलाप का शंख उन्होंने देहरादून में खुदा-खुदा करके ही फूँका। अपने चिरपरिचित गोयबल्सी अंदाज में उन्होंने कथित तुष्टीकरण के तंज़ से भाषण देते हुए पूर्ववर्ती सरकारों पर जुमे के रोज सड़कों पर नमाज की अनुमति देने का आरोप लगाते हुए खुदा को याद किया। पहाड़ों में नगण्य उपस्थिति वाले मुसलमानों को निशाने पर लेकर उन्होंने वही तिकड़म आजमाई जिसमें वे और उनका कुनबा पूरी तरह सिद्ध है : हिन्दू खतरे में हैं का शोर मचाना और साम्प...
अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !!डॉo सत्यवान सौरभ की कविता
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अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !!डॉo सत्यवान सौरभ की कविता

अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !! ●●● मन को करें प्रकाशमय, भर दें ऐसा प्यार ! हर पल, हर दिन ही रहे, दीपों का त्यौहार !! ●●● दीपों की कतार से, सीख बात ले नेक ! अँधियारा तब हारता, होते दीपक एक !! ●●● फीके-फीके हो गए, त्योहारों के रंग ! दीप दिवाली के बुझे, होली है बेरंग !! ●●● दीये से बात्ती रुठी, बन बैठी है सौत ! देख रहा मैं आजकल, आशाओं की मौत !! ●●● बदल गए इतिहास के, पहले से अहसास ! पूत राज अब भोगते, पिता चले वनवास !! ●●● रुठी दीप से बात्तियाँ, हो कैसे प्रकाश ! बैठा मन को बांधकर, अंधियारे का पाश !! ●●● पहले से त्यौहार कहाँ, और कहाँ परिवेश ! अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !! ●●● मैंने उनको भेंट की, दिवाली और ईद ! जान देश के नाम जो, करके हुए शहीद !! ●●● -- डॉo सत्यवान सौरभ, रिसर्च स्कॉलर,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,” दाई बाबू अभी ले घर नई आय हे , हमन कपड़ा , फटाका खरीदे बर कब जाबो ? ए दारी भी बाबू दिवारी मा साहब मेमसाब अउ उंखर लइका मन के ही काम करत रही का ? फेर हमन दिवारी कब मनाबो
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,” दाई बाबू अभी ले घर नई आय हे , हमन कपड़ा , फटाका खरीदे बर कब जाबो ? ए दारी भी बाबू दिवारी मा साहब मेमसाब अउ उंखर लइका मन के ही काम करत रही का ? फेर हमन दिवारी कब मनाबो

" दाई बाबू अभी ले घर नई आय हे , हमन कपड़ा , फटाका खरीदे बर कब जाबो ? ए दारी भी बाबू दिवारी मा साहब मेमसाब अउ उंखर लइका मन के ही काम करत रही का ? फेर हमन दिवारी कब मनाबो , हमन नवा कपड़ा कब ख़रीदबो - पहनबो अउ फटाका फोरबो ? दाई दाई सब्बो झन मिल के बाबू संग कब तिहार मनाबो । बाल मन की पीड़ा जो आज भी हकीकत बनी हुई है । दीपावली जैसे त्योहार पर चतुर्थ श्रेणी , दैनिक व संविदा कर्मियों में मुफ्त के गुलाम खोजती अफसरशाही व जनप्रतिनिधियों के कारण अक्सर ऐसे हालात देखने को मिल ही जाते है । जनता जनार्दन को मुफ्तखोर कहने और मुफ्तखोरी की योजनाओं को त्यागने की नसीहत देने से पहले साहब खुद तो मुफ्त के कामगारों से मुक्त होईये । हम तो आम जनता है बस आपसे निवेदन कर सकते है । सरकार ने आपको जो सुविधा दी है उसका उपयोग करें दुरूपयोग नहीं । बड़का बड़का साहब अधिकारी और नेता जो शासकीय सेवा और सत्ता का रसास्वादन के दौरान ...
वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,व्हाइट टाइगर से जोगी,डॉक्टर, दाऊ तक का शासन और एक राजा की दावेदारी राज्य स्थापना दिवस पर विशेष
खास खबर, छत्तीसगढ़ प्रदेश, लेख-आलेख

वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,व्हाइट टाइगर से जोगी,डॉक्टर, दाऊ तक का शासन और एक राजा की दावेदारी राज्य स्थापना दिवस पर विशेष

छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएँ छत्तीसगढ़ गठन के दौरान छत्तीसगढ़ के सफेद शेर के यहाँ तत्कालीन राजा की ठुकाई के बाद जोगिया रंग में रंगा छत्तीसगढ़ भय भूख और भ्रष्टाचार के आतंक से थर्रायी जनता ने विकास की आस में कमल खिलाया । मरीजो की नब्ज टटोल उनकी बीमारी का इलाज करने वाले डॉ साहब ने छत्तीसगढिहा मनखे की नब्ज पकड़ राज्य में 15 सालों तक राज किया किंतु रमन राज में बेलगाम होती अफसरशाही , कार्यकर्ताओ की अनदेखी ने भाजपा की लुटिया डुबो दी और 15 साल के वनवास के बाद कांग्रेस सत्ता की मलाईदार कुर्सी तक पहुंची जरूर है पर राज्य में मुफ्तखोर बनाती योजनाओं खजाने की बिगड़ती माली हालत , बेलगाम कार्यकर्ता , राजा साहब और दाऊ के बीच अढ़ईया का शीतयुद्ध , भ्रष्टाचारीयो की जुगलबंदी , बेलगाम होती अफसरशाही बता रही कि सत्ता के अंदरखाने में सबकुछ ठीक नही है । वैसे सत्ता के गलियारे में बस अलीबाबा ही बदलत...