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चीन की नजर भारत की ‘गर्दन’ पर, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास पहुंचा ड्रैगन का राजदूत, समझिए INDIA के लिए ये खतरे की घंटी क्यों?

भारत के नक्शे को अगर आप गौर से देखेंगे, तो पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के पास जमीन की एक बहुत पतली पट्टी दिखेगी. इसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे अक्सर भारत की चिकन नेक (Chicken’s Neck) कहते हैं, क्योंकि यह मुर्गे की गर्दन जैसी पतली है. यह उपनाम इसे रणनीतिक और सैन्य हलकों में इसकी भौगोलिक कमजोरी और महत्व के कारण दिया गया है. सलीगुड़ी कॉरिडोर तीन देशों से घिरा हुआ है पहला पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान और दक्षिण में बांग्लादेश से है. यह पट्टी करीब 60 किलोमीटर लंबी है और इसकी चौड़ाई कहीं-कहीं तो महज 22 किलोमीटर ही है.

सुनने में भले ही यह छोटा सा इलाका लगे, लेकिन यह भारत के लिए बहुत जरूरी है. यह एकमात्र जमीनी रास्ता है जो बाकी भारत को हमारे आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों (सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय) से जोड़ता है. इन राज्यों की आबादी 40 मिलियन से ज्यादा है. खाने का सामान, मिलिट्री का सामान और ट्रेनें, सब इसी कॉरिडोर से गुजरते हैं. अगर किसी लड़ाई के दौरान यह रास्ता बंद हो जाता है, तो उत्तर-पूर्वी राज्य जमीन के रास्ते देश के बाकी हिस्सों से पूरी तरह कट जाएंगे.

आजकल चीन इसी ‘गर्दन’ पर अपनी टेढ़ी नजर गड़ाए हुए है. आइए समझते हैं पूरा मामला क्या है.

बांग्लादेश में तख्तापलट और चीन की एंट्री

अगस्त 2024 में बांग्लादेश में बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ. लंबे समय से सत्ता में रहीं प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिर गई और इसके बाद देश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के लीडरशिप में अंतरिम सरकार बनी.

इसी बदलाव के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में भी साफ शिफ्ट देखा गया. शेख हसीना के दौर में बांग्लादेश की नीति भारत के काफी करीब मानी जाती थी, लेकिन यूनुस सरकार के आने के बाद यह संतुलन बदलता दिखा. दिसंबर 2025 में संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट (भारत-बांग्लादेश संबंधों का भविष्य) में कहा गया कि नई अंतरिम सरकार का झुकाव पहले के मुकाबले चीन की ओर ज्यादा बढ़ा है.

यही वह बिंदु है, जहां बांग्लादेश का रोल सीधे भारत की रणनीतिक चिंता से जुड़ता है. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस मौके का फायदा उठाकर भारत की सीमा से सटे इलाकों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट, इन्वेस्टमेंट और रणनीतिक सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं. डॉयचे वेले (DW) जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यूनुस सरकार ने चीन के साथ आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते तेजी से आगे बढ़ाए हैं. चीन ने बांग्लादेश को निवेश, कर्ज और परियोजनाओं के जरिए समर्थन दिया है, जिससे बीजिंग का प्रभाव और गहरा हुआ है.

तीस्ता प्रोजेक्ट: चीन के राजदूत याओ वेन ने तीस्ता प्रोजेक्ट वाली जगह का दौरा किया, जो भारत के चिकन नेक के बहुत करीब है. रविवार, 18 जनवरी को चीन के राजदूत और बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान के बीच बैठक हुई. इसके बाद मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के प्रेस विंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि दोनों देशों ने आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की और सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई.

बैठक में तीस्ता परियोजना और प्रस्तावित बांग्लादेश-चीन फ्रेंडशिप अस्पताल पर भी चर्चा हुई. इस दौरान जल संसाधन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन भी मौजूद थीं. उन्होंने बताया कि चीन तीस्ता मास्टर प्लान पर काम शुरू करने को तैयार है, लेकिन फिजिबिलिटी स्टडी पूरी न होने के कारण फिलहाल काम आगे नहीं बढ़ पाया है. भारत को डर है कि डेवलपमेंट के बहाने चीन यहां जासूसी कर सकता है.

तीस्ता नदी जो कि सिक्किम से निकलकर उत्तर बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और आगे ब्रह्मपुत्र (जमुना) नदी में मिल जाती है. बांग्लादेश के रंगपुर, लालमोनिरहाट, नीलफामारी और कुरीग्राम जिलों के लिए यह नदी खेती, इरीगेशन और रोजगार की बड़ी सहारा है, खासकर सूखे मौसम में. भारत के लिए भी, खासकर उत्तर बंगाल के लिए, तीस्ता नदी उतनी ही अहम है. इसी वजह से भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता वाटर शेयरिंग को लेकर दशकों से बातचीत चल रही है.

मोंगला पोर्ट: भारत की विदेश मामलों की संसदीय समिति की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश ने अपने मोंगला बंदरगाह के विस्तार के लिए चीन के साथ 370 मिलियन डॉलर का समझौता किया है.

लालमोनिरहाट एयरबेस: बांग्लादेश का लालमोनिरहाट एयरबेस इन दिनों भारत के लिए चिंता की वजह बना हुआ है. चीन इस एयरबेस को सुधारने और दोबारा सक्रिय करने में मदद कर रहा है. सबसे बड़ी चिंता इसकी लोकेशन को लेकर है. यह एयरबेस भारत की सीमा से सिर्फ 12 से 20 किलोमीटर की दूरी पर है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है, के बेहद करीब स्थित है.

लालमोनिरहाट एयरबेस को अंग्रेजों ने साल 1931 में बनाया था और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया गया था. बांग्लादेश की आजादी के बाद से यह एयरबेस ज्यादातर समय बंद ही रहा. अभी यहां बांग्लादेश वायुसेना की एक रखरखाव इकाई मौजूद है, लेकिन उड़ानों या बड़े सैन्य अभियानों के लिए इसका इस्तेमाल नहीं होता.

भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों को डर है कि यदि इस एयरबेस के अपग्रेड में चीनी टेकनीक या मदद का इस्तेमाल होता है, तो यह भारत की जासूसी और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकता है. भारत के संसदीय पैनल ने भी अपनी रिपोर्ट में चीन के इस बढ़ते दखल पर कड़ी सतर्कता बरतने की सलाह दी है. हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने सफाई देते हुए कहा है कि इसे सिर्फ राष्ट्रीय आवश्यकताओं और नागरिक इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है. उनका कहना है कि इसे किसी विदेशी शक्ति को युद्ध या निगरानी के लिए देने की फिलहाल कोई योजना नहीं है.

‘ग्रेटर बांग्लादेश’ और अरुणाचल पर चीन का दावा

बांग्लादेश में अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद मोहम्मद यूनुस के प्रशासन का रुख भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है. यूनुस प्रशासन पर भारत-विरोधी नैरेटिव सेट करने के आरोप लग रहे हैं. हाल ही में विवाद तब गहरा गया जब मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरपर्सन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा को एक ऐसा नक्शा भेंट किया, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (नॉर्थ-ईस्ट) को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया था. सोशल मीडिया पर वायरल इस नक्शे को ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ की सोची-समझी कल्पना के तौर पर देखा जा रहा है.

यूनुस प्रशासन घरेलू राजनीति में समर्थन जुटाने और अपनी आलोचनाओं से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे प्रतीकात्मक कदम (सिम्बोलिक स्टेप) उठा रहा है. इसके साथ ही, यूनुस ने बांग्लादेश में चीन के इन्वेस्टमेंट और प्रभाव को जिस तरह खुला न्योता दिया है, उसने भारत की सुरक्षा टेंशन बढ़ा दी है.

उधर, चीन भी सीमा विवाद को हवा दे रहा है. 21 नवंबर 2025 को शंघाई एयरपोर्ट पर एक भारतीय नागरिक को सिर्फ इसलिए रोका गया क्योंकि वह अरुणाचल प्रदेश का निवासी था. चीन का अरुणाचल पर विवादित दावा और बांग्लादेश की नई सरकार का यह बदला हुआ रवैया, भारत की घेराबंदी करने की एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है.

डोकलाम विवाद और चिकन नेक का कनेक्शन

चिकन नेक के पास ही डोकलाम का इलाका है, जहां भारत और चीन के बीच पहले भी बड़ा विवाद हो चुका है. डोकलाम भूटान, भारत और चीन के बॉर्डर पर स्थित एक ऊंचा पठार है. साल 2017 में जब चीन ने यहां सड़क बनाने की कोशिश की, तो भारतीय सेना ने उसे 73 दिनों तक रोके रखा था. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन की चाल डोकलाम पर कब्जा कर चुंबी घाटी के जरिए भारत के और करीब आने की थी. भारतीय सेना ने बड़ी मुस्तैदी से चीन को वहां रोक दिया था, लेकिन चीन अभी भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के मौके तलाश रहा है.

नेपाल-बांग्लादेश की नजदीकी और सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक)

चिकन नेक की संवेदनशीलता (सेंसिटिविटी) इस बात से भी समझी जा सकती है कि यहां से नेपाल और बांग्लादेश की सीमाएं बहुत पास हैं. नेपाल का ‘भद्रपुर’ और बांग्लादेश का ‘तेतुलिया’ (Tetulia) एक-दूसरे के सबसे करीब हैं. इन दोनों के बीच की दूरी मात्र 22 से 27 किलोमीटर के आसपास है. यह पूरा इलाका भारत का वही पतला गलियारा है. अगर इन दोनों देशों के बीच चीन का प्रभाव बढ़ता है, तो भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां और बढ़ जाएंगी.

भारत का ‘प्लान-बी’: बांग्लादेश पर निर्भरता कम करना

भारत हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है. विश्वामित्र रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार, भारत ने बांग्लादेश पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए नॉर्थईस्ट मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी प्लान (NMCP) को मार्च 2024 में हरी झंडी दी थी.

सिटवे बंदरगाह और कलादान प्रोजेक्ट: भारत म्यांमार के सिटवे पोर्ट को कोलकाता से जोड़ रहा है. इससे सामान समुद्र के रास्ते म्यांमार पहुंचेगा और वहां से सड़क के जरिए सीधे मिजोरम. यानी अब हमें सिर्फ चिकन नेक के भरोसे नहीं रहना होगा.

नए प्रोजेक्ट्स: 18 जनवरी 2026 को पीएम मोदी ने असम के जोगीघोपा में लॉजिस्टिक्स पार्क बनाने की घोषणा की. साथ ही काजीरंगा में 6,950 करोड़ रुपये की लागत से एलिवेटेड रोड बनाई जा रही है. केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल के मुताबिक, इससे ऊपरी असम (डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया) तक पहुंचना आसान हो जाएगा.

क्या होगा इसका असर?

विश्वामित्र रिसर्च फाउंडेशन का कहना है कि अगर भारत म्यांमार वाला रूट पूरी तरह चालू कर लेता है, तो बांग्लादेश को बड़ा आर्थिक झटका लगेगा. अभी भारत के ट्रक बांग्लादेश के रास्तों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे बांग्लादेश को मोटा ट्रांजिट फीस और टैक्स मिलता है. नया रास्ता खुलने से बांग्लादेश की यह कमाई बंद हो सकती है. फिलहाल, चीन की हरकतों और बांग्लादेश के बदलते सुरों पर भारत सरकार और विदेश मंत्रालय इस पर कड़ी नजर रख रहा है. ‘चिकन नेक’ की सुरक्षा भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता प्रायोरिटी है.

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