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हरी खाद के तौर पर धैचा अपनाकर किसान घटाएं यूरिया की खपत

*- नाइट्रोजन स्थरीकरण से बढ़ती है भूमि में उर्वरता*

 

*- धैचा पोषक तत्वों एवं सूक्ष्म जीवों से भरपूर*

 

*- जिले के फसल चक्र के अनुरूप किसानों को दी गई सलाह*

 

*- कृषि विभाग द्वारा हरी खाद के रूप में धैचा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किसानों को कुल लागत राशि का 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान करने का किया गया प्रावधान*

 

राजनांदगांव 31 मई 2026। कृषि विभाग द्वारा किसानों को हरी खाद के रूप में धैचा (सेसबेनिया) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। धैचा एक दलहनी फसल है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया की आवश्यकता को कम करती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धैचा की बुवाई मानसून के प्रारंभ में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती है। बुवाई के लगभग 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचे हो जाएं तथा फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में हों, तब उन्हें ट्रैक्टर चालित डिस्क हैरो, रोटावेटर अथवा मिट्टी पलटने वाले हल से खेत में दबाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने पर लगभग 15 से 20 दिनों में धैचा सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाता है और उसके पोषक तत्व फसलों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। धैचा के विघटन से भूमि में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन तथा अन्य पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इससे मिट्टी की संरचना, जलधारण क्षमता एवं लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों में वृद्धि होती है, जिसका सकारात्मक प्रभाव आगामी फसलों के उत्पादन पर पड़ता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार धैचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध होती है। इतनी नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए लगभग 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार धैचा के उपयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत संभव है।

धैचा (हरी खाद) में 40-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन उपलब्ध है। इसमें अपेक्षाकृत कम लागत आती है। यह मिट्टी की उर्वरता, जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ाता है तथा पर्यावरण अनुकूल है। वहीं रासायनिक यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन उपलब्धता होती है। इसमें अधिक लागत आती है। मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय में प्रभावित कर सकता है। यह जैविक कार्बन को नहीं बढ़ाता है। सूक्ष्मजीव गतिविधि को प्रभावित कर सकता है। अधिक उपयोग से प्रदूषण की संभावना होती है। इच्छुक किसान बीज प्रक्रिया केंद्र बीज निगम कार्यालय कौरिनभाठा राजनांदगांव से धैचा बीज प्राप्त कर सकते हैं। कृषि विभाग द्वारा हरी खाद के रूप में धैचा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किसानों को कुल लागत राशि का 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। किसान इस योजना का लाभ लेकर अपनी खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत में सुधार कर सकते हैं। कृषि विभाग द्वारा किसानों से संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हुए धैचा जैसी हरी खादों का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील की है। जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो तथा कृषि उत्पादन को टिकाऊ बनाया जा सके।

जिले में प्रचलित धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्र में धैचा को हरी खाद के रूप में अपनाने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की उपलब्धता हो सकती है तथा 2-3 बोरी यूरिया की बचत संभव है। मानसून प्रारंभ होते ही धैचा की बुवाई करें। 35-40 दिन की अवस्था में फूल आने से पहले मिट्टी में मिला दें। 15-20 दिन बाद मुख्य फसल की बुवाई व रोपाई करें।

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