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ईरान पर हमले से बढ़ी वैश्विक अनिश्चितता, पढ़ें पूर्व विदेश सचिव शशांक का आलेख

इस्राइल ने अमेरिका की मदद से शनिवार की सुबह ईरान की राजधानी तेहरान समेत कई शहरों पर ताबड़तोड़ हमले कर जिस तरह उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई को निशाना बनाया, उसके बाद ईरान समेत पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता फैल गयी है. इस्राइल ने हमले की शुरुआत ही ईरान के खुफिया मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, सुप्रीम लीडर खामेनेई और ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन को निशाना बनाकर की. खामेनेई के मारे जाने पर ईरान में 40 दिन के राजकीय शोक और सात दिन की छुट्टी घोषित की गयी है. ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर की मौत का भीषण बदला लेने की बात भी कही है. खामेनेई को खत्म कर इस्राइल और अमेरिका फौरी तौर पर अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है. पिछले साल ईरान की जनता जब सड़कों पर उतर गयी थी, तब अमेरिका ने उसका समर्थन किया था. ट्रंप प्रशासन ने तब कहा भी था कि अगर आंदोलनरत नागरिकों को निशाना बनाने की कोशिश की गयी, तो तेहरान को उसका अंजाम भुगतना पड़ सकता है. ईरान पर हमले के दौरान नेतन्याहू की यह टिप्पणी, कि ईरानियों को भाग्य बदलने का मौका मिलेगा, इस्राइल-अमेरिका के इसी उद्देश्य के बारे में बताती है.

ईरान पर यह हमला ओमान की मदद से ईरान और अमेरिका के बीच जिनेवा में परमाणु हथियारों को लेकर चली बातचीत के बेनतीजा रहने के दो दिन बाद हुआ है. वार्ता में बैलेस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया था और ईरान इस पर समझौता करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है. उसका कहना था कि बातचीत केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगी, मिसाइल या क्षेत्रीय समूहों पर नहीं. ईरान का यह भी मानना था कि पिछले साल जून में जब इस्राइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया था, तब ईरान की मिसाइलों ने उसकी रक्षा की थी. ईरानी अधिकारियों ने बार-बार यह कहा है कि मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बात नहीं होगी. यह ईरान की रक्षात्मक क्षमता है और इसे छोड़ने का अर्थ खुद को कमजोर करना होगा. जबकि ट्रंप ने कहा है कि इस कार्रवाई का मकसद अमेरिका और उसके लोगों को खतरे से बचाना है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही ईरान पर हमले की धमकी दी थी. अमेरिकी सेना ईरान को घेर चुकी थी.

हमले से पहले अमेरिका ने अपने नागरिकों से तुरंत इस्राइल छोड़ने के लिए कहा था. इस्राइली हमले के जवाब में ईरान ने भी पलटवार करते हुए मिसाइलें दागी हैं. उसने इस्राइल के अलावा कुवैत, कतर, बहरीन और सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात के सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर दुबई को भी निशाना बनाया है. उसने चेतावनी दी है कि इस्राइल-अमेरिकी हमलों का पूरी मजबूती से जवाब दिया जायेगा. उसने यह भी धमकी दी है कि हमला बेशक इस्राइल ने शुरू किया हो, लेकिन इसे खत्म ईरान करेगा. ईरान को हूती विद्रोहियों के अलावा हिजबुल्लाह का साथ मिल गया है. ईरान ने पहली बार सैकड़ों किलोमीटर दूर तक हमला कर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया है. खाड़ी देशों में सुरक्षित माने जाने वाले संयुक्त अरब अमीरात में ईरानी मिसाइलों का गिरना बड़ी बात है.

अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी दशकों पुरानी है. वर्ष 1953 में ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक के तख्तापलट के साथ ईरान में अमेरिका-विरोध की बुनियाद पड़ी थी. दरअसल मोसद्दिक ने ईरान के हितों की रक्षा के लिए ब्रिटिश स्वामित्व वाली ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. अमेरिका-ब्रिटेन ने उसे अपने रणनीतिक हितों के विरुद्ध माना और मोसद्दिक का तख्तापलट कर दिया. उसके बाद रजा पहलवी की सत्ता बहाल हुई. पहलवी के दौर में ईरान अमेरिका समर्थक और उसके हितों का संरक्षक बना रहा. लेकिन दो दशक बाद ईरान में पहलवी और अमेरिका का तीखा विरोध शुरू हुआ. फरवरी, 1979 में पहलवी ने जान बचाने के लिए ईरान छोड़ दिया. अयातुल्लाह खुमैनी की वापसी हुई और एक अप्रैल, 1979 से ईरान इस्लामी गणतंत्र घोषित हो गया. फिर तो ईरान और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते ही गये.

इस बीच ताकतवर अमेरिका से मुकाबले के लिए ईरान अपनी सैन्य क्षमता के विस्तार के साथ ही परमाणु ताकत विकसित करने की कोशिश में लगा रहा. दूसरी ओर, अमेरिका किसी भी तरीके से ईरान को परमाणु संपन्न होने से रोकने के लिए कमर कसे हुए है. इस जंग पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं आश्वस्त तो करती हैं, पर देखने की चीज यह है कि इनका कितना दबाव दोनों पक्षों पर पड़ता है और संयुक्त राष्ट्र इस पर क्या कदम उठाता है. फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इस्राइल और ईरान, दोनों से हमले रोकने के लिए कहा है, तो रूस ने ईरान पर हमले रोकने की आलोचना की है, जबकि ब्रिटेन ने वार्ता से हल निकालने की बात कही है.

जहां तक भारत की बात है, तो हमारे लिए ईरान और इस्राइल, दोनों महत्वपूर्ण हैं. इस्राइल के साथ हमने अपनी साझेदारी को हाल ही में और मजबूत किया, तो ईरान के साथ हमारे गहरे आर्थिक रिश्ते हैं. ईरान का अशांत रहना भारत की ऊर्जा जरूरतों के हित को बाधित कर सकता है. इस जंग से पश्चिम एशिया की शांति और स्थिरता दांव पर लगी है.

जबकि भारत के लिए पश्चिम एशिया का पूरा इलाका बेहद महत्वपूर्ण है, जहां लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं. ईरान पर हमले से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इस्राइल में कहा था कि मध्य एशिया की स्थिरता और शांति से भारत के हित जुड़े हैं. इस जंग पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने चिंता जतायी है और यह प्रतिक्रिया जतायी है कि हम सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव बढ़ने से बचने और आम लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह करते हैं. इसमें दोनों पक्षों को सुझाव देते हुए कहा गया है कि तनाव कम करने और अंदरूनी मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत और डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाया जाना चाहिए. गौरतलब है कि शनिवार को ही भारत ने ईरान और इस्राइल में रहने वाले अपने नागरिकों को अत्यधिक सावधानी बरतने और सतर्क रहने की सलाह दी थी. ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने भी अपने नागरिकों से सावधानी बरतने, आसपास की स्थितियों के प्रति जागरूक रहने और दूतावास से आगे मिलने वाले निर्देशों का इंतजार करने के लिए कहा है. जाहिर है, इस संकट से वैश्विक अनिश्चितता और बढ़ी ही है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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