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हे शशिमोहन ! तुम कहां हो… राजधानी को जरूरत है आपकी…. क्या यही है स्वतंत्रता…. वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी…. खरी….

राजधानी में जिस स्पीड से अपराध खासतौर पर चाकूबाजी बढ़ रही है अनायास ही पुलिस अधिकारी शशिमोहन सिंह की याद आ रही है।

अनुभव कहता है कि स्वतंत्रता दिवस पर केवल शारीरिक स्वतंत्रता ही मिली है। न न्याय है न सम्मान। ऐसे में इसे पूर्ण स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता।

दुख की बात ये है कि अब तो शारीरिक स्वतंत्रता भी नहीं दिख रही है। इंसान मर्जी से कही आ-जा नहीं सकता। समाज में फैले असामाजिक तत्वों ने न्याय,सुरक्षा और सम्मान की धारणा को ध्वस्त कर रखा है।

अगर ऐसा नहीं है तो धमतरी-नगरी स्टेट हाईवे पर कुछ लड़के नशे मे धुत्त होकर यूं लोगों की जिंदगियों से खिलवाड़ नहीं करते। इन लोगों ने पहले कुछ वाहनचालकों को पीटा फिर रायपुर से घूमने के लिये निकले, ढाबे में खाना खाने गये तीन लड़कों को चाकू मार-मारकर जान से मार डाला।

क्या यही है स्वतंत्रता ? 

वास्तव में उन चंद लोेेगों की किस्मत में येे स्वतंत्रता है, जिनके लिये प्रशासन काम करता है। क्या पुलिस का खौफ केवल शरीफ आदमी के लिये रह गया है ? क्यों अपराधी डरते नहीं ?

जिन लड़कों ने रायपुर के निरपराध तीन दोस्तों को मार डाला उन्हें पुलिस का डर क्यों नहीं है ? कानून का डर क्यांे नहीं है ? यह घटना मन को तब और कचोट गयी जब पुलिस द्वारा पकड़ाए जाने पर आरोपियों के चेहरों पर कोई शिकन तो नहीं ही थी बल्कि वे हंसते हुए विक्ट्री का निशान बनाते देखे गये।

ये ड्यूटी में रिश्वतखोरी और लापरवाही के कारण है। प्रशासन की, सरकार की बड़ी विफलता है।

अपने फैलाए विष का खुद ही शिकार

एक कड़वा सच है कि प्रशासन जिन कुप्रथाओं का पोषण कर रहा है, कभी न कभी शासन, प्रशासन के लोग इनका खुद ही शिकार बन जाते हैं। अपनी ड्यूटी से रिटायर होने के बाद वे आम आदमी बन जाते हैं और वही जहर तब उन्हें भी डसने लगता है, जिसे उन्होने केवल पैसांे की खातिर समाज में फैलने दिया। सारे समाज को विषैला बना दिया। खुद भी कैसे बच सकते हैं ?

जाहिर है उनका परिवार भी इस जहर से अछूता नहीं रहता और वो भी इसका दंश झेलता है।

कोई लेना-देना नहीं पुलिस को

बीस-पच्चीस साल पहले का दृष्य याद आता है। होली के दिन जयस्तंभ चैक पर नवयुवकों की दो टोलियों में कहासुनी हो गयी। एक गुट मे पंद्रह लड़के थे। एक-एक बाईक पर तीन सवार। दूसरे गुट में नौं। वे भी एक-एक बाईक पर तीन सवार।

तब वहीं पर किरण बिल्डिंग की छांव में कुछ बैठे कुछ अधलेटे से लगभग पच्चीस पुलिस वाले भी मौजूद थे। उन लोगों ने उन नवयुवकों के बीच हो रहा झंझट देखा, लेकिन किया कुछ भी नहीं। आराम से पड़े रहे मानों उन्होंने कुछ देखा ही नहीं। बड़े गुट के लड़कों में से एक के पास चाकू भी था। यदि झगड़ा बढ़ जाता तो बड़ा हादसा हो सकता था।

कुछ समय के बाद शहर में सरदार सरबजीतसिंग नामक एसपी आए। उनका कार्यकाल आज भी याद किया जाता है। उनके आने के बाद तो हालात ऐसे बदले कि होली जैसे त्यौहार में जहां जवान लोगों को भी घर के बाहर निकलने में खतरा बना रहता था, वहां लोग घर की महिलाओं के साथ भी सुरक्षित घूम-फिर कर आ जाते थे।

चप्पे-चप्पे पर पुलिस वो भी मुस्तैद। मजाल कि कोई किसी किस्म की उद्दण्डता दिखाए। एक एसपी ने इतना सुधार दिया शहर को।

जब शशिमोहन सिंह के नारे लगे

उस दिन इतिहास बन गया 

रायपुर वासियों को निस्संदेह याद है और अभी तक चर्चा भी होती है शशिमोहन सिंह के कार्यकाल की। उनकी कार्यप्रणाली की। दोषी को क्षमा नहीं और निर्दोष को दण्ड नहीं। यही अवधारणा थी उनकी।

रायपुर वासियों को याद है कि एक बार गोलबाजार में कुछ हादसा होने के बाद कैसे आम जनता उनके नाम के नारे लगा रही थी।

पुलिस कार्यवाही से संतुष्ट न होने पर और न्याय की आस में वहां के लोग नारे लगाते देखे गये थे कि ‘शशिमोहन सिंह को बुलाओ’। बकायदा उनके नाम के नारे लगे थे। इतना विश्वास था जनता का उनके उपर। इस घटना ने एक नया इतिहास लिख दिया।

वर्तमान में जशपुर में एसपी हैं शशिमोहन सिंह। वे कहा करते हैं कि ‘जो चीज कानून के अनुसार सही है उसे करने से मुझे कोई नहीं रोक सकता’। इस बात की चर्चा चारों ओर है कि जिले में अपराधों में कमी आ गयी है।

तभी तो नारे लगते हैं शशिमोहन के नाम के। रायपुर में बढ़ते अपराध का ग्राफ देखकर सहसा दिल से आवाज निकलती है ‘हे शशिमोहन ! तुम कहां हो’….. रायपुर पुकार रहा है आपको….


जवाहर नागदेव,

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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