Ro no D15139/23

समझा था हलवा-रहा न किंचित जलवा,मोदीजी देश की धरोहर-खतरे में न डालें, रोना-धोना पाश्चाताप नहीं डर रही अब, सायनी-सयानी या मूर्ख, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी…खरी…

साथ की फोटो में मोदीजी अमित शाह की ओर इशारा करके कह रहे हैं कि ‘कोई समझाओ, कह रहे हैं कि तमिलनाडु में अपना एक ही एमएलए है फिर भी सरकार बनाकर दिखलाउं क्या’।

जितने धैर्य, समझ और चतुराई से भाजपा नेतृत्व ने बंगाल में अपना परचम लहराया वो वाकई तारीफ के काबिल है। यानि धैर्य से धमाका।

सरकारें बनाने में अमित शाह का नाम सर्वोपरि है। जबकि इसके मूल में जनता की दुविधा है। जनता के पास विकल्प नहीं होने के कारण जनता असमंजस में रहती है और जैसे ही अमित शाह विकल्प बनकर आते हैं तो जनता हाथोंहाथ ले लेती है। नतीजा यही है कि अमित शाह के कदम को असफलता या अलोकप्रियता नहीं मिलती।
वे हर जगह सफल हैं। साथ के कार्टून में हास्य के साथ-साथ कुछ हद तक सच भी छिपा है।


मोदी को खतरे मे डालकर
अपनी आजादी को
दांव पर नहीं लगा सकते हिन्दु

टटपुंजिये, बेईमान, गैरजवाबदार, राष्टद्रोही, लालची लोगों के धूर्तता पूर्ण अहम और तानों से बचने के लिये हम अपनी अमूल्य धरोहर को खतरे में नहीं डाल सकते।      ।                             

मोदीजी को खतरे में डालकर हम अपनी स्वतंत्रता, सम्मान और अपने बच्चों के भविष्य का बंटाधार नहीं कर सकते।
पैट्रोल की किल्लत तो अपनी जगह है आसमान भी टूटता हो तो भी भारत के भविष्य और हिंदुओं की जीवन के लिये मोदीजी का होना जरूरी है।

उनकी सुरक्षा में कोई समझौता नहीं होना चाहिये।

काबा-मदीना से सीधे हनुमान चालीसा
बेशर्म पलटीमार


सुंदर सांसद सायनी घोष का सयानापन भी सरक गया और कुछ और को भी हार की तरफ सरका दिया। मुसलमानों को पटाने के लिये गाना गाया था ‘दिल में है काबा और आंखों में मदीना’।

इस पर जब वो संभलतीं और पलटी मारकर हनुमान चालीसा पाठ तक आतीं, हिंदुओं ने उनकी असलियत को जान लिया था। नतीजा सामने है। कहा जा रहा है कि उनके क्षेत्र. में 6 सीटें उनके इस बेसुरे गाने के कारण टीएमसी हार गयी।

बेसुरे गाने के कारण पड़ोसियों में तनाव के चुटकुले सुने जाते रहे हैं, पर विधानसभा की सीटें हरवा दे ऐसे गाने के बारे में पहली बार पता चला।                    जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक मोबा. 9522170700

हलवा है क्या’ ममताजी…,

नये माहौल में नयी-नयी बातें सामने आ रही हैं। जैसे ये पहली बार हो रहा है कि हारा हुआ मुख्यमंत्री बोले कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। ममता यही बोलती रहीं कि मैं ही सरकार हूं मैं इस्तीफा नहीं दूंगी।

हालांकि इसका परिणाम शून्य ही आना था, सबको पता था।
ऐसी स्थिति में ममता जी से एक ही बात कहना बनता है कि हलवा है क्या ? पता नहीं ममता से किसी ने कहा कि नहीं कि ‘हलवा है क्या… कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगी’।

‘खिसियाई बिल्ली खम्भा नोचे’ ये कहावत यहां सटीक बैठती है।
बहरहाल हासिल क्या आया ? तमिलनाडु के हिंदुविरोधी पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन की तरह कह देतीें कि ठीक है हार गये तो हार गये। सरकार को काम करने देंगे और छह माह बाद समीक्षा करेंगे तो ‘बची-खुची’ बच जाती। पर इस फालतू की जिद से ‘बची-खुची’ भी चुक गयी।


रोना-बिलखना ढोंग
दरअसल फट रही है

 

टीएमसी के एक प्रवक्ता जार-जार रोते दिखे। बोले ‘मुझे धमकाकर बुलवाया जाता था। मैं तो मोदी और भाजपा के खिलाफ नहीं था पर मुझे मजबूर किया गया’… वगेरा…. वगेरा।

अरे चुन्नीलाल ये बता कि यार 4 मई को अगर तेरी पार्टी जीत जाती तो भी तू यही बोलता भाई।

जनता क्या दिमाग से पैदल लग रही है तुझे। अजयपाल पुलिस के दबंग अफसर को ‘घसीट कर लाएंगे 4 मई के बाद’ ऐसा कुछ कहा था तुम लोगों ने। अब क्या खुद के घसीटे जाने के डर से छाती फट रही है ?

हमको पता है भाई ‘नीच की नम्रता अत्यंत दुखदाई होती है’। अब तू कितने भी मगरमच्छी आंसू बहा… पोल खुल चुकी है, अब तो तू कर्मफल से बच नहीं पाएगा।

टिकट बेचकर कमाई

ममता गयी। सरकार से, सत्ता से, अपने संगठन से। विजित विधायकों की मीटिंग बुलाने पर कम से कम दस विधायक अनुपस्थित रहे। ये बगावत का साफ संकेत है। टीएमसी ने टिकट देने के लिये विधायकांे से पांच-पांच करोड़ मांगे थे, ये आरोप मनोज तिवारी ने लगाया जो ममता सरकार में खुद ही खेल मंत्री थे।

मनोज तिवारी के अनुसार उन्हें काम नहीं करने दिया गया था। शायद इसीलिये ममता अपने ही विधायकों को अपना नहीं बना पाई जिसका खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है।

खेलमंत्री के साथ ममता ने खेला कर दिया। वे कहती भी थीं ‘खेला होबे’। मनोज देश के लिये खुद क्रिकेट का खेल खेला करते थे।
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