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लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब पर दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का शुभारंभ

रायपुर, 18 जून। संस्कृति विभाग अंतर्गत पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय, रायपुर द्वारा आज महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय के सभागार में “लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ।

 

सम्मेलन के शुभारंभ सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कांकेर राजपरिवार के वर्तमान प्रमुख डॉ. आदित्य प्रताप देव ने “Reflections of Pasts in Chhattisgarhi Folk Culture: Challenges and Possibilities” विषय पर मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों एवं सांस्कृतिक स्मृतियों में निहित ऐतिहासिक तत्वों की चर्चा करते हुए लोकसाहित्य को अतीत के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बताया। उन्होंने लोक परंपराओं के संरक्षण, प्रलेखन एवं अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर भी बल दिया।

 

शुभारंभ सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशील त्रिवेदी, वरिष्ठ इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र तथा संस्कृति विभाग के विशेष कर्तव्य अधिकारी श्री जितेंद्र सिंह उपस्थित रहे। अतिथियों ने अपने उद्बोधनों में लोकसाहित्य को समाज की सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज बताते हुए इसके संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अतिथियों ने प्रकाशित स्मारिका का विमोचन किया।

 

कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया तथा स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा एवं उद्देश्यों से उपस्थित जनों को अवगत कराया। शुभारम्भ सत्र के उपरांत आज दो अकादमिक सत्र भी संपन्न हुए।

 

प्रथम सत्र में लोक साहित्य और इतिहास के विविध आयामों पर विमर्श

 

सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कला संकाय, रायपुर के पूर्व संकायाध्यक्ष एवं पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चितरंजन कर ने की। सत्र में लोक साहित्य और इतिहास के अंतर्संबंधों पर विविध शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

 

आचार्य रमेन्द्रनाथ मिश्र ने “लोक साहित्य में ज्ञात ऐतिहासिक व्यक्तित्व – गोपालराय” विषय पर व्याख्यान देते हुए लोक स्मृतियों में संरक्षित ऐतिहासिक चरित्रों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। डॉ. बिहारीलाल साहू ने “प्रकृति-पूजा का पावन पर्व: भोजली” विषय पर छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और पर्यावरणीय चेतना का विश्लेषण प्रस्तुत किय।

 

श्री राहुल कुमार सिंह ने “टांगीनाथ सामत राजा और पछिमहा देव” विषय पर लोककथाओं में निहित ऐतिहासिक संकेतों की चर्चा की। डॉ. रूद्र नारायण पाणिग्रही ने “लोक साहित्य का सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष” विषय पर लोक साहित्य को समाज के सांस्कृतिक विकास का दर्पण बताया। वहीं डॉ. देवधर महंत ने “छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य में सरिताएं” विषय पर लोक साहित्य की संरचना एवं परंपरागत ज्ञान की भूमिका का विवेचन किया।

 

सत्र के दौरान विद्वानों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि लोक साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और सामुदायिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण स्रोत है।

 

द्वितीय सत्र में लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और इतिहास बोध पर केंद्रित शोधपत्रों की प्रस्तुति

 

सम्मेलन के द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र ने की। सत्र में लोक परंपराओं, सांस्कृतिक इतिहास और सामाजिक स्मृतियों से जुड़े विषयों पर महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

 

प्रो. चित्ररंजन कर ने “छत्तीसगढ़ की लोकगाथाओं में इतिहास-बोध (वाचिक परंपरा के विशेष संदर्भ में)” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि लोकगाथाएं इतिहास की वैकल्पिक स्रोत सामग्री के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। श्री परदेशी राम वर्मा ने “लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब” विषय पर लोक साहित्य में संरक्षित सामाजिक एवं सांस्कृतिक अनुभवों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।

 

श्री सुरेश प्रसाद जायसवाल ने “संत गहिरा गुरु: एक युग पुरुष” विषय पर उनके सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान का उल्लेख किया। डॉ. सत्यभामा आडिल ने “छत्तीसगढ़ के इतिहास में पंडवानी प्रसंग और महाजन दाऊ झेवेदार आडिल का स्मरण” विषय पर लोकनाट्य परंपरा एवं उसके ऐतिहासिक पक्षों को रेखांकित किया।

सत्र के अंतिम वक्ता डॉ. सुधीर पाठक ने “कोरवा-कोड़ाकुओं का जातीय पर्व – सोंटी” विषय पर जनजातीय सांस्कृतिक परंपराओं और उनके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला।

 

अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्य रमेश्वरनाथ मिश्र ने कहा कि लोक साहित्य, लोककथाएं, लोकगाथाएं और जनजातीय परंपराएं इतिहास के ऐसे स्रोत हैं जिनके माध्यम से समाज की सामूहिक स्मृतियों को समझा जा सकता है। उन्होंने लोक परंपराओं के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अकादमिक अध्ययन को समय की आवश्यकता बताया।

 

सम्मेलन के दोनों सत्रों में शोधार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही तथा लोक साहित्य के माध्यम से अतीत को समझने की नई संभावनाओं पर सार्थक विमर्श हुआ।

 

दो दिवसीय इस सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े विद्वान, शोधार्थी एवं विषय विशेषज्ञ लोकसाहित्य और इतिहास के अंतर्संबंधों पर अपने शोधपत्र एवं विचार प्रस्तुत करेंगे। सम्मेलन का उद्देश्य लोक परंपराओं में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों का अध्ययन, प्रलेखन तथा उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रसार करना है।

 

इस अवसर पर आयोजन के नोडल अधिकारी डॉ.. पी.सी. पारख, उप संचालक, प्रभारी अधिकारी प्रभात कुमार सिंह, पुरातत्त्ववेत्ता सहित विभाग के सभी अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सञ्चालन डॉ. आकांक्षा दुबे और अरुण निर्मलकर ने किया।

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