
Krishnapingala Sankashti Chaturthi: प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. हर महीने पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी का नाम और महत्व अलग-अलग होता है. आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है. हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय माना गया है. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणपति बप्पा की आराधना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि, बुद्धि और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
पूजा सामग्री लिस्ट
- भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर
- लकड़ी की चौकी
- गंगाजल
- शुद्ध जल
- कच्चा दूध
- दही
- शहद
- घी
- रोली
- कुमकुम
- सिंदूर
- अक्षत
- चंदन
- हल्दी
- कलावा
- भगवान गणेश के लिए नए वस्त्र
- दीपक
- धूपबत्ती
- अगरबत्ती
- कपूर
- माचिस
- दूर्वा घास
- लाल या पीले फूल
- बेलपत्र
- मोदक या बेसन के लड्डू
- मौसमी फल
- नारियल
- तांबे या मिट्टी का लोटा
- आम के पत्ते
- पान के पत्ते
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर कैसे करें पूजा?
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करके साफ-सुथरे पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें.
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.
- भगवान गणेश को सिंदूर का तिलक लगाएं, 21 गांठ दूर्वा अर्पित करें तथा मोदक या लड्डू का भोग लगाएं. इसके बाद धूप-दीप प्रज्ज्वलित करें और ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें.
- शाम के समय पुनः स्नान करें या हाथ-पैर धोकर शुद्ध होकर संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें या सुनें. इसके बाद भगवान गणेश की आरती करें.
- रात्रि में चंद्रोदय होने पर चांदी या तांबे के लोटे में जल, दूध, चंदन और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करें. इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए अपना व्रत खोलें.









