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जनजातीय संस्कृति के संरक्षण का महाकुंभ 10 जनवरी से शुरू होगा मांदर, गीत और जायके का उत्सव

बस्तर संभाग की अनूठी जनजातीय विरासत को सहेजने और उसे विश्व पटल पर लाने के लिए छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग ने 30 दिसंबर को एक ऐतिहासिक पहल करते हुए बस्तर पंडुम 2026 के आयोजन की विधिवत घोषणा कर दी है। राज्य शासन का यह प्रयास केवल एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बस्तर के 1885 ग्राम पंचायतों में रचे-बसे स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और पारंपरिक वैद्यराजों को एक सशक्त मंच देने की कवायद है, ताकि बस्तर की कला, बोली, रीति-रिवाज और वन-औषधियों का संरक्षण किया जा सके।
इस सांस्कृतिक महोत्सव का आगाज तीन चरणों में होगा, जिसकी शुरुआत जमीनी स्तर यानी जनपद (ब्लॉक) पंचायतों से की जाएगी। प्रथम चरण में 10 जनवरी से 20 जनवरी 2026 के बीच जनपद स्तरीय प्रतियोगिताएं होंगी। यहाँ से चयनित प्रतिभागी दूसरे चरण में पहुँचेंगे, जहां 24 से 29 जनवरी 2026 तक जिला स्तरीय मुकाबलों का आयोजन होगा। आयोजन का समापन भव्य संभाग स्तरीय समारोह के साथ जगदलपुर में होगा, जो 2 फरवरी से 6 फरवरी 2026 तक चलेगा। इस अंतिम चरण में बस्तर संभाग के सातों जिलों से चुनकर आए 84 विजेता दल अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे।
बस्तर पंडुम का मुख्य आकर्षण वे 12 विशिष्ट विधाएं हैं जिन्हें प्रतियोगिता का आधार बनाया गया है। इसमें न केवल गौर-माड़िया, ककसार और परब जैसे प्रसिद्ध जनजातीय नृत्य और रिलो-लेजा जैसे गीत शामिल हैं, बल्कि बस्तर के खान-पान और जीवनशैली को भी प्रमुखता दी गई है। प्रतियोगिता में चापड़ा (चींटी की चटनी), आमट और बांस की सब्जी (बास्ता) जैसे व्यंजनों के साथ-साथ सल्फी, ताड़ी और छिंदरस जैसे पारंपरिक पेय पदार्थों का प्रदर्शन भी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, वन औषधियों, जनजातीय वेशभूषा, आभूषण और माओपाटा जैसे लोक-नाट्यों को भी इस महोत्सव का हिस्सा बनाया गया है।
विजेताओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने नकद पुरस्कारों की भी घोषणा की है। संभाग स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले दल को 50 हजार रुपये, द्वितीय को 30 हजार रुपये और तृतीय स्थान वाले को 20 हजार रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा, जबकि शेष सभी 48 प्रतिभागी दलों को दस-दस हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलेगी। मूल्यांकन प्रक्रिया को निष्पक्ष और परंपरा के अनुकूल बनाने के लिए चयन समिति में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ आदिवासी समाज के प्रतिष्ठित मांझी, चालकी, गायता-पुजारी और बुजुर्ग समाज प्रमुखों को विशेष रूप से शामिल किया गया है, जो कला की मौलिकता और पौराणिकता की परख करेंगे।

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