
छत्तीसगढ़ी साहित्य और कला जगत में मस्तुरिया बड़ा नाम था
उनका जन्म 07 जून 1949 को बिलासपुर के मस्तुरी में हुआ था। उनकी प्रमुख कृतियों में मोर संग चलव रे, हमू बेटा भुइंया के, गंवई-गंगा, धुनही बंसुरिया, माटी कहे कुम्हार से, सिर्फ सत्य के लिए आदि हैं। वे मूलतः गीतकार थे और उन्होंने मोर संग चलव रे, मैं छत्तीसगढ़िया अंब रे आदि लोकप्रिय गीतों की रचना की। इसमें से मोर संग चलव रे तो छत्तीसगढ़ के जन-जन के होठों पर बसा हुआ है।
आकाशवाणी, दूरदर्शन और कवि सम्मेलनों के मंच से होते हुए लक्ष्मण छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी गीत लिखते रहे। उनकी 77 छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह ‘मोर संग चलव’वर्ष 2003 में, इकसठ छत्तीसगढ़ी निबन्धों का संग्रह‘माटी कहे कुम्हार से’ वर्ष 2008 में और इकहत्तर हिन्दी कविताओं का संकलन ‘सिर्फ सत्य के लिए‘भी वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ। इसके पहले छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह की जीवन-गाथा पर आधारित उनकी एक लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी‘ भी पुस्तक रूप में आ चुकी है।
ये मूलतः गीतकार हैं। बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख के ‘चंदैनी गोंदा’ में गीत लिखकर स्थापित हुए। कुछ समय तक स्कूल में अध्यापन किया। वर्तमान में राजकुमार कॉलेज रायपुर में 1988 से अध्यापन का कार्य। प्रकाशित पुस्तकें हमू बेटा भुइयां के, गंवई गंगा, धुनही बंसुरिया, माटी कहे कुम्हार से इत्यादि हैं। छत्तीसगढ़ फिल्म मोर छुइंया भुइंया के लिए गीत लिखे।
परिचय
महज 22 साल की उम्र में प्रसिद्ध सांस्कृतिक-संस्था ‘चंदैनी गोंदा ‘ के मुख्य गायक बन चुके थे। रामचंद्र देशमुख इसके संस्थापक थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक-पहचान को और आंचलिक-स्वाभिमान को देश और दुनिया के सामने लाने के लिए लोक-कलाकारों और कवियों को एक छत के नीचे लाया। छत्तीसगढ़ के खेत-खलिहान और मजूर-किसान के जीवन-संघर्ष को गीतों भरी मार्मिक कहानी के रूप में, एक सुंदर और ह्रदय स्पर्शी गीत-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘चंदैनी गोंदा’ ने यहाँ की जनता के दिलों में बरसों-बरस राज किया। नारायणलाल परमार ने ‘चंदैनी गोंदा’ पर अपने एक आलेख में इसके एक प्रस्तुतिकरण की उदघोषणा का सन्दर्भ देकर लिखा है कि यह प्रतीकात्मक रूप से कृषक -जीवन का ही चित्रण है। गेंदे के फूल दो प्रकार के होते हैं। बड़ा गोंदा सिर्फ श्रृंगार के काम आता है, जबकि छोटे आकार के गेंदे को छत्तीसगढ़ी में ‘चंदैनी गोंदा ‘ कहा जाता है, जो देवी की पूजा में अर्पित किया जाता है। देखा जाय तो गेंदे के फूलों का यह पौधा छत्तीसगढ़ के गाँवों में हर घर के आँगन की शान होता है।
तो इसी चंदैनी गोंदा को प्रतीक बना कर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक जागरण की एक नयी यात्रा की शुरुआत हुई। जिसके सुंदर और मनभावन गीतों में से अनेक सुमधुर गीत अकेले लक्ष्मण मस्तुरिया ने लिखे थे। चंदैनी गोंदा के शीर्षक गीत के रचनाकार थे रविशंकर शुक्ला। अपनी कला यात्रा के उस प्राम्भिक दौर को याद करते हुए लक्ष्मण मस्तुरिया बताते हैं – देशमुख जी स्वयं एक महान कला-पारखी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के घुमंतू ‘देवार’ समुदाय के सहज-सरल लोक-कलाकारों को भी ‘चंदैनी गोंदा’ से जोड़ा। उन्होंने उनकी नाचने-गाने की पारम्परिक कला को वर्ष 1974-75 में ‘देवार -डेरा’ के नाम से संस्था बना कर एक नयी पहचान दिलाई। लक्ष्मण मस्तुरिया ने ‘चंदैनी-गोंदा’ के लिए लगभग डेढ़ सौ गीत लिखे।
सांस्कृतिक जागरण के इस मंच ने कवि लक्ष्मण मस्तुरिया को माटी की महक और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर उनके गीतों के ज़रिए उन्हें छत्तीसगढ़ में आवाज की दुनिया का नायक भी बना दिया। धरती की धड़कनों से जुड़े उनके इन छत्तीसगढ़ी गानों को जनता ने हाथों -हाथ लिया। उनका गीत आज भी छत्तीसगढ़ की माटी में रचे-बसे हर इंसान को सामूहिकता की भावना में बाँध लेता है और लोग इन पंक्तियों को अनायास गुनगुनाने लगते हैं –
मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी ,
ओ गिरे -थके हपटे मन, अऊ परे-डरे मनखे मन ,
मोर संग चलव रे , मोर संग चलव जी .
अमरैया कस जुड छाँव म मोर संग बईठ जुडालव ,
पानी पी लव मै सागर अवं,दुःख-पीरा बिसरा लव .
नवा जोत लव, नवा गाँव बर, रस्ता नवां गढव रे!
लक्ष्मण का यह गीत वास्तव में समाज के गिरे-थके, ठोकर खाए , भयभीत लोगों को अपने साथ चलने, आम्र-कुञ्ज की छाँव में बैठ कर शीतलता का अहसास करने, अपनी भावनाओं के सागर से पानी पीकर दुःख-पीरा को भुला देने और एक नए गाँव के निर्माण के लिए आशा की नयी ज्योति लेकर नया रास्ता गढ़ने का आव्हान करता है।
लक्ष्मण छत्तीसगढ़ के उन गिने -चुने कवियों में हैं, जिन्हें नयी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह के मौके पर लाल किले के मंच से काव्य-पाठ करने का अवसर मिला है। लक्ष्मण को यह गौरव 1974 में छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध शायर मुकीम भारती के साथ मिल चुका था। उनके गीतों पर आधारित सैकड़ों कैसेट्स और ऑडियो तथा वीडियो सी .डी .संगीत के बाज़ार में हाथों-हाथ लिए गए हैं।
इसके पहले छत्तीसगढ़ के महान क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह की जीवन-गाथा पर आधारित उनकी एक लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी ‘ भी पुस्तक रूप में आ चुकी है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में साहित्य, कला और संस्कृति के मैदान में पिछले करीब चालीस वर्षों से नाबाद रहकर एक लंबी पारी खेल रहे लक्ष्मण के खाते में तरह -तरह की सफलताओं के साथ-साथ सम्मानों की भी एक लंबी फेहरिस्त भी है। छत्तीसगढ़ में लक्ष्मण को अनेक अवसरों पर अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है , उनके गीतों की लोकप्रियता का रहस्य सिर्फ गले की मिठास और पावरफुल इलेक्ट्रानिक वाद्य-यंत्र नहीं है। ये तो सफलता के महज ऊपरी रहस्य हैं। असली रहस्य है उनके गीतों में कथ्य की नवीनता तथा रूप-विधान और भाव-सौंदर्य।छत्तीसगढ़ के जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया का निधन
छत्तीसगढ़ के जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया का 3 नवंबर 2018 में निधन हो गया। वे वायरल बुखार से पीड़ित थे।सीने में दर्द की शिकायत पर उन्हें अस्पताल ले जाने के दौरान उनका निधन हो गया।









