
टैक्सी नं 9211 एक बेहतरीन फिल्म है। नाना पाटेकर और जाॅन इब्राहिम की। दोनों ही उम्दा कलाकार है। नाना के तेवर और जाॅन की मुस्कुराहट माशा अल्ला। इस फिल्म को नहीं देखा है तो अवश्य देखें।

इसमें एक सीन में नाना पाटेकर का बेटा गली के लड़कांे के साथ खेल रहा था और फिल्डिंग कर रहा था। ऐसे में नाना उसे फटकार कर कहते हैं ‘बैट किसका है’। बच्चा बोलता है ‘मेरा’।
नाना कहते हैं ‘तो बैटिंग करने का । फिल्डिंग मत करनार्’
मतलब ये कि जिसकी बैट उसकी बैटिंग। बस ऐसी ही नीति नीतिश की नजर आती है। नीतिश कुमार हमेशा बैटिंग करते नजर आते हैं। उनके पास घुलनशीलता की बैट है। वे बिहार के दोनों पक्षांे में घुलनशील हैं। लालू से नाराज होते हैं तो भाजपा में घुलमिल जाते हैं। भाजपा से नाराज तो लालू के राष्ट्रीय जनता दल का टेका ले लेते हैं। और दोनों ही जगह बैटिंग करते हैं यानि सत्ता में रहते हैं और मुख्यमंत्री ही बनते हैं। राजनैतिक मैदान में उनका कब्जा रहता है और बाकी पार्टियंा फील्डिंग करती हैं।

बड़ी मुश्किल से ले-देकर अभी नीतिश कुमार ने अपनी विधान परिषद की सदस्यता से स्तीफा दिया है लेकिन अभी भी वे मुख्यमंत्री बने हुए हैं। वैसे नियम ये है कि छह महीने में चुनाव जीतकर विधायक बनकर मुख्यमंत्री कायम रहा जा सकता है।
अब नीतिश बीस साल की अपनी बादशाहत त्यागने को तैयार हुए हैं। वे खुद दिल्ली की राजनीति में खेलेंगे और उनका बेटा बिहार का उप मुख्यमंत्री बनेगा। ऐसा ही समझौता हुआ है भाजपा के साथ। बेटे के पास बाप जैसी बैटिंग का गुण है कि नहीं वक्त बताएगा।
छड्डो यार
थक गये अब

पंजाबी में कहा जाता है छड्डो यार यानि छोड़ो यार। सिंधी में बहुत देर तक लड़ने वालों की स्थिति के बारे में कहा जाता है कि ‘तूं छड् ित मां भी छड्यां’। यानि तू छोड़ तो मैं भी छोड़ूं। कल्पना कीजिये कि दो लोग सड़क पर एक-दूसरे का काॅलर पकड़कर लड़ रहे हैं। दोनों ही पूरी तरह थक चुके हैं। ताकत और हौसला समाप्त हो रहा है। पर हार कौन माने। ईगो का प्रश्न है।
ऐसे में मन ही मन सोचते हैं कि यदि ये थोड़ा सा नरम रूख दिखाए तो मैें छोड़ दूंगा।
या फिर ऐसा भी सोच सकते हैं कि कोई और प्रभावशाली आए और दोनों को प्यार से फटकारे और काॅलर छोड़ने को बोले। हम उसका लिहाज करके ही सामने वाले को आंख दिखाते हुए छोड़ दें और लड़ाई से मुक्ति पाएं।
आज इन लड़ने वालों में से एक तो मुझे डोनाल्ड साहब नजर आ रहे हैं। ईरान का रूख वैसा नहीं है। वो तो अड़ा हुआ है। तू छोड़ देगा तब भी मैं नहीं छोड़ूंगा। मगर डोनाल्ड भैया की स्थिति कुछ कमजोर लगती है। मजेदार बात ये है कि दोनों को छुड़वाने के लिये जो नाम सामने आया है वो है पाकिस्तान…. । हा…. हा…. हा…. हा…. ।
बच्चे तो बच्चे तो बच्चे
बाप रे बाप
बच्चों को क्या कहें जब बड़ों का ये हाल है ? बात मोबाईल की हो रही है। बच्चे मोबाईल में व्यस्त रहते हैं, बात नहीं सुनते, मोबाईल मना करने पर बिगड़ते हैं, उद्दण्डता करते हैं, ये आम चिन्ताएं हैं परिवारांे में ही नहीं सारे समाज में ये चर्चा का विषय है लेकिन अब तो बड़ों भी कंट्रोेल करना मुश्किल होता जा रहा है।
यहां तक कि बजट के दौरान मेयर मीनल चैबे द्वारा बजट के दौरान पार्षदों को मोबाईल चलाते देखा गया, रील्स देखेते देखा गया। सभापति द्वारा मना करने के बावजूद भी ये सिलसिला कायम रहा। इसलिये सामान्य सभा की बैठक में मोबाईल लाने पर रोक लगा दी गयी है। है न मजेदार।
गुटका
सुनकर अनसुना करने की सजा
कानपुर में एक दुकानदार से एक ग्राहक ने किसी खिलौने का रेट पूछा। दुकानदार के मुंह में गुटका था, बात करने में असकट हो रही थी। फिर भी ग्राहक को रेट तो बताना ही था, लिहाजा मुंह को उपर करके अस्पष्ट सा बोला एक सौ बीस। ग्राहक ने फिर पूछा क्या ? जवाब मिला एक सौ बीस।
क्या ? अब दुकानदार दुकान से बाहर आया और मुंह का गुटका थूका और अंदर आकर साफ शब्दों में बोला एक सौ तीस।
ग्राहक ने कहा अभी तो एक सौ बीस बोले थे। ग्राहक की बात सुनकर दुकानदार बमक गया, बोला जब पहले से सुन लिया था एक सौ बीस तो बार-बार क्या… क्या…. क्यों कर रहे थे ? ख्वामख्वाह मेरे दस रूप्ये का गुटके का नुकसान कर दिया।
दुकानदार झगड़ने को तैयार हो गया कि अब तो खिलौना लेना ही पड़ेगा और वो भी एक सौ तीस में….







