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इन्दौर का मुंह काला किया अफसरों ने,मानवता का मुंह काला किया मंत्री ने,इन्दौर हो या रायपुर – भरे हैं पिशाच ही पिशाच वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

रायपुर के कचना और सड्डू के क्षेत्र में नाली से सटे पाईपलाईन में लीकेज के कारण घरों में गंदा पानी आ रहा है। ये कोई आज कल की बात नहीं पिछले डेढ़ महीने से इसकी शिकायत कायम है।


रायपुर नगर निगम के अधिकारी शायद इन्दौर जैसी मौतों और त्राहिमाम के बाद मजबूरी मे काम शुरू करेंगे ऐसा लगता है।

अस्सी के दशक में जब हम स्कूल में थे तो जनरल नाॅलेज की परीक्षा हुआ करती थी। कई बार कई संस्थाएं ऐसे एक्ज़ाम प्रायोजित करती थीं। इनमें प्रायः ये प्रश्न पुछा जाता था कि मध्यप्रदेश का बाॅम्बे किसे कहते हैं।

जो नहीं जानते उन्हें आश्चर्य होगा कि इसका जवाब होता था ‘इन्दौर’। इतना खूबसूरत शहर था या शायद अभी भी है तभी तो अक्सर उसे स्वच्छ महानगर का खिताब मिला रहता है। यानि कुल मिलाकर बड़ी तारीफ है इन्दौर की।

बड़ी सुदर शक्ल है इस महानगर की। और इस सुंदर चेहरे पर कालिख पोत दी इन्दौर के महानगर निगम के अधिकरियों ने। और तो और निगम के इन पिशाच लोगों के इस काले कारनामे पर चर्चा करते पत्रकार से अपने व्यवहार से मानवाता के मुंह पर कालिख पोत दी मंत्री महोदय ने।

 

 

क्या फ़र्क है
उनमें और आपमें

लगभग 30 साल पहले का एक वाकया यायद आता है। एक ही पार्टी के यूथ विंग के दो युवा पदाधिकारियों में लड़ाई हो गयी। एक ने दूसरे के नाम से रिपोर्ट कर दी। पुलिस ने आरोपी युवक को पकड़ लिया। दोनों पक्ष सिविल लाईन्स थाने में थे, एक को पुलिस लाई थी और दूसरा रिपोर्ट कराने आया था।

दोनों थे एक ही पार्टी के। इतने में आरोपी युवक के गाॅडफादर उनकी पार्टी के बड़े नेता का आना हुआ। अपने बड़े नेता को आया देख पीड़ित युवक ने उसे नमस्ते किया। तब उस गाॅडफादर नेता ने आव देखा न ताव जमके एक लात मार दी अपनी ही पार्टी के उस युवा नेता को। क्यांेकि उसने उसके समर्थक युवा नेता के खिलाफ रिपोर्ट कराने की हिम्मत की थी। और मजेदार बात ये है कि उस समय वहां पर कम से कम चार पुलिस वाले उपस्थित थे। लेकिन उनमें से एक भी बोला नहीं।

यानि इतना दुस्साहस होता था इन नेताओं में। सत्ता का गुरूर। अपनी राजनैतिक पकड़ के चलते थाने से संपूर्ण सुरक्षा का भरोसा। किस पुलिस वाले में हिम्मत थी कि उनके खिलाफ कार्यवाही करता, उसे तबादला करवाना था क्या ?

मंत्रीजी बोले – फोकट और घंटा

जिस घटना का उल्लेख किया जा रहा है। वैसे ही घटना घटी थी इन्दौर में। वहां के प्रभावशाली नेता है कैलाश विजयवर्गीय। एक बार उनके पुत्र ने एक निगम अधिकारी को बैट से पीटा था। जिसका वीडियों भी वायरल हुआ था। तो पहले की पार्टी और भाजपा में क्या फर्क दिखा आपको ?

यहां पर विजयवर्गीय का नाम इसलिये लिया जा रहा है क्योंकि ये ही वो मंत्री हैं जो दूषित पानी से इंदौर में त्राहि-त्राहि मचने के प्रश्न पर पत्रकार को अपमान करते हैं और ‘घंटा’ जैसे शब्द का प्रयोग करते हैं।

‘अरे छोड़ो यार फोकट प्रश्न मत पूछो’। पत्रकार ने कहा ‘मै तो होकर आया हूं वहां’ तो वरिष्ठ भाजपा नेता, जन प्रतिनिधि, माननीय मंत्री जी ने ऐसा जवाब दिया जिस पर न हंसते बन रहा है न रोते। वे बोले ‘क्या घंटा होकर आए हो’।

कमीशन के चक्कर में
उपचार में देर की अफसरों ने

पीड़ितों के घरों में मातम है। जनता की आंखें नम हैं। बीमारों की जीवन के लिये रस्साकशी जारी है। खर्चा, तकलीफ, बेबसी, रूदन, हताशा, चारों तरफ चीख-पुकार।
कम से कम जिन को सीधे चोट लगी है उनका यही हाल है। वो भी बिना किसी अपराध के।

निगम के कुछ एक अधिकारियोें को छोड़ दिया जाए सारे के सारे पिशाच की श्रेणी में आते हैं। इनके उपर काले पैसे का लालच इतना हावी है कि किसी की भी जान से भी खेलने को तैयार हैं।
कोई भी कैसी भी मौत मरे, चाहे जख्मी हो, प्रताड़ना झेले। इनको अपनी हराम की कमाई से मतलब है। सरकार इन्हें मरते हुए को पानी पिलाने का काम दे तो उसमें भी कमीशन खाकर ही पानी पिलाएंगे।

इन्दौर में गंदे पानी की पाईपलाईन और पीने की पानी की पाईपलाईन आपस में मिल गयीं और गंदा पानी अच्छेे पानी के साथ घरों में पहुंचने लगा।
बताया जाताा है कि कमीशन की सेटिंग न हो पाने के कारण काम में देरी की गयी।
जिससे लगभग बीस लोग मर गये। सैकड़ों लोग आईसीयू में भर्ती हैं और हजारों को इलाज चालू है।
बस कमाना है और अय्याशी करनी है। येन केन प्रकारेण पैसा आना चाहिये। कुछ गिनती के अधिकारी होंगे जिनके अंदर मानवता शेष है अन्यथा सारे पिशाच हैं।

घंटा वाले मंत्री के बेटे ने
बैट से पीटा था अधिकारी को

कदाचित् यही कारण है कि माननीय मंत्री कैलाश विजयवगी्रय के सुपुत्र ने एक अधिकारी की बैट से पिटाई कर दी। हम बैट की पिटाई के पक्षधर नहीं हैं लेकिन कल्पना कीजिये उस शख्स की जिसकी जूतियां धिस गयीं काम के लिये। जिसकी आत्मा तक थक जाती है न्याय के लिये चक्कर लगाते।

और ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं अधिकारी। इन लोगों को न कानून का डर है, न भगवान का, क्योंकि इनके भगवान तो इनके राजनैतिक गाॅडफादर हैं, जिन्हें ये अपनी काली कमाई में से हिस्सा देते हैं। ऐसे में हताश, निराश न्याय के लिये भटकता इंसान क्या करे। बैट न उठाए तो क्या करे ?

इन्दौर हो या रायपुर सभी जगह यही हाल है। वहां बैट उठा था, भविष्य में यहां भी बैट उठेगा। वहां भी पिशाचों के हाथ में सिस्टम है यहां भी। ————————–
जवाहर नागदेव,
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700

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