
कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी। बेहतरीन… नाम था नमक हराम। इसमें हीरो राजेश खन्ना उद्योगपति अमिताभ बच्चन का पारिवारिक मित्र था। मित्र भी ऐसा कि दो जिस्म एक जान।

अमिताभ बच्चन का पिता अपनी फैक्ट्री मे मजदूर नेता एके हंगल से परेशान रहता था। हंगल ईमादार नेता था और मजदूरों के हित में ईमादारी से काम करता था और उद्योगपति के लालच में नहीं फंसता था। मजदूर भी उसे बहुत पसंद करते थे और उसकी हर बात मानते थे।
परेशान उद्योगपति और बेटे अमिताभ बच्चन ने एक चाल चली। उन्होंने अपने मित्र राजेश खन्ना को मजदूर बनाकर मजदूरों के बीच उनकी बस्ती में रहने भेजा और किसी मसले पर ऐसा सीन बनाया कि उद्योगपति अमिताभ बच्चन का मित्र. राजेश खन्ना मजदूरों को हीरो बन गया।

दरअसल किसी मसले पर हंगल की बात को नहीं माना और जब राजेश खन्ना वही मांग लेकर गया तो कुछ हुज्जत के बात पूर्व प्लानिंग के अनुसार मांग मान ली। जिससे वो मजदूरों के बीच जुझारू नेता के रूप में लोकप्रिय हो गया।
मजदूरों से हो गयी सहानुभूति राजेश खन्ना की
हो गया नमकहराम
ईधर राजेश खन्ना मजदूरों के बीच में रहकर उनसे सहानुभूति रखने लगा। एक मजदूर कन्या से प्यार भी कर लिया। इस तरह वे जिस मकसद से आए थे एके हंगल का प्रभाव कम करने और चालाकी से अपने उद्योगपति दोस्त को फायदा पहंुचाने के लिये उससे कतराने लगे। उससे इंकार कर दिया। और अंततः अमिताभ और उसके पिता की नजरों में नमक हराम हो गये।
बहुत बढ़िया फिल्म है। जब भी वक्त मिले अवश्य देखें। वैसे यहां ये बात पिक्चर के प्रचार के लिये नहीं की जा रही है। यहां तो हम ये बताना चाहते हैं कि….
अंग्रेजो के पास भी था राजेश खन्ना
जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे। तब एक समय ऐसा आया जब हम सब अंग्रेजों के जुल्म से परेशान थे समझ लीेजिये मजदूर थे। यानि अंग्रेज अमिताभ बच्चन और उसके पिता थे और हिंदुस्तानी उनका जुल्म सहने वाले मजदूर। ऐसे में हम हिंदुस्तानियों के विद्रोह से निपटने के लिये अंग्रेज छटपटा रहे थे। 1857 का मंगल पाण्डे का विद्रोह अंग्रेजों को अंदर तक हिला गया। अफसरों को जान के भी लाले पड़ने लगे।
तब अंग्रेजों ने बेहद चालाकी से काम लिया और हम हिंदुस्तानियों को तोड़ने के लिये हमारे बीच से अपना एक दोस्त बनाया…. कांग्रेस।
और उस कांग्रेस को भारतीयों की हितैषी बताकर जनसेवा के लिये और हिंदुस्तानियों की आवाज अंग्रेजों के समक्ष उठाने के लिये तैनात कर दिया।
वास्तव में राजेश खन्ना यानि कांग्रेस को इसलिये तैयार किया गया कि एके हंगल को यानि वास्तविक क्रांतिकारियों को रिप्लेस कर सके।

कांग्रेस बन बैठी
अंग्रेजों की सुरक्षा गार्ड
हुआ ऐसा कि आमजन कांग्रेस को अपना मसीहा समझने लगे। जैसे नमकहराम में राजेश खन्ना था तो उद्योगपति का दोस्त…. मगर मसीहा बन बैठा था…. मजदूरों का।
तो कांग्रेस ने आते ही अंग्रेजों की सुरक्षा के लिये अहिंसा-अहिंसा की पुंगी बजानी चालू कर दी। चारो ंओर अहिंसा-अहिंसा।
और…. वास्तविक क्रांतिकारियांे का विरोध करने लगी। जिनसे अंग्रेज वास्तव में डरते थे उन्हें साईडलाईन करने का प्रयास। दुर्भाग्य से अंग्रेज और कांग्रेस उसमें कामयाब भी हो गये।
जानकार बताते हैं कि इसी कारण हमें लंबे समय तक गुलाम रहे अन्यथा जल्दी आजाद हो जाते।

राजेश खन्ना नमक हराम साबित हुए
कांग्रेस नहीं
तो अंग्रेजों की सुरक्षा और सरलता के मकसद से 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस की स्थापना हुई। और अब 140 साल हो गये कांग्रेस को। कांग्रेस के पहले संस्थापक थे अंग्रेज कलेक्टर एओ ह्यूम।
जानकार बताते हैं कि कांग्रेस की मंशा थी हिंदुस्तानियों के प्रकोप से अंग्रेजो को बचाना और अंग्रेजी हुकूमत के अनुकूल करना। जिसमें काफी हद तक वो सफल भी रही।
फिल्म नमकहराम में तो राजेश खन्ना ने भावुक होकर मित्र से बगावत कर दी पर भारत मे कांग्रेस भावुक नहीं हुई उसने अपने मित्र अंग्रेजों से बगावत नहीं की।

लाखों हिंदुस्तानी अंग्रेजों की गोलियों से मरे, फांसी पर लटकाए गये, जूतों तले रौंदे गये, लूटे-खसोटे गये, अपाहिज और बेघर कर दिये गये। मगर कांग्रेस ने राजेश खन्ना की तरह दोस्त का साथ नहीं छोड़ा।
प्यारा दुश्मन
बड़े ही रसीले और वफादार संबंध बने रहे अंग्रेजों से तब के राजनेताआंे के। यकीन न हो तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की जीवनी पढ़ लो।
इतिहासकार बताते हैं कि ईमानदार दोस्त बनी रही कांगे्रस। वफादार दोस्त। अंग्रेजों की। एक प्यारा दुश्मन जैसे ‘दुश्मनी जमके करो मगर ये गुंजाईश रहे कि दोस्त बनें तो शर्मिन्दा न हों’।
और जब जनता की कुटाई सम्हाले नहीं सम्हल रही थी और अंग्रेजों को अब जान खतरे में नजर आने लगी तो फिर आजादी का नाटक कर, ऐसा जताकर कि कांग्रेस की कुर्बानियों के चलते देश को छोड़ रहे हैं, भारत को आजाद कर दिया।
140 वर्षीय कांग्रेसी अध्याय की इतिश्री
अब कदाचित् समाप्ति की ओर अग्रसर दिख रही कांग्रेस 140 साल का जीवन जी चुकी। भविष्य इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि एक बड़ी टूट कांग्रेस में दिखेगी और मूल कांग्रेस मात्र कुछ ही क्षेत्रो में सिमट कर रह जाएगी।

और शायद गांधीयों का नाम अब नेपथ्य में चला जाए। चुपचाप पर्दे के पीछे… या फिर ग्रह खराब रहे तो जेल की सींखचों में…. । ————————–
जवाहर नागदेव,
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
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