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जशपुर में चल रही DST प्रायोजित परियोजना के तहत सोलर टनल ड्रायर की स्थापना, खाद्य-ग्रेड महुआ और वनौषधियों के प्रसंस्करण को मिला वैज्ञानिक आधार

महुआ से बनाएं जा रहें विभिन्न खाद्य सामग्री

  मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में जशपुर में नवाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इसी कड़ी में जिला पहले से ही महुआ फूल के मूल्य संवर्धन के क्षेत्र में अग्रणी जिलों में गिना जाता है। यहां महुआ आधारित विभिन्न खाद्य उत्पादों पर कार्य हो रहा है, जिनमें महुआ नेक्टर, महुआ चवन्यप्राश, महुआ लड्डू, कुकीज़ एवं अन्य पारंपरिक खाद्य उत्पाद शामिल हैं। इसके बावजूद, पूरी मूल्य श्रृंखला में खाद्य-ग्रेड महुआ संग्रह और सुरक्षित निर्जलीकरण एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा स्वीकृत एक परियोजना – “Technological Augmentation of Indigenous Practices of ST Communities of Chhattisgarh for Sustainable Livelihood and Entrepreneurial Development” क- वर्तमान में जशपुर जिले में क्रियान्वित की जा रही है। यह परियोजना DST द्वारा वैज्ञानिक डॉ. प्रसन्ना कुमार जीवी को प्रदान की गई है, जिसे वे जशपुर जिले में स्थानीय सहभागिता के साथ लागू कर रहे हैं।
परियोजना के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (NIFTEM), कुंडली के वैज्ञानिक Dr Prasanna Kumar GV द्वारा जशपुर जिले में सोलर टनल ड्रायर की स्थापना की गई है। इस कार्य में स्थानीय स्तर पर जय जंगल फार्मर्स प्रोडूसर कंपनी लिमिटेड का सहयोग रहा है।
इस विषय पर फूड प्रोसेसिंग कंसल्टेंट एवं युवा वैज्ञानिक समर्थ जैन ने बताया,
“जशपुर में महुआ का मूल्य संवर्धन भले ही आगे बढ़ चुका हो, लेकिन ताज़े महुआ फूलों को खाद्य-ग्रेड मानकों के अनुसार सुखाना अभी भी एक निर्णायक चुनौती है। पारंपरिक खुले में सुखाने की प्रक्रिया में धूल, नमी और कीटों के कारण गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे खाद्य उपयोग और बाज़ार की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं।”
उन्होंने कहा कि इन्हीं व्यावहारिक समस्याओं को देखते हुए इस परियोजना के तहत वैज्ञानिक और नियंत्रित निर्जलीकरण प्रणाली की आवश्यकता महसूस की गई, जिससे महुआ को सुरक्षित रूप से खाद्य उपयोग और बाज़ार से जोड़ा जा सके।
स्थापित सोलर टनल ड्रायर के माध्यम से महुआ फूलों को नियंत्रित तापमान में तेज़, समान और स्वच्छ तरीके से सुखाया जा सकता है। इससे महुआ की गुणवत्ता, रंग, सुगंध और पोषण तत्व सुरक्षित रहते हैं तथा दीर्घकालीन भंडारण संभव होता है। यह प्रणाली वर्षा, धूल और कीटों से सुरक्षा प्रदान करती है और पूरी तरह सौर ऊर्जा आधारित होने के कारण पर्यावरण-अनुकूल भी है।
महुआ फूलों के साथ-साथ परियोजना के अंतर्गत विभिन्न वनौषधियों (वनोपज) के निर्जलीकरण पर भी विशेष प्रशिक्षण दिया गया। आदिवासी महिला लाभार्थियों को गिलोय और अडूसा जैसी महत्वपूर्ण वन औषधियों के वैज्ञानिक और स्वच्छ निर्जलीकरण का व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं लाइव डेमोंस्ट्रेशन कराया गया। इसके अलावा पालक जैसी मौसमी सब्ज़ियों के निर्जलीकरण का भी प्रदर्शन किया गया।
परियोजना के तहत आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सुरक्षित हैंडलिंग, ट्रे लोडिंग, नमी नियंत्रण और भंडारण की वैज्ञानिक विधियों पर विशेष जोर दिया गया, जिससे वन एवं कृषि उत्पादों की गुणवत्ता बनी रहे और उनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सके।
यह उल्लेखनीय है कि डॉ. प्रसन्ना कुमार जीवी पिछले तीन वर्षों से जशपुर जिले के साथ निरंतर कार्य कर रहे हैं, और खाद्य प्रसंस्करण एवं तकनीकी क्षमता निर्माण से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनकी दीर्घकालिक सहभागिता के कारण यह परियोजना स्थानीय जरूरतों और अनुभवों पर आधारित एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में विकसित हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की निर्जलीकरण प्रणालियाँ योजनाबद्ध ढंग से उन क्षेत्रों में स्थापित की जाए, जहां महुआ, वनौषधियाँ और अन्य कृषि-वन उत्पाद संग्रह के बाद नष्ट हो जाते हैं, तो यह अपव्यय में कमी, खाद्य-ग्रेड संग्रह और आदिवासी आजीविका को सशक्त बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। जशपुर में चल रही यह परियोजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखी जा रही है।

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