Monday, April 15

वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक कुर्सीनामा -1 किसको फिक्र है “कबीले”का क्या होगा , लड़ाई इस बात की हैं “सरदार” कौन होगा

 

0 चंद्र शेखर शर्मा 9425522015

कुर्सीनामा -1

किसको फिक्र है “कबीले”का क्या होगा ,
लड़ाई इस बात की हैं “सरदार” कौन होगा ।
” पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस के मौसम चार पांचवा मौसम प्यार का ” लता मंगेशकर के स्वर ,टीना मुनीम और ऋषिकपूर अभिनीत फिल्म सिंदूर का गाना आज अचानक कवर्धा दंगा पार्ट 2 की घटनाओं गिरते राजनीतिनके स्तर गाली गलौच पर उतरते नेताओ की बदजुबानी को देख कर आ गया।

वैसे तो देश मे सर्दी, बारिश और गर्मी का अपना मौसम है या यूं कहा जाए कि इन मौसमों से ही आम जनजीवन चलता है। मगर एक ऐसा मौसम भी है जिस पर आज तक किसी मौसम विज्ञानी ने ध्यान नही दिया वह है हड़ताल धरना प्रदर्शन और बन्द का । राजनीति में देश के सर्वाधिक लोकप्रिय इस मौसम के आने और जाने का अपना समय होता है। कुर्सी की चाहत में चुनाव के नजदीक आते ही धर्म और जाति के नाम पर जिंदाबाद , मुर्दाबाद , हमारी मांगे पूरी करो की मंगल ध्वनि के साथ हड़ताल धरना प्रदर्शन का मौसम शुरू हो जाता है और इसी के साथ सरकार की ईंट से ईंट बजा देने के दावे किए जाते है । नेताओ की रग-रग व जीवन शैली में रची-बसी हड़ताल धरना प्रदर्शन रूपी मौसमी बीमारी चुनाव नजदीक आते ही ‘मेरा मन डोले मेरा, तन डोले…’ की धुन सी अपना असर दिखाने लगती है । अब जनता धीरे धीरे इस धुन के आदी होने लगी हैं। इस मौसम का लुफ्त और मजा असमाजिक तत्व और दंगाई उठाते हैं जनता तो है ही परेशानी झेलने के लिए ।

हड़ताल के आये मौसम में ताने गए हड़ताल का तंबू देख गुजरती गोरहिंन टुरी को जब छेड़ता हु की तै कैसे हड़ताल नई करस वो, वो चिढ़ कर कहती है तहू महराज आय बांय झन गोठियाय कर ये हड़ताल हमन तुमन रोज कमइया खवाईया मन बर थोड़े हावय । ये हर नेता मन के कुर्सी पाय के चोचला हावय । पहली अपन घर के झगरा ल त निपटा लय , अपन जात समाज ल सम्हाल लय फेर जनता के फिकर करय । महराज ए दारी जनता इखर साथ काबर नई हावय ? भाजपा के बात ल भाजपा अउ कांग्रेस के बात ल कांग्रेस जानय हमला का हम त गोबर बिनबो , छेना थापबो त खाय बर मिलहि , अउ तै अपन कलम ल घिसबे त बाई हर खाये बर दिही । जा महराज आज हड़ताल ल ले के कलम ल घिस ले शायद तोर लिखे ले कुर्सी दउड़ में लागे नेता मन के शायद आत्मा जाग जाय अउ शहर में शान्ति अमन आउ का का कहिथे न तउन आ जाय ।

और अंत मे:-

पानी को बर्फ में बदलने में वक्त लगता है ,
ढले हुए सूरज को निकलने में वक्त लगता है ।
थोड़ा धीरज रख,थोड़ा और जोर लगाता रह ,
किस्मत के जंग लगे दरवाजे को खुलने में वक्त लगता है ।।

{ क्रमशः आगामी अंक में }

#जय_हो 22 नवम्बर 22 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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