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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक … फाइलें मुस्कुराती हैं, सिस्टम कराहता है—जमीर तो कब का छुट्टी पर है!”

हमारे देश में दो ही चीज़ें कभी बीमार नहीं पड़तीं एक सरकारी फाइल और दूसरी अफसरों की आत्मा। फाइल चाहे कितनी भी पुरानी हो, उसमें दर्ज हर चीज़ “स्वस्थ” रहती है। जंगल का घायल बायसन हो या विकास का आधा-अधूरा काम कागज पर सब 100% फिट लगता है , जैसे फाइलों के लिए कोई अलग फिटनेस सेंटर खुला हो, जहां झूठ को रिश्वत का प्रोटीन शेक पिलाकर ताकतवर बना दिया जाता है।

अफसरों का जमीर भी बड़ा समझदार है। उसने अपने आप को “डू नॉट डिस्टर्ब” मोड पर रखा है, कभी-कभी हल्की सी हलचल होती भी है तो तुरंत कोई ऊपरवाला आदेश, कोई बहाना उसे फिर से सुला देता है। शायद जमीर भी सोचता होगा—“यहां जागकर फायदा ही क्या है?”

इस पूरे सिस्टम को अगर एक खेल मान लें, तो यह “जिम्मेदारी से बचो” नाम का ओलंपिक इवेंट है। हर कोई इसमें गोल्ड मेडल जीतने की कोशिश में है

एक फ़िल्म आयी थी “डकैत” सनी देओल लीड एक्टर था। फ़िल्म का क्लोज़िंग डायलॉग था “जब तक जुल्म है, जमींदार है, डकैत ख़त्म नहीं हो सकते”

इस डायलॉग को अगर प्रदेश के वर्तमान हालात और अफ़सरशाही के सत्य से जोड़ दूँ तो “जब तक लाल फीताशाही पैर जमाये हुए है तब तक सुशाशन केवल कागजो में रहेगा धरातल पर नहीं आ सकता….”

अमित शाह और विजय शर्मा की जोड़ी ने भले ही छत्तीसगढ़ की धरती को नक्सल मुक्त कर दिया है किंतु लालफीताशाही के आतंक से मुक्ति पाने छत्तीसगढ़ महतारी छटपटा रही है । सुशाशन की सरकार में कलेक्ट₹ को राजभाषा छत्तीसगढ़ी में आवेदन देना उनके ईगो को हर्ट करता है ।

कबीरधाम में अफसरों की कला देखिए, खाना भी खा लेते हैं, पचा भी लेते हैं और पेमेंट की बारी आते ही ऐसे रफूचक्कर हो जाते हैं जैसे गधे के सर से सिंग और कुर्की के आदेश बाद वही अफसर समय की भीख मांगते दिखते हैं। यह भी कमाल है जब लेने की बारी हो तो समय नहीं देखते, और जब देने की बारी आए तो समय मांगते हैं। मानो सरकारी घड़ी में भी “लालफीताशाही टाइम ज़ोन” चलता हो, जिसमें हर काम कल पर टलता है और वो कल है कि आता नही ।

दूसरी तरफ जंगल में तीर से घायल बायसन कागजों और प्रेस विज्ञप्ति में बिल्कुल फिट और फाइन रहा। फाइल में उसकी सेहत इतनी अच्छी थी कि शायद वो खुद भी अपनी हालत देखकर हैरान हो जाए। वन विभाग की लापरवाही ने उसे मौत के मुंह में धकेल दिया, लेकिन कागजों में वो अभी भी “दौड़ता-भागता, स्वस्थ” है। यह वही जादू है जिससे सूखे में भी हरियाली दिखती है और मरते हुए सिस्टम में भी “सब कुछ नियंत्रण में” लिखा जाता है।

राजनीति का रंग भी इन दिनों कुछ ज्यादा ही गाढ़ा है। दुराचार के मामले में एक नेता की गिरफ्तारी हुई है, और अब सवाल यह है कि प्रेम अचानक अपराधी कैसे बन गया? जांच जारी है, बयान जारी हैं, और सच कहीं फाइलों में छुट्टी पर गया हुआ है। यहाँ रिश्ते भी मौसम की तरह बदलते हैं। जब तक सब ठीक है, तब तक सहमति, और जैसे ही दगाबाजी हुई “दुराचार” हो जाता है।

दूसरी ओर “नारी वंदन” के महाअध्याय में संवेदनाओं का जो राजनीतिक नाटक शुरू होता है, वह किसी रुदाली रुदन से कम नहीं। नेता मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं, पुतले जलाए जाते हैं बस मन का पाप नही जलाया जाता , प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है शब्दो के बाण चलाये जाते है , बस न्याय कहीं दिखाई नहीं देता लगता है नारी सम्मान भी अब वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने लगा है । ज़रूरत पड़ी तो याद किया, वरना अगली घटना तक भूल गए।

छत्तीसगढ़ में धान घोटाले की कहानी तो जैसे वेबसिरिज है हर एपिसोड में नया ट्विस्ट। कभी चूहे खा जाते हैं, कभी दीमक, कभी मौसम, और कभी “अज्ञात कारण”। ऐसा लगता है कि धान नहीं, जिम्मेदारी गायब हो रही है। कागजों में सब कुछ “ओके” है, लेकिन जमीन पर कुछ भी नहीं। शायद अब “धान खोजो अभियान” चलाना पड़े, जिसमें इनाम रखा जाए जो ढूंढे, वही मालिक।

चिल्फी आरटीओ बैरियर की बात करें तो वह अब चेकपोस्ट कम, वसूली केंद्र ज्यादा लगता है। कैमरा दिखते ही व्यवस्था बदल जाती है—“आइए बैठिए, चाय लेंगे या ठंडा?” और जैसे ही कैमरा हटता है, असली स्क्रिप्ट शुरू होती है। फोन नंबर लिया जाता है, डील सेट होती है और सिस्टम मुस्कुराता है—“कमायेगे तभी तो खिलाएंगे।” यह नया आर्थिक मॉडल है, जिसमें टैक्स से ज्यादा भरोसा लिफाफा पर होता है।

जिले की सड़कें भी अब व्यंग्य करने लगी हैं। समझ नहीं आता कि सड़क में ब्रेकर है या ब्रेकर के बीच सड़क। हर कुछ मीटर पर झटका, हर मोड़ पर सवाल। लेकिन सबसे बड़ा ब्रेकर भ्रष्टाचार पर क्यों नहीं लगता? शायद इसलिए क्योंकि उस रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले ही ब्रेकर बनाने वाले हैं।

कागजी घोड़े दौड़ाने में हमारे अफसरों की कोई बराबरी नहीं। रिपोर्ट इतनी शानदार बनती है कि पढ़ने वाला सोचता है कि देश स्वर्ग बन चुका है। लेकिन जैसे ही जमीन पर उतरते हैं, हकीकत थप्पड़ मारकर याद दिलाती है—“भाई, यह इंडिया है, भारत नहीं।”

सबसे दुखद बात यह है कि सिस्टम का बलात्कार करने वालों को शर्म नहीं आती उनका जमीर मर चुका है । आज कल सिस्टम “एडजस्टमेंट” से चलता है। यहाँ हर गलत चीज़ को सही ठहराने का हुनर है, हर भ्रष्टाचार को सामान्य बनाने का अभ्यास है और जब तक यह अभ्यास चलता रहेगा, तब तक न बायसन बचेगा, न धान, न सड़क , न इज्जत बस कागजों में सब कुछ “दुरुस्त” रहेगा।

अगली बार जब कोई अफसर कहे “सब कंट्रोल में है”, तो समझ जाइए कि कंट्रोल सिर्फ बयान में है, हकीकत में नहीं और जब कोई नेता नारी सम्मान की बात करे, तो यह भी देखिए कि उसकी चुप्पी कहाँ-कहाँ कब कब बोलती है।

इस देश को ब्रेकर की नहीं, भ्रष्टाचार पर ब्रेक लगाने वालें नेता अफसर की जरूरत है।

 

और अंत में:-

जो तौर तरीका है दुनियां का,

उसी तौर तरीके से बोलो ।

बहरों का इलाक़ा है ,

ज़रा ज़ोर से बोलो।।

#जय_हो 26 अप्रेल 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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