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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक … ऑपरेशन दिल्ली दरबार : कुर्सी बचाओ, कद बढ़ाओ

छत्तीसगढ़ की भगवा राजनीति में इन दिनों सरकार हुजुरे आलिया से ज्यादा एक रियलिटी शो लग रही है, जिसका नाम रखा जा सकता है—” भागमभाग ” फर्क बस इतना है कि यहां रील की जगह रियल में सही समय पर दिल्ली की फ्लाइट पकड़ अपने अपने आका के दरबार मे जुगाड़ लगा लेना।

भगवा राजनीति के भागमभाग रियलिटी शो में मुख्यमंत्री अचानक भयानक अपने काबिल मंत्रिमंडल की बैठक बुलाते है बैठक के अचानक भयानक फरमान से कई मंत्री कन्फ्यूजन में हैं कि बैठक बुलायी गई है या फिर उनका राजनीतिक हेल्थ का मेडिकल चेकअप होने वाला है। खबर मिलते ही मंत्री ऐसे भागे जैसे परीक्षा हॉल में देर से पहुंचा छात्र आखिरी घंटी सुनकर दौड़ता है। कोई चार्टर प्लेन से , कोई कार में और कोई मोबाइल पर दिल्ली के संपर्कों और दिल्ली दरबार के आका को साधते हुए राजधानी पहुंचा बैठक में पहुंचता है ।

बैठक शुरू हुई तो बाहर खड़े पत्रकारों की आंखों में वही चमक थी जो बोर्ड परीक्षा के नतीजे वाले दिन पड़ोसियों की आंखों में होती है। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद बाहर निकले मंत्रियों के चेहरे देखकर लग रहा था मानो किसी ने उनकी राजनीतिक जन्मपत्री में राहु-केतु की विशेष एंट्री कर दी हो। मुस्कान गायब, आत्मविश्वास छुट्टी पर और चेहरे की रंगत ऐसी कि मानो अभी-अभी हॉरर फिल्म देखकर निकले हों।

इस बार सूत्र भी बेरोजगार हो गए हैं उनका हाल भी बड़ा दयनीय हो चला है। आम दिनों में जो सूत्र गाहे बगाहे मुख्यमंत्री के मन की बात, प्रदेश अध्यक्ष के सपने , पुराने चावलों का उबाल और दिल्ली दरबार की फुसफुसाहट तक और अगले छह महीने की राजनीतिक मौसम का हाल बता देते थे, वे इस बार खुद पूछ रहे हैं—”भाई, कुछ पता चला क्या?” भाजपा की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले जानकार भी केवल इतना ही कह पा रहे हैं कि “कुछ बड़ा होने वाला है।” राजनीति में “कुछ बड़ा होने वाला है” उतना ही खतरनाक वाक्य है जितना अस्पताल में डॉक्टर का यह कहना कि “पहले रिपोर्ट आने दीजिए फिर बताते हैं ।” अब यह “कुछ बड़ा” क्या है, इसका मतलब हर घंटे बदल रहा है।

इधर एक उपमुख्यमंत्री मुख्यमंत्री के साथ दिल्ली दरबार पहुंचते हैं तो दूसरे उपमुख्यमंत्री भी स्वास्थ्य मंत्री के साथ दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाते हैं। दृश्य ऐसा है मानो छत्तीसगढ़ का मंत्रिमंडल कोई बीमार मरीज हो और दिल्ली के राजनीतिक डॉक्टर उसकी एमआरआई रिपोर्ट देखकर चर्चा कर रहे हों कि ऑपरेशन अभी करना जरूरी है या केवल दवा और परहेज से काम चल जाएगा।

दिल्ली में नेताओं की आवाजाही देखकर एयरलाइंस वालों को भी लग रहा होगा कि अब नियमित उड़ानों के अलावा “मंत्रिमंडल फेरबदल स्पेशल” सेवा शुरू कर देनी चाहिए। टिकट पर लिखा हो—”रिटर्न कन्फर्म नहीं है, क्योंकि वापसी तक विभाग बदल सकता है।” हर उड़ान के साथ नई अफवाह उड़ रही है। कोई कह रहा है पांच मंत्री बदलेंगे, कोई सात बता रहा है, कोई पूरी टीम में सर्जरी की बात कर रहा है। राजनीति में गणित के इतने नए नए समीकरण बन रहे हैं कि राजनीति की पाठशाला मे नया पाठ्यक्रम शुरू करना पड़ सकता है।

मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की चर्चाओं ने कई नेताओं की नींद उड़ा रखी है। जो मंत्री हैं, वे मंत्री बने रहने के लिए बेचैन हैं। जो मंत्री नहीं हैं, वे मंत्री बनने के लिए बेचैन हैं। और जो किसी भी दौड़ में नहीं हैं, वे बेचैन हैं कि कहीं उनका नाम अचानक दौड़ में न आ जाए। कई विधायक तो इन दिनों अपने मोबाइल को ऐसे देख रहे हैं जैसे प्रेमी अपने प्रिय के संदेश का इंतजार करता है। हर फोन कॉल पर दिल धड़क उठता है—कहीं दिल्ली से बुलावा तो नहीं? कहीं विभाग बदलने की सूचना तो नहीं? कहीं “बधाई हो” या “धन्यवाद, आपने अच्छा काम किया” वाला संदेश तो नहीं आने वाला?

इन सबके बीच चाउर वाले बाबा उर्फ डाक्टर साहब की केदार कश्यप और तोखन साहू के साथ हँसगोइंया करती शोसल मीडिया में वायरल होती फोटू कईयों का बीपी बढ़ा रही है । राजनीति के पुराने चावलों की बची खुची उम्मीदों के बीच सबसे दिलचस्प चर्चा महिला मंत्री के संभावित बदलाव को लेकर है। खबरें कह रही हैं कि उनकी जगह सूबे की राजनीति में अलग पहचान बना चुकी भावना मंत्री बन सकती हैं। अब भावना मंत्री बनें या न बनें, लेकिन इस संभावना मात्र से कई नेताओं की “भावनाएं” आहत हो चुकी हैं। कुछ की भावना इसलिए आहत है कि उनका नाम क्यों नहीं आया, कुछ की इसलिए कि किसी और का नाम कैसे आ गया। राजनीति में पद कम और भावनाएं अधिक घायल हो रही हैं। भावना के मंत्री बनने की चर्चाओं ने तो राजनीतिक वातावरण में भावनात्मक सुनामी ला दी है।

कई विधायक तो इन दिनों अपने मोबाइल को ऐसे देख रहे हैं जैसे प्रेमी अपने प्रिय के संदेश का इंतजार करता है। हर फोन कॉल पर दिल धड़क उठता है—कहीं दिल्ली से बुलावा तो नहीं? कहीं विभाग बदलने की सूचना तो नहीं? कहीं “बधाई हो” या “धन्यवाद, आपने अच्छा काम किया” वाला संदेश तो नहीं आने वाला?

जनता भी मजे ले रही है। उसे मालूम है कि चाहे बैठकें कितनी भी गोपनीय हों, अफवाहें लोकतंत्र की सबसे पारदर्शी व्यवस्था हैं। हर चौक चौराहे , चाय , पान ठेले और व्हाट्सएप ग्रुप में नया मंत्रिमंडल बन और बिगड़ रहा है।

फिलहाल छत्तीसगढ़ की भगवा राजनीति में सस्पेंस का ऐसा मौसम चल रहा है जिसमें हर नेता खुद को सुरक्षित भी मान रहा है और असुरक्षित भी। दिल्ली की ओर उठती निगाहें, राजधानी में बढ़ती बेचैनी और सूत्रों की चुप्पी मिलकर एक ही बात कह रही हैं—राजनीति में जब सब लोग “कुछ बड़ा होने वाला है” कहने लगें, तब समझ लीजिए कि किसी को भी पता नहीं है कि होने क्या वाला है।

बाकी, राजनीति के इस महाभारत में कौन अर्जुन बनेगा, कौन संजय और कौन सीधे वनवास पर जाएगा, यह अभी समय के गर्भ में है। तब तक अफवाहों का लोकतंत्र जिंदाबाद!

फिलहाल छत्तीसगढ़ की भगवा राजनीति में हर कोई दूसरे की कुर्सी नाप रहा है और अपनी कुर्सी पकड़कर बैठा है। दिल्ली की तरफ उठती निगाहें बता रही हैं कि असली सरकार रायपुर में नहीं, उसकी धड़कनें अभी भी दिल्ली के स्टेथोस्कोप से सुनी जा रही हैं। अब देखना यह है कि ऑपरेशन के बाद मरीज स्वस्थ होकर बाहर आता है, कुछ अंग बदलते हैं या फिर डॉक्टर यह कहकर भेज देते हैं “अभी दवा चलने दीजिए, अगली रिपोर्ट के आने तक धैर्य रखें।”

 

और अंत में :-

 

वाकिफ़ हूँ बखूबी इस दुनिया की फितरत से ,

बहुत चाहते है लोग, मगर जरुरत की तरह ।

 

 

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