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राजनीतिक दल बिहार में वोटर लिस्ट में को लेकर नहीं दिखा रहे दिलचस्पी, सुप्रीम कोर्ट ने जताई हैरानी

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाताओं के नाम हटाने को लेकर राजनीतिक दलों की कम भागीदारी पर हैरानी जताई है। कोर्ट ने कहा कि वोटर अब आधार कार्ड या 11 अन्य मान्य दस्तावेजों के साथ दावा फॉर्म जमा कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिहार में मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में ऑनलाइन क्लेम सबमिट करने की अनुमति दी जाएगी।

SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। ये याचिकाएं RJD सांसद मनोज झा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), PUCL, एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और बिहार के पूर्व MLA मुजाहिद आलम ने दायर की हैं। याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग के 24 जून के उस आदेश को रद्द करने की मांग की है, जिसमें बिहार के कई मतदाताओं को वोटर लिस्ट में बने रहने के लिए नागरिकता का प्रमाण देने को कहा गया है।

चुनाव आयोग ने कोर्ट में क्या बताया?

सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि अभी तक 85,000 नए मतदाताओं को जोड़ा गया है, लेकिन राजनीतिक दलों के बूथ-लेवल एजेंटों ने केवल दो आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इस पर कोर्ट ने आश्चर्य जताया।

इससे पहले 14 अगस्त को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बिहार की मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की जानकारी जिला मजिस्ट्रेट की वेबसाइट पर अपलोड कर दी थी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 56 घंटों के भीतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। उन्होंने बताया कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स और बूथ लेवल ऑफिसर्स मतदाता सूची की सटीकता के लिए जिम्मेदार हैं। ये सूचियां पार्टियों और जनता के साथ डिजिटल और फिजिकल रूप से साझा की जाती हैं। बिहार में 1 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट रोल 1 सितंबर तक दावों और आपत्तियों के लिए खुले हैं।

चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि यह ‘गंभीर चिंता का विषय’ है कि कुछ पार्टियां ‘गलत सूचना’ फैला रही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की चुनाव प्रणाली एक बहु-स्तरीय, विकेंद्रीकृत संरचना है, जैसा कि कानून में वर्णित है।

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