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विभुवन संकष्टी कल, पढ़ें भगवान गणेश के प्रथम पूज्य बनने की रोचक कथा

Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, जब संकष्टी चतुर्थी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में पड़ती है, तो उसे ‘विभुवन संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है. यह विशेष संयोग लगभग हर तीन वर्ष में एक बार बनता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को कई गुना अधिक पुण्य फल और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है. इस पावन अवसर पर आइए जानते हैं कि भगवान गणेश को देवताओं में ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान कैसे प्राप्त हुआ.

पौराणिक कथा

एक बार स्वर्गलोक में सभी देवी-देवताओं के बीच इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि धरती पर होने वाले शुभ कार्यों और धार्मिक अनुष्ठानों में सबसे पहले किस देवता की पूजा की जानी चाहिए. प्रत्येक देवता स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और प्रथम पूज्य सिद्ध करने का प्रयास करने लगा. विवाद बढ़ता देख सभी देवता निर्णय के लिए सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे. विवाद का समाधान करने के लिए भगवान ब्रह्मा ने एक प्रतियोगिता आयोजित की. उन्होंने सभी देवताओं से कहा, “जो देवता अपने वाहन पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करके सबसे पहले वापस लौटेगा, वही प्रथम पूज्य कहलाएगा.”

देवताओं की दौड़ और गणेश जी की बुद्धिमानी

भगवान ब्रह्मा की बात सुनते ही सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े. भगवान कार्तिकेय अपने मयूर (मोर) पर बैठकर तेज गति से आगे बढ़ गए. वहीं, भगवान गणेश के सामने एक बड़ी चुनौती थी. उनका वाहन मूषक (चूहा) था और उनका शरीर भी अन्य देवताओं की तुलना में भारी था. ऐसे में पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर सबसे पहले लौटना उनके लिए लगभग असंभव था. लेकिन गणेश जी बुद्धि और विवेक के देवता हैं. उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए भगवान शिव और माता पार्वती को एक आसन पर विराजमान किया. इसके बाद उन्होंने श्रद्धापूर्वक अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए.

माता-पिता के चरणों में पूरा ब्रह्मांड

कुछ समय बाद सभी देवता ब्रह्मांड की परिक्रमा पूरी करके वापस लौटे. उन्होंने देखा कि भगवान गणेश पहले से ही वहां उपस्थित हैं. तब भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा कि उन्होंने यह प्रतियोगिता कैसे जीत ली. इस पर गणेश जी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया,”शास्त्रों में माता-पिता को समस्त लोकों और पूरे ब्रह्मांड से भी श्रेष्ठ बताया गया है. माता-पिता के चरणों में ही समस्त संसार का वास होता है. इसलिए उनकी परिक्रमा करना पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के समान है.”

प्रथम पूज्य का वरदान

भगवान गणेश की श्रद्धा, ज्ञान और अद्भुत बुद्धिमत्ता से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान ब्रह्मा अत्यंत प्रसन्न हुए. तब भगवान ब्रह्मा ने घोषणा की कि आज से किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, पूजा या मांगलिक अनुष्ठान से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाएगी. इसी घोषणा के साथ भगवान गणेश को ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान प्राप्त हुआ. तभी से सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण और पूजा के बिना नहीं की जाती.

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