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जब दिल्ली में इंडिया-ईयू ट्रेड डील कर रहे थे, तब एक यूएस डेलिगेशन भारत में बैठा था, क्या बात हुई?

US Visit during India-EU Trade deal: भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने मंगलवार, 27 जनवरी को ट्रेड डील फाइनल कर दिया. इस पर अमेरिका की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई. हालांकि, भारत को तो कुछ नहीं कहा गया, लेकिन यूरोप पर तीखी टिप्पणियां हुईं. कारण क्या है? इसकी वजह है भारत के साथ अमेरिका खुद ट्रेड डील करना चाहता है. जब इंडिया और ईयू मदर ऑफ डील्स कर रहे थे, उस दौरान अमेरिकी डेलिगेशन भारत में मौजूद था. अमेरिकी कांग्रेस का एक द्विदलीय (बिपार्टिसन) प्रतिनिधिमंडल 24 से 28 जनवरी तक नई दिल्ली के दौरे पर रहा. हालांकि यह ट्रेड डील नहीं, बल्कि रक्षा सहयोग और रणनीतिक समन्वय के मुद्दों पर भारत के साथ बातचीत पर फोकस्ड रहा.

इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन माइकल रोजर्स और रैंकिंग मेंबर एडम स्मिथ ने किया. उनकी संयुक्त मौजूदगी ने अमेरिका–भारत रक्षा साझेदारी के महत्व पर दुर्लभ द्विदलीय सहमति का संकेत दिया. प्रतिनिधि जिमी पैट्रोनिस और समिति के वरिष्ठ कर्मचारी भी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे.

यह दौरा ऐसे समय में हुआ जब दोनों देश बदलती क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं. अपने प्रवास के दौरान अमेरिकी सांसदों ने भारत के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई उच्च-स्तरीय बैठकें कीं. इनमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह शामिल थे. चर्चाएं केवल सरकारी दायरे तक सीमित नहीं रहीं; प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय और अमेरिकी रक्षा उद्योग के नेताओं से भी मुलाकात की, ताकि औद्योगिक और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करने के अवसर तलाशे जा सकें.

किस मुद्दे पर रहा चर्चा का फोकस

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठकों से परिचित अधिकारियों ने इन मीटिंग्स पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल की चर्चाएं मौजूदा रक्षा सहयोग ढांचों का विस्तार करने, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग को तेज करने और रक्षा प्रणालियों के सह-विकास (co-development) तथा सह-उत्पादन (co-production) के ठोस अवसरों की पहचान पर केंद्रित रहीं. इसे दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक आधारों को एक-दूसरे के करीब लाने और साझा सुरक्षा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यह दौरा वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं पर बढ़ती समानता (convergence) को पुख्ता करता है. इसके साथ ही यह भारत के साथ गहरे रक्षा एवं रणनीतिक संबंधों के लिए अमेरिकी कांग्रेस में मौजूद द्विदलीय समर्थन को भी उजागर करता है.

मीटिंग के बाद अमेरिकी डिलिगेशन क्या बोला?

चेयरमैन रोजर्स ने नई दिल्ली के साथ वॉशिंगटन के रणनीतिक संबंधों के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका भारत को एक मेजर डिफेंस पार्टनर के रूप में महत्व देता है. नई दिल्ली में हमारी चर्चाएं रक्षा सहयोग को मजबूत करने और डिफेंस टेक्नोलॉजी कोऑपरेशन को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहीं.’ यह भारत के डिफेंस मॉडर्नाइजेशन का समर्थन करता है और क्षेत्रीय स्थिरता को सुदृढ़ करता है. अमेरिका इस क्षेत्र में संतुलन और प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) को भी मजबूत करना चाहता है.

रैंकिंग मेंबर एडम स्मिथ ने भी इस बातचीत के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने दोनों लोकतंत्रों के बीच खुली और सार्थक बातचीत के लाभों पर जोर दिया. उन्होंने कहा, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच संबंध हमारे दोनों देशों और पूरी दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. इस प्रतिनिधिमंडल के दौरान जिस तरह का स्पष्ट और ईमानदार संवाद हम कर पाए, वह हमारे रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है, जिससे सभी संबंधित पक्षों को आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा लाभ मिलते हैं.’

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस यात्रा के व्यावहारिक परिणामों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि चेयरमैन रोजर्स की यात्रा ने जारी रक्षा सहयोग को मजबूत किया. भारत के रक्षा आधुनिकीकरण लक्ष्यों का समर्थन किया और हिंद-प्रशांत में स्थिरता के प्रति हमारी साझा कमिटमेंट को दोहराया.

ट्रंप की वजह से इंडिया-ईयू ट्रेड डील हो गई!

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील अब तक नहीं हो पाई है. इस मुद्दे पर दोनों देश लगभग 1 साल से बातचीत कर रहे हैं. कई दौर की बातचीत के बाद भी दोनों देश एक कॉमन मुद्दे पर सहमत नहीं हो पाए हैं. वहीं यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच लगभग 20 साल से ट्रेड डील पर बातचीत चल रही थी, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वजह से संभव हो गई. ट्रंप ने पूरी दुनिया भर के देशों को अपने टैरिफ से मुश्किल में डाल दिया है. यूरोप और भारत भी इससे अछूते नहीं रहे. भारत के ऊपर रूसी तेल की वजह से टैरिफ 50% पहुंच गया. वहीं यूरोप के देशों पर ग्रीनलैंड के मुद्दे ने असर डाला. इसी प्रेशर को कम करने के लिए दोनों पक्षों ने जल्द से जल्द इसे फाइनल कर दिया.

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