
धमतरी, 20 जुलाई 2026/ अक्सर यह माना जाता है कि बढ़ती उम्र के साथ कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है, लेकिन धमतरी जिले के ग्राम सिलघट निवासी 75 वर्षीय श्री धनऊ (भजनाहा) सोनकर इस धारणा को अपने कर्मों से प्रतिदिन गलत साबित कर रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी उनका उत्साह, अनुशासन और पशुपालन के प्रति समर्पण युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता केवल अथक मेहनत ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पशुपालन के प्रति उनकी जागरूकता और आधुनिक तकनीकों को अपनाने की सोच भी है।
श्री सोनकर प्रतिदिन सुबह स्वयं खेतों से अपने गौवंशीय पशुओं के लिए हरा चारा काटते हैं और उसे साइकिल से घर तक लाते हैं। यह कार्य वे बिना किसी सहायता के नियमित रूप से करते हैं। वर्तमान में उनके पास एक एचएफ × जर्सी संकर गाय, एक गिर × जर्सी संकर गाय, एक गिर नस्ल की बछिया तथा एक बछड़ा सहित कुल चार गौवंशीय पशु हैं। इनकी देखभाल, चारा-पानी की व्यवस्था, स्वच्छता और पालन-पोषण का पूरा दायित्व वे स्वयं निभाते हैं।
पिछले कई वर्षों से वे अपने पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) नियमित रूप से कराते आ रहे हैं। जैसे ही उनकी गाय हीट में आती है, वे बिना किसी देरी के तत्काल सूचना देते हैं। कई बार मई-जून की भीषण गर्मी में भी वे लगभग 3 से 4 किलोमीटर साइकिल चलाकर क्षेत्र के एवीएफओ श्री चंद्रशेखर निर्मलकर के पास स्वयं पहुँचते और उन्हें अपने साथ लेकर कृत्रिम गर्भाधान कराने जाते थे। उनकी यह तत्परता बताती है कि वे बेहतर नस्ल और अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए वैज्ञानिक तरीकों को कितनी गंभीरता से अपनाते हैं।
एवीएफओ श्री चंद्रशेखर निर्मलकर बताते हैं कि पिछले 11 वर्षों से, जब से उनकी इस क्षेत्र में पदस्थापना हुई है, तब से श्री धनऊ सोनकर अपने पशुओं में नियमित कृत्रिम गर्भाधान कराकर नस्ल सुधार अभियान में निरंतर सहयोग कर रहे हैं। ऐसे जागरूक पशुपालकों के कारण ही क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाली दुग्ध उत्पादक नस्लों का विकास संभव हो पाया है।
इतना ही नहीं, श्री सोनकर प्रत्येक वर्ष अवांछित (नाटे) नस्ल के सांडों का बधियाकरण भी कराते हैं तथा अपने सभी पशुओं का खुरपका-मुंहपका (FMD), गलघोटू (HS), लम्पी स्किन डिजीज (LSD) सहित सभी आवश्यक टीकाकरण समय पर सुनिश्चित करते हैं। पशुओं के स्वास्थ्य, नस्ल सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन को वे सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।
श्री सोनकर का मानना है कि पशुपालन केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार है। नियमित देखभाल, संतुलित पोषण, समय पर उपचार और वैज्ञानिक प्रबंधन से पशु स्वस्थ रहते हैं, दुग्ध उत्पादन बढ़ता है और परिवार की आय में भी निरंतर वृद्धि होती है। उनका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ किसी भी आयु में सम्मानजनक, सक्रिय और प्रेरणादायी जीवन जिया जा सकता है।
जिले में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए शासन द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पशुपालकों को तकनीकी मार्गदर्शन, कृत्रिम गर्भाधान, नस्ल सुधार, टीकाकरण, पशु स्वास्थ्य सेवाएं तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाना और पशुपालन को लाभकारी एवं टिकाऊ आजीविका के रूप में विकसित करना है।
श्री धनऊ (भजनाहा) सोनकर का जीवन यह संदेश देता है कि सफलता का संबंध उम्र से नहीं, बल्कि संकल्प, वैज्ञानिक सोच और निरंतर मेहनत से होता है। उनका श्रम, अनुशासन और पशुपालन के प्रति समर्पण न केवल ग्रामीण समाज बल्कि युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणास्रोत है।









