

एक टीवी सीरियल में एक दुरूह मर्डर केस में बचाव वकील बने पंकज त्रिपाठी ने कोर्ट में तर्क दिया कि ‘पब्लिक का प्रेशर मीडिया पे होता है, मीडिया का पुलिस पे, पुलिस पर दबाव होता है कि यथाशीघ्र मुश्किल सवाल के जवाब ढूंढे…. और दबाव में आई पुलिस आसानी से मिले जवाब को ही सही जवाब मान लेती है।
पंकज त्रिपाठी की ये बात काफी हद तक सही है। जानकार विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि कोर्ट मे पुलिस का तर्क खारिज हो जाता है और आमतौर पर हम असली अपराधी तक नहीं पहुंच पाते।
लापता लड़की को
वापस लाने
ले लिये बीस हजार
कोटा थाना बिलासपुर 16 साल की लड़की गायब हो गयी। चार महीने हो गये। पुलिस ने अपहरण को मामला बनाकर छानबीन शुरू कर दी। पता चला कि लड़की राजस्थान में है।
एएसआई हेमंत पाटले ने तीन लोगों के साथ राजस्थान जाकर लड़की को लाने के लिये होने वाले खर्चे के लिय बीस हजार की रिश्वत ले ली। इसका वीडयो वायरल हो गया तो एसपी ने एएसआई को सस्पेण्ड कर दिया।
जानकार लोगों का कहना है कि ऐसे काम के लिये जिसमें पुलिस का बाहर जाकर कुछ कार्यवाही करनी हो तो खर्चे के लिये पुलिस, अपने विभाग में आवेदन करती है, वहां से पैसा सेंशन होता है जिसमें थोड़ा वक्त लग जाता है। इसलिये पुलिस संबंधित व्यक्ति से ही पैसे लेकर काम चलाती है।
कई बार ऐसा भी देखा गया है कि पुलिस पीड़ित पक्ष से भी और विभाग से भी पैसा ले लेती है।
निरंकुशता ने ली
बड़े आदमी के भतीजे की जान
पुलिस ने चालू किये चालान
ओवर स्पीड पर ध्यान गया पुलिस का। एक मंत्री के भतीजे की अकाल मृत्यु हो गयी नया रायपुर में। ओवर स्पीड के कारण। बच्चों को नियम पता नहीं होते माता-पिता को बताना पड़ता है। उपर से यदि बच्चा पावरफुल परिवार से है तो नियम का पालन करना उसे सुहाता भी नहीं। और ऐसे में ऐसे अवांछित परिणाम सामने आ जाते हैं।
पता नहीं पालक कब जागेंगे कि अपने बच्चों को नियम कायदे से चलने की नसीहत दें बहरहाल… पुलिस जाग गयी। तत्काल चालान चालू कर दिये। ओवर स्पीड, नो पार्किंग, सिग्नल ब्रेक एलाॅउ नहीं करेगी अब। आप भी कभी लपेटे में आ सकते हो।
संदर्भवश ये भी बता दें कि अब पुलिस चालान भी फ़र्जी आने लगे हैं। आपके मोबाईल पर पुलिस का चालान आएगा। क्लिक करने पर कुछ जानकारी मांगी जाएगी और अंततः आपके खाते से लाखों रूप्ये गायब हो जाते हैं।
दो दिन पहले बिलासपुर के एक पार्षद बंधु मौर्य के साथ, जिनका ट्रªांसपोर्ट का काम है, इसी तरीके से ठगी हो गयी।
‘महीने’ के आगे
कमजोर
इंसानी जान
दुखद है कि बड़ी बसें-ट्रªकें, छोटा हाथी, आॅटो रिक्शा इन सबको पूरी छूट है। ये राॅंग साईड में घुस जंाएं, सड़क का मामूली सा किनारा लेकर बीच सड़क में गाड़ी खड़ी कर दें, सिग्नल तोड़कर आगे बढ़ जाएं कभी कोई चालान या सजा नहीं मिलती।
बैटरी डाउन होने पर बैटरी बचाने के लिये ई-रिक्शा वाले रात को बिना लाईट के चलते आमतौर पर देखे जा सकते हैं। लेकिन पुलिस को नहीं दिखते।
जानकार बताते हैं कि आॅटो वालों से कुछ मिलना नहीं है और दूसरी गाड़ियों का महीना बंधा है।
आखिर ईमानदारी भी तो कोई चीज है। जब महीना टाईम टू टाईम मिल जाता है तो फिर चालान कैसा ?
इंसान की जान की कीमत भी इस ‘महीने’ के सामने फीकी पड़ जाती है।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक मोबा.9522170700‘
बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’








