
पूरी फिल्म में बस एक ही बात बहुत गलत थी कि काफी वजनदार गालियां डाल दी थीं जो नहीं डालनी थीं। बस गाली नहीं डालनी थी। अन्यथा परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकती थी। यहां निर्माताओं ने गलती कर दी।
देशभक्ति और रोमांच से भरी ये फिल्म सबको पसंद आती। बस गाली नहीं डालनी थीं। कई परिवार इसे देखने से वंचित रह सकते हैं। संभव है पच्चीस-तीस प्रतिशत और भी चल जाती फिल्म गालियों के न होने से।

नया रायपुर में स्थित मिराज सिनेमा की कुर्सियों के हत्थे लंबे नहीं हैं, आधे हैं जो काफी असुविधाजनक है, तब भी फिल्म देखने का मजा कम नहीं हुआ। हाथ बांधकर या बिना हत्थे के इतना लंबा बैठना कष्टदायक होता है। मगर फिल्म इतनी बढ़िया थी कि ये बात गौण हो गयी।
पाक और पाकपरस्तों को
करारा जवाब है धुरंधर
पाकी आतंकियों को आराम से ठोक रहा भारत
देश के सामने ज्वलंत विषय है… पाकिस्तान, आतंकवाद, गद्दारी, बदला। ऐसे में झिंझोड़कर रख दिया धुरंधर ने।
खबर है कि विगत कुछ वर्षों से पाकिस्तान में कोई अज्ञात हमलावर आते हैं, केवल दो या तीन लोग बाईक में और किसी एक आतंकी सरगना को ठोककर चल देते हैं। जैसे चाय पीकर आराम से निकल गये हों।

पाकिस्तानी आतंकी सरगनाओं की फटी पड़ी है। अब तक भारत में कहर बरपाने वाले आतंकी सरगना पाक में आराम से ऐश का जीवन जीते रहे हैं। अब घर से निकलने में फटने लगी है, पता नहीं कहां से कोई फटफटिया मे आये और धांए-धांए दाग दे और पहुंचा दे बहत्तर हूरों के पास।
ये आतंकी पागल कुत्ते की तरह ईधर-उधर भागते फिर रहे हैं। क्यांेकि कभी ऐसा सोचा ही नहीं था कि भारत उन्हीं के अंदाज में उन्हें ऐसा जवाब देने का साहस दिखाएगा।
हाथ खोलो, फिर देखो
हिंदुस्तानी कायर है या बहादुर
ये जवाब है कंधार के हवाई जहाज में तैनात हाईजैकर को जो अजीत डोभाल के रोल में आर माधवन से कुछ इस तरह कहता है कि ‘हिंदुस्तानी कायर होता है। हम पड़ोसी हैं और तुम उखाड़ लेना जो उखाड़ सकोगे’ वगैरा… वगैरा…।
अब जब भारत की फटफटिया वाले खुफिया सिपाही पाकी आतंकियों के पिछवाड़े में डण्डा डाल रहे हंै तो निस्संदेह उस सूअर के बच्चे को पता चल गया होगा कि हिंदुस्तानी कायर है या बहादुर।
दरअसल
गर्व की सांस तो अब ली है
दरअसल बरसों से हम कानून, नियम और सभ्यता की किताब की आड़ में मुंह छिपाकर अंतर्राष्टीय मंच पर हाथ-पैर जोड़ा करते थे और गुहार लगाया करते थे कि देखो भैया ये पाकिस्तान हमको मार रहा है…., वो भाषा अब बदल गयी है।
दरअसल पहले की सरकारांे की आतंकियों से मिलीभगत और खराब नीयत अब ओपन सीक्रेट रह गयी है।
दरअसल तब ये था कि हमारी कुर्सी, हमारा पैसा, हमारी अय्याशियां कायम रहें, बढ़ती रहें और भारत का आम आदमी मरता रहे।
खैर तो ऐसे वातावरण मे जब भारतीयांेे का स्वाभिमान जाग रहा है और भारत के शौर्य पर अंकुश लगाने के लिये कुटिल, कपटी और स्वार्थी नेताओं का बोलबाला खतम हो चुका है और मोदी जैसे जांबाज देश की बागडोर थामे हुए हैं।
ऐसे में अजीत डोभाल जैसे जांबाज, चतुर और देशभक्त सिपाही ने राहत की सांस ली है। देशभक्त नागरिकों ने राहत की सांस ली है। भारत ने गर्व की सांस ली है।
देश की सुरक्षा के प्रति
नेताओं की लापरवाही
फिल्म में एक जगह मंत्री अजीत डोभाल से कहता है कि मैने तुम्हारी फाईल पढ़ ली है तुम सही हो वैसा ही करना पड़ेगा।
तब डोभाल कहते हैं ‘दो साल लग गये पढ़ने में’। यानि उन नेताओं को देश की सुरक्षा से संबंधित फाईल पढ़ने का वक्त नहीं था। कितने अफसोस की बात है ?
और आज कितने गर्व का माहौल है। बस इसीलिये धुरंधर ने न सिर्फ देश को भावुक कर दिया है, झिंझोड़ दिया है, देश को गर्व से भर दिया है। देश का आत्मविश्वास वापस आ गया है।
बहादुरी का लंबा है इतिहास
अभी तो ये शुरूआत
कई धुरंधर आएंगे सामने

धुरंधर लंबी है। लंबी नहीं, बहुत लंबी है। बहुत लंबी नहीं, बहुत ही लंबी है। इसीलिये इसे चैप्टरवाईस करके अलग-अलग भाग में दिखाया गया है। जांबाज सिपाहियों की शौर्यगाथा,नेताओं का कमीनापन इतने कम समय में दिखाना संभव नहीं है
लिहाजा फिल्म को दो भाग में बनाया गया है।
फिलहाल जो हमने देखी है वो इसका पहला भाग है। दूसरा भी तैयार बताते हैं। जब इससे भरपूर कमाई हो जाएगी और गन्ने से और रस निकलना लगभग बंद हो जाएगा तब दूसरा पार्ट भी दिखाया जाएगा।
खास बात ये है कि साढ़े तीन घंटे की इस फिल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि थोड़ा ज्यादा हो रहा है या चलो भाई, बहुत देर हो गयी या उबासी लेने लगें। बल्कि हर सीन के बाद आगे क्या होगा, ये उत्सुकता बनी रहती है। और मजे की बात हर अगला सीन उतना ही मजेदार होता है जितना पहला वाला था
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जवाहर नागदेव,
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700







