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पाकिस्तान-सऊदी अरब के रक्षा समझौते में तुर्की भी होगा शामिल, भारत-इजरायल दोनों पर असर पड़ना लाजिमी, जानें कैसे

सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ नाटो-शैली के रक्षा गठबंधन में तुर्की भी शामिल हो सकता है. इसकी चर्चा तीनों देशों के बीच बन रही है. इस संभावना ने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक सुरक्षा संतुलन पर नई बहस छेड़ दी है. सितंबर में सऊदी-पाक रक्षा समझौते की तर्ज पर बना यह संभावित गठबंधन सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर आधारित होगा, जिससे इसकी सैन्य ताकत बढ़ेगी. तुर्की इसे अमेरिका और नाटो पर बढ़ते संदेह के बीच एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे के रूप में देख रहा है. सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति, पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और तुर्की की युद्ध-अनुभवी सेना व उन्नत ड्रोन तकनीक इसे प्रभावशाली बना सकती है. भारत के लिए पाकिस्तान की भूमिका चिंता का विषय है, जबकि अमेरिका और इजरायल इसे क्षेत्रीय संतुलन बदलने वाले कदम के रूप में देख सकते हैं.

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल सितंबर में हुए रक्षा समझौता में अब तुर्की की भी एंट्री होने वाली है. तुर्की मीडिया की 9 जनवरी की रिपोर्ट के अनुसार, इस संभावित गठबंधन वाले समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा. यह नाटो के आर्टिकल-5 की तर्ज पर सामूहिक रक्षा सिद्धांत की तरह होगा. तुर्की की इसमें एंट्री इस व्यवस्था को सैन्य और रणनीतिक रूप से कहीं ज्यादा मजबूत बना सकती है. इस नाटो-शैली के रक्षा गठबंधन की संभावनाओं से न केवल पश्चिम एशिया बल्कि दक्षिण एशिया और वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर भी नई बहस छिड़ सकती है. प्रस्तावित गठबंधन क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है, जिसका असर भारत, अमेरिका और इजरायल जैसे देशों तक महसूस किया जा सकता है.

तुर्किये टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि अंकारा की भागीदारी को लेकर बातचीत अंतिम दौर में है और समझौते की संभावना प्रबल मानी जा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की इस गठबंधन को ऐसे समय में एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे के तौर पर देख रहा है, जब अमेरिका की वैश्विक प्रतिबद्धताओं और नाटो के प्रति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख को लेकर उसके सहयोगियों में संदेह बढ़ा है. दिलचस्प बात यह है कि तुर्की खुद नाटो का सदस्य है, लेकिन फिर भी वह एक समानांतर सुरक्षा गठबंधन की ओर बढ़ता दिख रहा है. यह संकेत देता है कि अंकारा अब अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह वॉशिंगटन पर निर्भर नहीं रहना चाहता. यह रुख अमेरिका के लिए एक रणनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे नाटो के भीतर एक अहम सदस्य की प्राथमिकताओं में बदलाव झलकता है.

तीनों देशों के मिलने से बढ़ेगी सैन्य ताकत

अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहात अली ओजचान के अनुसार, इस गठबंधन से तीनों देशों को अलग-अलग स्तर पर फायदा होगा. सऊदी अरब की आर्थिक ताकत- तेल भंडार के कारण मजबूत वित्तीय संसाधन, पाकिस्तान की परमाणु क्षमता बैलिस्टिक मिसाइलें और एक बड़ी स्थायी सेना और तुर्की की युद्ध-अनुभवी सेना तथा उन्नत ड्रोन तकनीक मिलकर एक प्रभावशाली सैन्य शक्ति का रूप ले सकती हैं. तीनों देश इस्लाम के सुन्नी प्रभाव वाले हैं. सऊदी अरब और तुर्की में अतीत में मेलजोल काफी कम ही रहा है, लेकिन पाकिस्तान इन दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में आ रहा है.

तीनों के बीच पाकिस्तान बनेगा मध्यस्थ

तुर्की और सऊदी अरब न सिर्फ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि आर्थिक सहयोग को भी नई दिशा दे रहे हैं. इसी कड़ी में हाल ही में तुर्की में दोनों देशों के बीच पहली बार नौसैनिक स्तर की वार्ता हुई, जिसे आपसी विश्वास बढ़ने का संकेत माना जा रहा है. दूसरी ओर, तुर्की और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग पहले से ही बेहद मजबूत है. तुर्की न केवल पाकिस्तान के लिए युद्धपोत तैयार कर रहा है, बल्कि उसके एफ-16 लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण का काम भी कर चुका है. इसके अलावा, ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग है.

सऊदी अरब को सुरक्षा मुहैया कराएगा पाकिस्तान

वहीं, पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ पिछले साल रक्षा समझौता तो किया ही. 2026 में उसने सऊदी अरब से मिले 2 बिलियन डॉलर लोन के बदले F-16 फाइटर जेट देने का सौदा भी कर लिया. वैसे पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ सैन्य स्तर पर पहले से ही काफी नजदीकी संबंध है. अब तुर्की की कोशिश है कि वह इस गठबंधन में घुसकर अपने हथियारों को बेच सके. वह अपने स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट कार्यक्रम ‘कान’ में भी सऊदी अरब और पाकिस्तान को साझेदार बनाने की कोशिश करेगा, जिससे इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अंतरराष्ट्रीय समर्थन और रणनीतिक मजबूती मिल सके.

भारत के लिए क्या मायने?

भारत के नजरिए से देखें तो पाकिस्तान की भूमिका इस गठबंधन को संवेदनशील बनाती है. पाकिस्तान पहले से ही भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों में है और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव भी देखने को मिला है. ऐसे में पाकिस्तान को यदि सऊदी अरब की वित्तीय मदद और तुर्की की सैन्य तकनीक का संगठित समर्थन मिलता है, तो यह दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है. हालांकि, यह गठबंधन फिलहाल भारत के खिलाफ सीधे तौर पर केंद्रित नहीं दिखता, लेकिन नई दिल्ली इसे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों के संदर्भ में सतर्क नजर से देखेगी, खासकर तब जब पाकिस्तान इसे अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है.

इजरायल की चिंता क्यों?

इस संभावित गठबंधन का एक और अहम पहलू इजरायल से जुड़ा है. तुर्की और सऊदी अरब दोनों ही हाल के वर्षों में इजरायल के साथ अपने रिश्तों को लेकर उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरे हैं. हालांकि सऊदी अरब और इजरायल के बीच पर्दे के पीछे सहयोग रहा है, लेकिन तुर्की का झुकाव पारंपरिक रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थक और इजरायल-विरोधी रुख की ओर रहा है.

2011 के अरब स्प्रिंग के बाद तुर्की और कतर ने मुस्लिम ब्रदरहुड का खुलकर समर्थन किया था, जिससे सीरिया, लीबिया और मिस्र जैसे देशों में अस्थिरता बढ़ी. उस समय सऊदी अरब भी इस परियोजना का हिस्सा था, जिसे अमेरिका और इजरायल का समर्थन प्राप्त था, लेकिन 2014 में रियाद ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया.

बदले रिश्ते, बदला संतुलन

2017 में कतर पर सऊदी अरब द्वारा लगाई गई नाकेबंदी ने तुर्की को खाड़ी क्षेत्र में सैन्य रूप से सक्रिय भूमिका निभाने का मौका दिया. कतर के अनुरोध पर तुर्की ने वहां अपने सैनिक तैनात किए, जिससे अंकारा की क्षेत्रीय मौजूदगी और मजबूत हुई. अब सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ती नजदीकी यह दिखाती है कि पुराने मतभेद पीछे छूट रहे हैं और नए रणनीतिक हित सामने आ रहे हैं. इसका संकेत इस सप्ताह अंकारा में हुई दोनों देशों की पहली संयुक्त नौसैनिक बैठक से मिलता है.

पाकिस्तान की रणनीति

पाकिस्तान पहले से ही तुर्की और सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग रखता है, लेकिन भारत के साथ मई में हुए संघर्ष और तालिबान-शासित अफगानिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बाद वह और मजबूत सुरक्षा साझेदारियों की तलाश में है. पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है. यह संगठन पाकिस्तान के भीतर कई बड़े हमलों को अंजाम दे चुका है.

कुल मिलाकर, तुर्की-सऊदी-पाकिस्तान का यह संभावित गठबंधन सिर्फ तीन देशों का रक्षा समझौता नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि अमेरिका-केंद्रित सुरक्षा ढांचे के समानांतर अब क्षेत्रीय शक्तियां अपने स्वतंत्र सैन्य समीकरण गढ़ने की कोशिश कर रही हैं. इसका असर आने वाले समय में भारत की रणनीतिक गणनाओं, अमेरिका की वैश्विक भूमिका और इजरायल की क्षेत्रीय सुरक्षा नीति तीनों पर पड़ सकता है.

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