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पाकिस्तानी पुलिस वाले को वापस भेजने का ऑर्डर कैंसल; टॉर्चर, किलिंग, दुष्कर्म का लगा था आरोप, कनाडा ने क्यों लिया ये फैसला?

Pakistan Police Man Canada: पाकिस्तान की पंजाब पुलिस में काम करने वाले पूर्व हेड कॉन्स्टेबल मुनीर अहमद मल्ही को कनाडा से बाहर भेजने (डिपोर्ट) का आदेश दिया गया था. उन पर 37 साल लंबे पुलिस करियर के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध (क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी) करने के आरोप लगे थे. लेकिन मल्ही ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और अब उन्हें जीत मिली है. अदालत ने कहा कि डिपोर्ट का आदेश सही तरीके से, पारदर्शिता (ट्रांसपैरेंसी) और स्पष्ट आधार (क्लियर बेसिस) के बिना दिया गया था. अब उन्हें शरणार्थी बनने का एक और मौका मिला है.

मल्ही ने 1979 से 2016 तक पाकिस्तान की पुलिस में काम किया और फिर रिटायर हो गए. चार साल बाद, वे अपनी पत्नी के साथ कनाडा आए. यहां उन्होंने अपने अहमदिया धर्म के कारण पाकिस्तान में उत्पीड़न के खतरे का हवाला देकर शरणार्थी बनने का आवेदन किया. साल 2020 में कनाडा के आव्रजन मंत्री (इमिग्रेशन मिनिस्टर) ने उनका आवेदन खारिज कर दिया और कहा कि उन्हें शरण नहीं दी जा सकती. 2022 में उनका इंटरव्यू हुआ और उनका शरणार्थी दावा रोक दिया गया.

अपराधों में माना गया था सहयोगी

उस दौरान उन्हें हिंसक अपराधों में “सहयोगी” माना गया, जैसे कि टॉर्चर, बलात्कार, जबरन गायब करना और बिना न्याय के हत्याएं. हालांकि आरोप यह नहीं थे कि मल्ही ने खुद इन अपराधों को किया. मल्ही ने स्वीकार किया कि पंजाब पुलिस हिंसक होने के लिए जानी जाती है. लेकिन, उन्होंने कहा कि उनका काम बहुत सीमित था और वे केवल डाक पहुंचाने जैसे काम करते थे. रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह हेड कॉन्स्टेबल थे और उन्हें कई पुरस्कार भी मिले.

साल 2024 में उन्हें बाहर भेजने का आदेश दिया गया. इसके बाद उन्होंने फेडरल कोर्ट में इस फैसले की समीक्षा के लिए याचिका (रिव्यू पेटिशन) दायर की. मल्ही ने कहा कि उन्होंने किसी भी अपराध में भाग नहीं लिया और न ही उन्हें किसी अपराध का समर्थन किया. उन्होंने बताया कि उन्हें पुलिस में अपराधों की जानकारी थी, लेकिन परिवार चलाने के लिए नौकरी छोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.

अहमदिया मुस्लिम होने के कारण उनकी शक्ति और प्रभाव भी सीमित था. मल्ही ने कहा कि उन्होंने कभी पूछताछ नहीं की और उनका काम सिर्फ डाक पहुंचाने तक ही सीमित था. हालांकि, अब 2026 के जनवरी महीने में अदालत ने उनका डिपोर्टेशन आदेश रद्द कर दिया और मामला दोबारा किसी अन्य अधिकारी के पास समीक्षा के लिए भेज दिया है.

पाकिस्तान में अहमदियों की स्थिति काफी खराब है

पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिमों की स्थिति काफी मुश्किल और भेदभावपूर्ण है. 1974 के संविधान संशोधन के बाद उन्हें कानून के नजरिए से मुस्लिम नहीं माना जाता, भले ही वे खुद को मुस्लिम मानते हों. 1984 के ऑर्डिनेंस XX ने उनकी धार्मिक गतिविधियों पर कई पाबंदियाँ लगा दीं. जैसे- खुद को मुस्लिम कहना, अपनी इबादतगाह को मस्जिद कहना, अजान देना या कुरान की आयतें छापने को अपराध माना जाता है. उनके लिए वोट देने की प्रक्रिया भी अलग है. उन्हें पहले यह लिखित में घोषणा करनी पड़ती है कि वे मुस्लिम नहीं हैं. वह अलग वोटर लिस्ट में डाले जाते हैं.

सामाजिक तौर पर भी अहमदियों के लिए हालात कठिन हैं. उन्हें हिंसा, लिंचिंग और उनकी इबादतगाह या घरों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है. कई अहमदी अपनी पहचान छुपाकर रहते हैं और शिक्षा, नौकरी या सोशल मीडिया में डर के साथ जीवन बिताते हैं. पाकिस्तान के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अब्दुस सलाम भी अहमदिया समुदाय से थे, लेकिन उनके इस सेक्ट का होने की वजह से देश में उतना सम्मान नहीं मिला, जितने के वह हकदार थे. अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र, Amnesty International और Human Rights Watch ने पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना की है. कई अहमदी परिवार शरणार्थी बनकर यूरोप, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में बसे हैं.

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