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लहू से लिखा हूल: पहली बार प्रभात खबर की पहल पर इतिहासकारों ने जोड़े हूल के बिखरे हिस्से

Hul Diwas Special: बरहेट के छोटे-से गांव भोगनाडीह की तरफ चारों दिशाओं से लोग चले आ रहे थे. किसी के कंधे पर तीर-धनुष था, किसी के हाथ में फरसा, तो किसी की कमर से कुल्हाड़ी बंधी थी. हजारों कदमों की धूल हवा में उड़ रही थी. जंगल के रास्तों पर नगाड़ों की धीमी थाप सुनाई दे रही थी, पर आज का दिन उत्सव का उल्लास नहीं, बल्कि भीतर सुलगते गुस्से की गूंज थी. कुछ ही देर में गांव के मैदान में 10 हजार से अधिक संताल जमा हो गये. बूढ़े, जवान, महिलाएं, मांझी, परगनैत- हर किसी के चेहरे पर एक ही सवाल था- अब और कब तक?

मैदान के बीचोंबीच सिदो और कान्हू खड़े थे. उनके साथ चांद, भैरव, फूलो और झानो भी थे. सिदो ने चारों ओर नजर दौड़ायी. जहां तक नजर जाती, अपने ही लोग दिखायी दे रहे थे, जिनके चेहरों पर वर्षों का अपमान, भूख और अन्याय साफ झलक रही थी. सन्नाटे के बीच सिदो ने ऊंची आवाज में कहा- ‘नितोक् दो़ खाजना बाबोन एमा आर ओकोयाक् गोबोलरे हो़ं बाबोन ताहेना. तेहेञ खोन माहाजोन, दोरोगा आर पोण्ड हारताकोआक् हुकुम बाङ चालाक्आ. आबोआक् दिसोमरे आबोवाक् राज होयोक्आ. नोआ मुंहिन खोन बाञ्चावोक् ला़गित् ते हूलगे आबोआक् मुचात् सापाप् काना. जिवेदोक् चाहेबोन गुजुक्, लाड़हाईकातेगे दिसोमबोन रूखिया दाड़ेयाक्आ. तेहेञ खोनगे आक् सार बोझायपे, कापी तारवाड़े गासाव लासेरपे आर हूल ला़गित् पाठे केटेजोक् पे. ओनकोआक् नास होयोक्आ आर आबोआक् जीत होयोक्आ.’

सिदो के भाषण का हिंदी रूपांतरण

(अब हम लगान नहीं देंगे और किसी के गुलाम नहीं बनेंगे. आज महाजन, दारोगा और गोरी चमड़ी का हुक्म नहीं चलेगा. हमारे देश में हमारा राज होगा. इस मुश्किल परिस्थिति से बचने के लिए हूल ही हमारा आखिरी हथियार है. हम जियें या मरें, लड़कर ही अपनी आजादी को बचा पायेंगे. आज से तीर-धनुष तैयार करो, तलवार-फरसा तेज करो और हूल के लिए कमर कस लो. उनका नाश होगा और हमारी जीत होगी.) इसके बाद भीड़ में जैसे बिजली दौड़ गयी. हजारों धनुष एक साथ आसमान की ओर उठे. आवाज गूंजी… हूल…! हूल…! हूल…!

हूंकार से कांपी राजमहल की पहाड़ियां

राजमहल की पहाड़ियां इस हुंकार से कांप उठीं, लेकिन यह गुस्सा एक दिन में नहीं पैदा हुआ था. यह उन जख्मों की आग थी, जो वर्षों से भीतर सुलग रही थी. सिदो ने सभा में उपस्थित लोगों से कहा- आज बोलो. जो तुम्हारे साथ हुआ, सबके सामने कहो. सबसे पहले एक बूढ़ा किसान उठा. उसकी आंखें धंसी हुई थीं. बूढ़े किसान ने कहा- मैंने जंगल काटा… खेत तैयार किये… पांच साल तक जी तोड़ मेहनत की. अब महाजन कहता है- यह जमीन उसकी है. यह सुनकर भीड़ में सन्नाटा छा गया. एक दूसरी आवाज आयी- ‘मेरी पूरी फसल ले गया… फिर भी कहता है- कर्ज बाकी है.’ तीसरा आदमी उठा, गुस्से में कहा- ‘दारोगा कहता है- जेल भेज दूंगा.’ फिर एक महिला खड़ी हुई. उसकी आवाज कांप रही थी. ‘हमारे घर में घुस आये थे… मुर्गियां उठा ले गये… विरोध किया तो कहा- चुप रहो, नहीं तो तुम्हारे आदमी को जेल भेज देंगे.’ अब हर तरफ से आवाजें आने लगीं. हमारी जमीन…, हमारा अनाज…, हमारी बेटियां…, हमारी इज्जत… ऐसा लग रहा था, मानो वर्षों से दबा हुआ दर्द आज पहली बार शब्द बनकर बाहर निकल रहा हो. सिदो सब सुनते रहे. फिर धीरे से बोले-याद करो… यह सब कब शुरू हुआ था? और यहीं से मानो पूरा मैदान वर्षों पहले अतीत में लौट गया…

संतालों ने उजाड़ जमीन को किया आबाद

राजमहल की पहाड़ियों में घने जंगल थे, जिसमें मालेर जनजाति के लोग रहते थे. उनका जीवन बेहद ही साधारण था और जंगल के उत्पादों के भरोसे उनकी जिंदगी चलती थी. फिर समय बदला. 1765 में इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली. उस समय वर्तमान झारखंड का अधिकांश भाग बंगाल प्रांत के ही अधीन था, इसलिए यहां भी राजस्व वसूली का अधिकार कंपनी के हाथों में आ गया. कंपनी का उद्देश्य साफ था- ज्यादा से ज्यादा राजस्व कमाना. पर इन पहाड़ियों में रहने वाले मालेरों (माल पहाड़िया) से कर वसूलना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वे स्थायी खेती नहीं करते थे.

संताल विद्रोहियों की तालश करती अंग्रेजो की सेना | तस्वीर वॉल्टर शेरवित द्वारा बनायी गयी है

उधर, बंगाल की धरती पर हालात तेजी से बदल रहे थे. 1772 में तत्कालीन गर्वनर वॉरेन हेस्टिंग्स ने इजारेदारी प्रथा लागू की. एक गांव का किसान अपने बेटे से कह रहा था- ‘अब जमीन हमारी नहीं रही बेटा… जो सबसे ज्यादा बोली लगायेगा, वही हमारा मालिक होगा.’ बेटे ने पूछा- ‘फिर हम क्या करेंगे?’ बूढ़े ने आह भरते हुए कहा- ‘कर देंगे… नहीं दिया तो खेत चला जायेगा.’ इजारेदारों ने किसानों से मनमाना कर वसूलना शुरू कर दिया. फिर 1793 में गर्वनर लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया. अब जमींदार भूमि के स्वामी बना दिये गये. इससे किसानों पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया, लेकिन इससे पहले ही बंगाल एक भयानक त्रासदी झेल चुका था. वो था 1770 का अकाल. धरती फट चुकी थी. खेत सूख चुके थे. गांवों में चूल्हे बुझ गये थे. लाखों लोग मर गये. खेत वीरान हो गये. इन विपरीत हालातों में संतालों ने नयी जमीन की तलाश शुरू की. वे धालभूम, मानभूम, हजारीबाग, मिदनापुर, बांकुड़ा, पलामू, छोटानागपुर, सिंहभूम और उड़ीसा से धीरे-धीरे राजमहल की पहाड़ियों की ओर आने लगे. यहां घने जंगल थे, खाली जमीन थी और मेहनत करने की आजादी थी. अंग्रेज अधिकारियों ने भी उन्हें बसाने में खूब मदद की, क्योंकि उन्हें उजाड़ जमीन आबाद कर राजस्व बढ़ाना था. पहले पांच वर्षों तक कोई लगान नहीं लिया गया, फिर प्रति बीघा चार आने की दर से कर लगा दिया गया. संतालों ने जंगल काटे, पत्थर हटाये, दलदल जमीन सुखाये, और इस तरह धरती को उपजाऊ बनाया. धीरे-धीरे खेत लहलहाने लगे. गांव बसने लगे. मांदर की थाप फिर गूंजने लगी. यहां जीवन जीने के सारे साधन मौजूद थे. इसी खुशहाली के बीच भोगनाडीह के मुर्मू परिवार में सिदो मुर्मू का जन्म होता है. पांच-पांच के अंतराल पर छोटे भाइयों कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू भी जन्म लेते हैं. छोटी बहनें, फूल मुर्मू और झानो मुर्मू भी 1830-1832 के आसपास जन्म लेती हैं. पिता चुनी मांझी किसान थे. दामिन-इ-कोह की खुशहाली के बीच हूल आंदोलन के नायकों का पालन-पोषण हुआ. इधर, संतालों को लग रहा था कि अब उनका जीवन बदल गया है. मगर उन्हें क्या पता था कि असली परेशानी अभी उनके दरवाजे तक पहुंची ही नहीं थी.

जब शोषण ने विद्रोह को दिया जन्म

भोगनाडीह के मैदान में सन्नाटा पसरा था. सिदो की आंखें भीड़ पर टिकी थीं. हजारों लोग उनकी हर बात सुन रहे थे. उन्होंने धीरे से कहा- ‘तुम सबने इस धरती को अपने हाथों से बनाया है. जंगल काटे, खेत बनाये, गांव बसाये… लेकिन बताओ, आज तुम्हारे खेतों का मालिक कौन है?’ भीड़ से कई आवाजें एक साथ उठीं- महाजन! जमींदार! अंग्रेज! सिदो ने सिर झुका लिया. यही तो सबसे बड़ा अन्याय था. जिस जमीन को संतालों ने अपने पसीने से सींचा, उसी पर अब उनका अधिकार छिनता जा रहा था.

दामिन-इ-कोह…जहां बस गये 427 गांव

1832-33 में अंग्रेज अधिकारियों ने संतालों द्वारा बसाये गये पूरे इलाके का सीमांकन किया और नाम रखा ‘दामिन-इ-कोह¹’. यह फारसी शब्द है, जिसका अर्थ ‘पहाड़ियों की तलहटी’ या ‘पहाड़ों का आंचल.’ यह सीमांकित भूमि विशेष रूप से संतालों के लिए थी. कुछ ही वर्षों में यहां लगभग 427 संताल गांव आबाद हो गये. प्रशासन और राजस्व वसूली के लिए अधिकारी नियुक्त हुए. यहीं से शोषण का नया अध्याय शुरू हुआ. गांव में बाहरी व्यापारी पहुंचने लगे. वे अपने साथ नमक, कपड़ा और लोहे के औजार लेकर आये थे. एक महाजन ने मुस्कराते हुए बोला- ‘भाई, तुम्हें जब भी जरूरत पड़े, हमारे पास आ जाना. पैसे नहीं हैं, तो कोई बात नहीं… उधार ले जाना.’ भोले-भाले संताल उनकी बातें सुनकर खुश हुए. वे उन्हें अपना मददगार समझ बैठे. उन्हें तनिक भी आभास नहीं था कि यही मुस्कान एक दिन उनकी गुलामी की जंजीर बन जायेगी. धीरे-धीरे वे व्यापारी गांवों के किनारे बस गये और छोटे दुकानदार महाजन बन गये. और फिर शुरू हुआ-महाजनी शोषण.

मुट्ठी भर कर्ज… और पूरी पीढ़ी गुलाम

एक किसान अपनी पत्नी से बोला-इस बार बीज नहीं है, बुआई कैसे होगी? पति-पत्नी ने चुपचाप बच्चों की ओर देखा. सोचा खेती नहीं होगी, तो बच्चों का पेट कैसे पालेंगे? आखिर किसान मदद के लिए महाजन के दरवाजे पर पहुंचा. महाजन ने हिसाब की बही खोली. पूछा-कितना चाहिए? किसान बोला-बस… इतना कि खेती हो जाये. महाजन मुस्कराते हुए बोला- ले जाओ… जब फसल होगी, लौटा देना. जब महीनों की मेहनत के बाद फसल तैयार हो गयी, तो महाजन खेत पर पहुंचा और किसान से कहा- सब अनाज हमारे गोदाम में रखवा दो. पहले कर्ज चुकाओ. किसान ने पूरी फसल दे दी. फिर पूछा- अब हिसाब बराबर हो गया? महाजन ने बही पलटी. फिर हंसा. अरे नहीं… यह तो सिर्फ ब्याज गया है. असली रकम अभी बाकी है. महाजनों के इस शोषण को नाम दिया गया-कमीयौती प्रथा. महाजन 300 से 500 प्रतिशत तक सूद वसूलते थे. किसान पूरी जिंदगी मेहनत करता, लेकिन कर्ज कभी खत्म नहीं होता. यदि वह मर जाता, तब भी वह कर्ज उसके बेटे और फिर पोते पर चढ़ जाता. जिनके पास गिरवी रखने के लिए जमीन नहीं होती, उन्हें महाजन जीवनभर अपने यहां कमिया या हरवाहा बनाकर काम कराते. इस तरह एक कर्ज पूरी पीढ़ी को गुलाम बनाकर रख देती.

यह दृश्य 1855–1856 के संताल विद्रोह के बाद का है. मूल रूप से द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज (अगस्त, 1856) में प्रकाशित अंग्रेज लेखक व चित्रकार वॉल्टर शेरविल द्वारा बनायी इस चित्र में दिखाया गया है कि अंग्रेजों का रक्षा दल 7वीं नेटिव इन्फैंट्री के शिविर से संताल बंदियों को जंगीपुर ले जा रहा है.

जब पत्थर बने शोषण के बटखरे

महाजनों के पास शोषण की कई तरकीबें थीं. एक दिन गांव के कुछ लोग एक महाजन के पास अपना धान बेचने पहुंचे. एक संताल युवक ने देखा- महाजन ने रास्ते से एक बड़ा-सा पत्थर उठाया. उस पर सिंदूर लगाया. उसे तराजू पर रख दिया. युवक ने पूछा- यह कौन-सा बाट है? महाजन हंस पड़ा. बोला- सरकार का बाट है. युवक ने विरोध किया, तो महाजन बोला- बहुत बोलोगे तो दारोगा के पास भेज दूंगा. टैक्स नहीं देना चाहते क्या? भोले-भाले लोग चुप हो जाते. बाद में कैप्टन शेरविल (1851) ने भी लिखा कि महाजन रास्ते से पत्थर उठाकर उस पर सिंदूर लगा देते थे और उसी से संतालों की फसल तौल लेते थे.

लगान… जिसने किसानों की कमर तोड़ दी

उधर, अंग्रेज सरकार का एक ही उद्देश्य था- ज्यादा से ज्यादा राजस्व. एक अंग्रेज अधिकारी अपने मुंशी से कह रहा था- इस साल वसूली कम नहीं होनी चाहिए. लेकिन साहब… लोग परेशान हैं. हमें उनकी परेशानी से क्या लेना-देना? फिर नये कर लागू कर दिये गये. प्रत्येक हल पर भैंस के लिए 2 रुपये, बैल के लिए 1 आना और गाय के लिए आधा आना कर तय कर दिया गया. गांव तक पहुंचते-पहुंचते कर की रकम दोगुनी हो जाती. एक किसान ने मालगुजार से पूछा- सरकार ने इतना लगान कब तय किया? मालगुजार हंसा, ‘सरकार का नाम मत लो… जितना कहा है, उतना दो.’ विरोध करने वालों को धमकी मिलती-जेल भेज देंगे. धीरे-धीरे हालत यह हो गयी कि संताल किसानों की उपज का लगभग आधा हिस्सा केवल लगान चुकाने में चला जाता था…

07.07.1855 : संतालों की चेतावनी को अंग्रेजों ने कमजोरी समझा और हूल ने बता दी अपनी ताकत…

घी थाना. दारोगा महेश लाल दत्त अपनी चौकी पर बैठा था. महाजन उसके सामने रुपयों की थैली रख रहा था. दारोगा जी… गांव वाले बहुत सवाल पूछने लगे हैं. महेश लाल मुस्कराया. चिंता मत करो. जो बोलेगा, उसे चुप करा देंगे. और सचमुच वही हुआ. जो किसान विरोध करते, उन्हें झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता. जो लगान नहीं दे पाते, उन्हें पकड़कर कचहरी ले जाया जाता. वहां जमींदार ऊंचे आसन पर बैठे होते.

पूछते-जुर्माना भरोगे? गरीब संताल कहते- मालिक… पैसे नहीं हैं. जमींदार कहते-तो जमीन लिख दो. इस तरह महेश लाल दत्त, नायब सजावल और सुल्तानाबाद व अंबर एस्टेट के जमींदारों की मिलीभगत ने दामिन-इ-कोह को भय के साये में धकेल दिया था. महाजन कंपनी द्वारा तय दर से कहीं अधिक लगान वसूलते थे, विरोध करने वालों को लठैत पकड़कर कचहरी ले जाते और जुर्माना नहीं देने पर उनकी जमीनें छीन ली जाती थीं.

महिलाओं की इज्जत भी सुरक्षित नहीं रही

1854 में दामिन-इ-कोह में रेलवे लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ. बाहर से ठेकेदार और मजदूर आये. एक शाम गांव में अफरा-तफरी मच गयी. एक संताल महिला रोती हुई दौड़ी. वे लोग घर में घुस आये… किसी ने पूछा- क्या हुआ? महिला बोली- ठेकेदार के लोग मुर्गियां उठा ले गये… विरोध किया तो धक्का देकर गिरा दिया… दूसरी महिला बोली- उन्होंने मेरे साथ छेड़छाड़ की. जब गांव के लोगों ने इसका विरोध किया तो ठेकेदार के लोगों ने उन्हें पीट दिया. इस तरह रेलवे ठेकेदारों, महाजनों और उनके लोगों के अत्याचार बढ़ते गये. संतालों ने कई बार अंग्रेज अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन मिला. अब गांवों में एक ही सवाल गूंजने लगा था- अगर सरकार भी हमारी नहीं सुनती… तो फिर न्याय कौन देगा? एक बुजुर्ग मांझी ने धीरे से कहा- अब न्याय मांगने से नहीं मिलेगा… छीनना पड़ेगा. यहीं से दामिन-इ-कोह के जंगलों में एक नया शब्द हवा की तरह फैलने लगा- ‘हूल…!’ लेकिन उस हूल को दिशा देने वाला कोई चाहिए था. और वह नेतृत्व जल्द ही भोगनाडीह के चार भाइयों और उनकी दो बहनों के हाथों में आनेवाला था…

भोगनाडीह का मैदान अब भी लोगों से भरा था. 30 जून, 1855 की वह सभा समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि एक निर्णय में बदल चुकी थी. सिदो ने चारों ओर देखा. हजारों आंखों में अब भय नहीं था. वर्षों तक अपमान सहने वाले लोग पहली बार अपने भीतर साहस महसूस कर रहे थे. लेकिन सिदो जानते थे कि इतिहास गवाह रहेगा- उन्होंने बिना चेतावनी के हथियार नहीं उठाये. उन्होंने कहा- हम पहले न्याय मांगेंगे. अगर न्याय नहीं मिला… तभी हूल होगा. सभा में बैठे मांझी, परगनैत और गांवों के बुजुर्ग सहमत हुए. उसी मैदान में शिकायत-पत्र लिखे जाने लगे. किसी में महाजनों की लूट का जिक्र था. किसी में जमींदारों की मनमानी. कहीं दारोगा के अत्याचार का विवरण था. कहीं संताल महिलाओं के साथ हुए अपमान का. पत्र तैयार हुए. सिदो ने उन्हें अलग-अलग लोगों को सौंपते हुए कहा- इन्हें थानों में ले जाओ… जमींदारों के पास ले जाओ… अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंचाओ. उनसे कहो- 15 दिन के भीतर हमारी समस्याओं का समाधान करो. अगर नहीं किया… तो फिर हम अपना रास्ता खुद चुनेंगे. कुछ लोगों को उन्होंने कलकत्ता जाकर गवर्नर जनरल तक शिकायत पहुंचाने का भी आदेश दिया. इसके साथ ही पूरे दामिन-इ-कोह में साल के पत्तों के माध्यम से संदेश भेजा गया. जिसे जहां साल का पत्ता मिलता, वह समझ जाता कि समय आ गया है, तैयार रहो.

दूसरी ओर… अंग्रेजी हुकूमत बेचैन थी

भोगनाडीह की सभा की खबर जंगलों से निकलकर महाजनों तक पहुंची. बरहेट का एक महाजन घबराया हुआ दिघी थाने पहुंचा. कहा- दारोगा जी… इस बार मामला अलग है. हजारों लोग जमा हुए थे. महेश लाल दत्त ने हंसते हुए कहा- अरे… वे संताल हैं. दो डंडे पड़ेंगे तो सब घर भाग जायेंगे. दूसरा महाजन बोला- लेकिन इस बार वे खुलकर कह रहे हैं कि लगान नहीं देंगे. महेश लाल दत्त ने मेज पर हाथ पटका- इस इलाके में वही होगा जो कंपनी चाहेगी. उसकी आवाज में अहंकार था. उसे विश्वास था कि बंदूक के सामने तीर-धनुष टिक नहीं पायेंगे. उधर, चिंगारी भड़क चुकी थी, गांवों में लोग अब पहले जैसे नहीं रहे थे. एक रात कुछ युवा चुपचाप एक महाजन के गोदाम तक पहुंचे. उन्होंने सोना-चांदी नहीं उठाया. केवल अनाज लेकर लौट आये. एक बुजुर्ग ने पूछा- और कुछ नहीं मिला? युवक बोला- हम चोर नहीं हैं. हम अपना पेट भरने का अनाज वापस लाये हैं. दरअसल यह साधारण चोरी नहीं थी. यह उस अन्याय के विरुद्ध पहला प्रतिरोध था, जो वर्षों से उनके हिस्से का अन्न छीन रहा था.

सिदो ने दारोगा का सिर धड़ से अलग कर दिया

30 जून की सभा के बाद कुछ महाजनों की हत्या की खबर फैल चुकी थी. महेश लाल दत्त बौखला गया. सात जुलाई, 1855 की सुबह वह सिपाहियों के साथ निकला. उसका इरादा साफ था, सिदो और कान्हू को गिरफ्तार करना. गांव के बाहर हजारों संताल पहले से मौजूद थे. महेश लाल घोड़े से उतरा. उसने ऊंची आवाज में कहा- रास्ता छोड़ दो. सरकार के खिलाफ खड़े होनेवालों को गिरफ्तार किया जायेगा. भीड़ शांत रही. फिर उसने आदेश दिया- सिपाहियों! सिदो-कान्हू को पकड़ लो. इतना सुनते ही माहौल बदल गया. सिदो आगे बढ़े. उन्होंने शांत स्वर में कहा- हमने पहले न्याय मांगा था. तुमने जवाब में हथकड़ी भेजी है? महेश लाल चिल्लाया- बहुत बोल लिये. गिरफ्तार करो इन्हें! बस… यही वह क्षण था, जब वर्षों का दबा हुआ आक्रोश विस्फोट बन गया. एक संताल युवक गरजा- आज नहीं… दूसरे ने तीर चढ़ा लिया. तीसरे ने फरसा उठा लिया. कुछ ही पलों में भीड़ ने महेश लाल दत्त और उसके सिपाहियों को चारों ओर से घेर लिया. महेश लाल ने बंदूक उठाने की कोशिश की. लेकिन देर हो चुकी थी. सिदो का फरसा चमका और अगले ही क्षण… क्रूर दारोगा महेश लाल दत्त का सिर धड़ से अलग हो चुका था. उसके साथ आये सिपाही भी मारे गये. यही वह क्षण था, जब हूल का औपचारिक शंखनाद हुआ.

जंगल से उठी आग पूरे दामिन में फैल गयी

महेश लाल की मौत की खबर बिजली की तरह फैल गयी. एक गांव से दूसरे गांव और दूसरे से तीसरे. हर जगह एक ही आवाज सुनाई देने लगी- हूल शुरू हो गया! जो संताल कलकत्ता शिकायत लेकर जा रहे थे, उन्होंने रास्ते से ही लौटने का फैसला कर लिया. एक युवक बोला- अब फरियाद नहीं… अब लड़ाई होगी. वे भी विद्रोह में शामिल हो गये. जहां-जहां महाजन मिले, उन्हें घेरा गया. उनकी बहियों को आग के हवाले कर दिया गया. जिन कागजों में पीढ़ियों की गुलामी लिखी थी, वे धू-धू कर जलने लगे. एक महाजन जान बचाने के लिए गिड़गिड़ाया- मैंने क्या किया है? एक बूढ़े संताल ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा- याद है… जब मेरा बेटा भूखा था और तुमने कहा था- पहले ब्याज चुकाओ. महाजन चुप हो गया. लेकिन एक बात सबको चौंका रही थी. विद्रोही उग्र थे. वे महाजनों, जमींदारों और अंग्रेज अधिकारियों पर हमला कर रहे थे. लेकिन…जब किसी घर में महिलाएं, बच्चे या बूढ़े मिलते, तो संताल पीछे हट जाते. एक युवक ने फरसा नीचे रख दिया. साथी ने पूछा- क्यों छोड़ दिया? उसने जवाब दिया- हम अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं… निर्दोषों के खिलाफ नहीं. यही कारण था कि विद्रोह का निशाना केवल वे लोग बने, जो संतालों के शोषण और अत्याचार के प्रतीक थे. महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया गया.

अंग्रेजी सत्ता पहली बार डर गयी

भागलपुर में खबर पहुंची. कमिश्नर जीएफ ब्राउन के सामने एक अधिकारी हांफता हुआ पहुंचा. बोला- सर… दारोगा महेश लाल मारा गया है. ब्राउन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ. क्या? अधिकारी बोलो- सिर्फ वही नहीं… कई महाजन भी मारे गये हैं. रेलवे का काम रुक गया है. डाक व्यवस्था भी ठप हो रही है. कमरे में सन्नाटा छा गया. कुछ देर बाद ब्राउन ने आदेश दिया- मेजर बरोज को तुरंत सेना लेकर राजमहल भेजो. 10 जुलाई की शाम मेजर बरोज 160 सैनिकों के साथ राजमहल की ओर रवाना हुआ. अंग्रेजों को अब एहसास हो चुका था कि यह कोई स्थानीय झगड़ा नहीं, बल्कि एक व्यापक जनविद्रोह है. लेकिन उन्हें अभी यह नहीं मालूम था कि सामने केवल तीर-धनुष लिए कुछ आदिवासी नहीं खड़े थे- सामने खड़ा था… वर्षों के अपमान का विस्फोट. और कुछ ही दिनों बाद, 16 जुलाई, 1855 को यही विस्फोट अंग्रेजी सेना को पहली बड़ी हार देनेवाला था.

जब हूल ने अंग्रेजी सत्ता को झुका दिया

राजमहल की पहाड़ियों में अब नगाड़े की थाप नहीं, युद्ध की गर्जना सुनाई दे रही थी. हर गांव से लोग निकल रहे थे. तीर-धनुष कंधों पर थे. फरसे चमक रहे थे. साल के पत्तों पर लिखा संदेश अब पूरे दामिन-इ-कोह में हूल की आग फैल चुकी थी. महेश लाल दत्त की हत्या के बाद अंग्रेजी शासन समझ चुका था कि यह कोई साधारण बगावत नहीं है. इसलिए भागलपुर से मेजर बरोज 160 सैनिकों के साथ राजमहल की ओर बढ़ चुका था. अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि प्रशिक्षित सेना के सामने संताल अधिक देर तक टिक नहीं पायेंगे. लेकिन 16 जुलाई, 1855 की सुबह उनका यह भ्रम टूट गया.

तीर-धनुष ने बंदूकों को चुनौती दी

घने जंगलों के बीच अंग्रेजी टुकड़ी आगे बढ़ रही थी. सैनिक सतर्क थे. अचानक पेड़ों के पीछे से नगाड़े की आवाज गूंजी. फिर एक साथ सैकड़ों तीर हवा में तैर उठे. अंग्रेज सैनिक संभल भी नहीं पाये थे कि चारों दिशाओं से संताल उन पर टूट पड़े. एक अंग्रेज अफसर चिल्लाया- फायर… फायर…! बंदूकें गरजीं. लेकिन सामनेवाले पीछे नहीं हटे. एक युवक के सीने में गोली लगी. वह गिरते-गिरते बोला- आगे बढ़ो… धरती बचानी है… उसके पीछे खड़े दस और युवक आगे बढ़ गये. घंटों संघर्ष चला. जब धूल बैठी… तो मैदान पर अंग्रेज सैनिकों की लाशें बिखरी थीं. कई सैनिक भाग चुके थे. 16 जुलाई, 1855 को मेजर बरोज की टुकड़ी को विद्रोहियों ने पराजित कर दिया. यह जीत केवल सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी सत्ता के उस मिथक को तोड़ने वाली घटना थी कि बंदूक के सामने तीर-धनुष कुछ नहीं कर सकते.

दामिन में पहली बार अंग्रेज भाग रहे थे

यह समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया. महाजन अपने गोदाम छोड़कर भागने लगे. जमींदार रातों-रात गंगा पार करने लगे. एक महाजन अपने नौकर से बोला- जल्दी… जितना सामान उठा सकते हो, उठा लो. नौकर ने पूछा- मालिक, बाकी? महाजन कांपती आवाज में बोला- जान बची तो सब फिर खरीद लेंगे. लेकिन इस बार उनके सामने वही लोग खड़े थे, जिन्हें वे वर्षों तक असहाय समझते रहे थे.

पाकुड़ पर हूल का परचम

कुछ ही दिनों में विद्रोहियों ने पाकुड़ पर भी कब्जा कर लिया. पाकुड़ की जमींदार रानी क्षेमसुंदरी और धनी महाजन दीनदयाल राय वहां से भाग निकले. बाद में जब विद्रोही आगे बढ़ गये, तो दीनदयाल राय लौट आया. उसने स्वयं को पाकुड़ का जमींदार घोषित कर दिया. फिर वही अत्याचार… फिर वही लूट… फिर गांवों में महिलाओं और बच्चों को डराना. एक सुबह वह तालाब पर स्नान करने गया. कुछ संताल पहले से वहां छिपे थे. दीनदयाल ने उन्हें देखा. घबराकर बोला- मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? एक वृद्ध संताल आगे बढ़ा. उसकी आंखों में वर्षों का दर्द था. तुझे सचमुच याद नहीं? कितने खेत छीन लिये थे? कितने बच्चों को भूखा रखा था? दीनदयाल के पास कोई उत्तर नहीं था. कुछ ही क्षण बाद उसकी हत्या कर दी गयी. यह घटना उस आक्रोश का प्रतीक बन गयी, जो वर्षों से महाजनी शोषण के खिलाफ संतालों के भीतर जमा था.

यह केवल संतालों का विद्रोह नहीं था

हूल अब एक व्यापक जनांदोलन बन चुका था. गांव का लोहार पूरी रात तीरों की नोक तेज कर रहा था. ग्वाला अंग्रेजी सेना की गतिविधियों की खबर पहुंचा रहा था. कुम्हार पानी और बर्तन जुटा रहा था. बाउरी और धोबी भी साथ खड़े थे. एक लोहार ने हथौड़ा चलाते हुए कहा- आज मैं हल नहीं बना रहा… आज आजादी की धार गढ़ रहा हूं. 28 जुलाई, 1855 को भागलपुर कमिश्नर ने बंगाल सरकार को लिखे पत्र में भी स्वीकार किया कि लोहार, ग्वाला, तेली और अन्य समुदायों ने विद्रोहियों की खुलकर मदद की. यह हूल की सबसे बड़ी ताकत थी- यह केवल एक जनजाति का संघर्ष नहीं रह गया था.

अंग्रेजों ने बदला युद्ध का तरीका

अब अंग्रेज समझ चुके थे कि साधारण सैन्य कार्रवाई से हूल नहीं दबेगा. नयी-नयी सैन्य टुकड़ियां राजमहल और भागलपुर पहुंचने लगीं. बंदूकें बढ़ीं. तोपें आयीं. जनरल लॉयड को व्यापक सैन्य अधिकारों के साथ भेजा गया. इसके बाद अंग्रेजों ने गांवों को निशाना बनाना शुरू किया. एक गांव… फिर दूसरा… फिर तीसरा… सैकड़ों गांवों में आग लगा दी गयी. बच्चे रो रहे थे. महिलाएं जलते घरों से अनाज बचाने की कोशिश कर रही थीं. बूढ़े राख होते अपने खेतों को देख रहे थे. तीर-धनुष अब भी चल रहे थे… लेकिन बंदूकों और संगठित सेना के सामने विद्रोही धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे.

जब अपने ही विश्वासघाती बन गये

अंग्रेजों ने इनाम घोषित कर दिए. कहा गया- जो सिदो-कान्हू को पकड़वायेगा, उसे इनाम मिलेगा. युद्ध के बीच लालच भी जन्म ले चुका था. आखिरकार 19 अगस्त, 1855 को कुछ संताल ही इनाम के लालच में सिदो को पकड़वाने पर तैयार हो गये. मुखबिरों की मदद से सिदो को गिरफ्तार कर लिया गया. उनकी गिरफ्तारी विद्रोहियों के लिए बहुत बड़ा आघात थी. कुछ समय के लिए आंदोलन धीमा पड़ा, लेकिन सितंबर आते-आते कान्हू के नेतृत्व में संघर्ष फिर शुरू हो गया. विद्रोहियों ने उन मुखबिरों को भी दंडित किया, जिन्होंने सिदो को पकड़वाया था.

मार्शल लॉ और रक्तरंजित अंत

जब विद्रोह थमता नहीं दिखा, तो 10 नवंबर, 1855 को बंगाल सरकार ने मार्शल लॉ लागू कर दिया. अब सेना को खुली छूट थी. भोगनाडीह जला दिया गया. गांव राख होते गये. महिलाओं… बूढ़ों… बच्चों… किसी पर दया नहीं की गयी. फिर आया- 5 दिसंबर, 1855. सिदो को फांसी दे दी गयी. कान्हू भी बाद में विश्वासघात के कारण अंग्रेजों के हाथ लग गये. हूल का नेतृत्व टूट चुका था. अंततः 3 जनवरी, 1856 को मार्शल लॉ हटा लिया गया, हालांकि इसके बाद भी कई क्षेत्रों में प्रतिरोध की घटनाएं जारी रहीं.

क्या सचमुच हूल हार गया था?

युद्ध भले दबा दिया गया, लेकिन उसने अंग्रेजी शासन को भीतर तक हिला दिया था. सरकार समझ चुकी थी कि अगर प्रशासन नहीं बदला, तो हूल फिर उठेगा. यही कारण था कि बाद में संताल परगना को अलग जिला बनाया गया. दुमका, गोड्डा, देवघर और राजमहल इसके उपखंड बने. प्रशासन को संतालों के करीब लाने का प्रयास किया गया. अधिनियम-37 लागू कर संतालों की पारंपरिक मांझी व्यवस्था को मान्यता दी गयी. ‘रूल्स ऑफ यूल’ के तहत संतालों को मौखिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार मिला. महाजनों की मनमानी पर निगरानी बढ़ी और आगे चलकर संताल परगना सेटलमेंट रेगुलेशन, 1872 के माध्यम से भूमि सुरक्षा की दिशा में भी कदम उठाये गये थे. ये परिवर्तन सीधे-सीधे हूल के प्रभाव का परिणाम थे.

30 जून, 1855 को भोगनाडीह में उठी वह आवाज केवल लगान के खिलाफ नहीं थी. वह सम्मान के लिए थी, अपनी जमीन के लिए थी और अपनी अस्मिता के लिए थी. हूल का इतिहास हमें बताता है कि जब शोषण व्यवस्था बन जाये, न्याय बिकने लगे और सत्ता अत्याचार का हथियार बन जाये, तब प्रतिरोध केवल विकल्प नहीं रहता, वह अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है. सिदो, कान्हू, चांद, भैरव, फूलो और झानो हारकर भी इतिहास में विजेता बने, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को यह एहसास करा दिया कि किसी समुदाय की मेहनत, उसकी जमीन और उसकी गरिमा को हमेशा के लिए गुलाम नहीं बनाया जा सकता. हूल दबा दिया गया था, लेकिन उसकी गूंज आज भी राजमहल की पहाड़ियों में सुनाई देती है.

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