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धैर्य से धोबी पछाड़,बची-खुची मत गंवाओ दीदी,क्या रूखसत हुए राहुल ?विजय जुलूस पर रोक; वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी…

 

पश्चिम बंगाल में पताका फहराने के लिये मोदी-शाह ने बेहसाब धैर्य दिखाया। बरसों से भाजपा के समर्थकों के अलावा भाजपा को वोट देने वालों की भी टीएमसी द्वारा दुर्गति की जाती रही। बिना डर, बिना संकोच और बिना किसी शर्म के। न मानवता, न कानून बस मनमानी और क्रूरता।

आम आदमी का खून बहाना। चुनाव आयोग की बात नहीं मानना। सीबीआई के अफसरों के काम में रूकावट डालना। ईडी के अफसरों को आॅफिस में बंद कर देना यानि नितान्त राक्षसी कृत्य। ऐसा कोई काम नहीं जिससे उन्हंे इंसान कहा जाए। नितान्त अमानवीय दादागिरी।

*बचते रहे*
*राष्ट्रपति शासन से*

देश मे घारा 356 का प्रयोग करके कुल 132 बार राष्टपति शासन लगाया गया है। जिसमें कांग्रेस ने लगभग 90 बार और भाजपा ने दस बार ये काम किया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार द्वारा की जाती रही हिंसा और अत्याचार का नंगा नाच देखकर सबको ये आशा थी कि वहां केन्द्र सरकार अवश्य की राष्ट्रपति शासन लगा देगी।

 

लेकिन इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि संविधान, नागरिकों के हितों की रक्षा और बेहद धैर्य का परिचय देते हुए भाजपा सरकार ने ऐसा नहीं किया। धैर्य का नया रिकाॅर्ड बनाया।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक*
मोबा. 9522170700*

 

 

 

*देख लो*
*आ गया बाप बचाने*

टीएमसी की दादागिरी का स्तर इतना रहा कि टीएमसी के नेता अभिषेक बैनर्जी ने बेशर्मी से, बेखौफ कहा था कि ‘देखते हैं चार मई के बाद दिल्ली से कौन सा बाप तुम्हें बचाने आता है’।

मजा देखिये कि जिस सीट पर अभिषेक ने ये धमकी दी थी वहां पर टीएमसी हार गयी, भाजपा जीत गयी या ये कहंे कि आम जनता जीत गयी।

*क्योंकि लड़ाई टीएमसी वर्सेस भाजपा नहीं थी लड़ाई टीएमसी वर्सेस आम जनता थी*।
आम जनता यानि वे लोग जिनका टीएमसी में कोई माई-बाप नहीं था। जो सत्ता से प्रताडित थे। जिन्हें सत्ता का जुल्म बिना शिकायत किये सहने को बाध्य होना पड़ता था।

ये धमकाना और मारना, जुल्म करना और लूटना पश्चिम बंगाल की सत्ता की आदत में शामिल था। सत्ता का छोटे से छोटा अंश भी उपरवालों की कठपुतली बनकर काम करता था और उपर वालों की तरह ही…. नीचे वालों को कठपुतली बनाकर काम निकलवाता था। कानून व्यवस्था सरकार की जेब में थी।

*ममता की धमकी*
*ममता के गले में*

मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी स्पष्ट तौर पर धमकी देती थीं कि यहां हम तुम्हारी देखभाल करंेगे बीजेपी और अमित शाह नहीं आऐगा तुमको देखने। उनके कहने से साफ है कि उनके जाने के बार हम तुम्हें रूला देंगे। नतीजा ये निकला कि मौका देखकर जनता ने ममता को ही रूला दिया।

*ममता की धमकी को चुनावी हार में बदलकर उन्हीें के गले में डाल दिया। यानि हरा दिया। भवानीपुर सीट से ममता 15 हजार वोट से सुबेन्दु अधिकारी से हार गयीं। क्योंकि अति का अंत निश्चित होता है।*

*पहले जनता के पास*
*विकल्प नहीं था*

पंद्रह साल ममता बैनर्जी ने निरंकुश निर्लज्ज शासन किया। जनता के पास कोई दमदार विकल्प नहीं था जो उनका सामना कर सके और इनको सुरक्षा दे सके। भाजपा ने न सिर्फ उनकी गुण्डा गर्दी पर अंकुश लगा दिया बल्कि दमदारी से साफ सुथरा शासन देने का भरोसा भी दिलाने में कामयाब रही।

सुरक्षा बलों की कई टुकड़ियां तैनात की अजयपाल शर्मा जैसे जांबाज पुलिस अफसरों को खुली छूट दी।

*अजयपाल ने तो जहांगीर जैसे गुण्डा तत्व के घर के सामने माईक लगाकर घोषणा की कि ‘ये जहांगीर के घरवाले खड़े हैं, उसको बता देना कायदे से। ये बार-बार जो खबर आ रही है कि उसके लोग धमकी दे रहे हैं….. ंतो फिर उसकी अच्छे से खबर लेंगे तो फिर बाद में रोना पछताना मत…’। ऐसी घटनाओं से जनता का हौसला बढ़ा।*

अमित शाह ने बार-बार दौरे, सभाएं कर कार्यकर्ताओं को निडर किया, जनता को निडर किया। जबकि पिछले चुनाव के दम्र्यान और चुनाव के बाद हिंसा में मरे लोगों के कारण एक डर का वातावरण कायम हो गया था।

*खून का घूट पी लिया*
*मगर धैर्य नहीं खोया*

विरोधियों को मारना, आग लगा देना, इज्जत लूट लेना, पैसे लूट लेना यानि कोई ऐसा अपराध/दुव्र्यवहार नहीं था जो टीएमसी वाले आम आदमी और विरोधियों के साथ करते न हों।

इतनी क्रूरता और अंधेर और फिल्मी स्टाईल के जुल्म के बाद तो बंगाल ही नहीं देश भर से राष्ट्रपति शासन लगाने की आवाजें उठने लगी थीं।

*इतनी ‘अति’ के बावजूद मोदीशाह ने बेहिसाब धैर्य दिखाया।*
*बेहिसाब सहनशक्ति चाहिये इतना अत्याचार सहने के लिये। वो भी तब जब आपके हाथ में पावरफुल हथियार हो और आपके पास कानूनी पावर हो*। *मगर एक-एक कदम फूंक-फूुक कर रखा गया और जड़ें मजबूत की गयीं।*

इतनी मजबूत की शायद ही कभी कोई उखाड़ सके, हरा सके। यहां भाजपा अगर कभी कमजोर हुई तो अपनी ही गलती से और अपने ही लोगों द्वारा होगी अन्यथा तो देश में ऐसा कोई दिखता नहीं जो भाजपा को चैलंेज कर सके।

*विजय जुलूस रोक-रोकी हिंसा*
*अब अकड़ मत दिखाओ दीदी*
*क्या राहुल हुए रूखसत*

समझदारी और सभ्यता की बानगी देखिये। इतना बड़ा जीत का सेहरा पहनने से भाजपा कार्यकर्ताओं का मन फूला नहीं समा रहा। वहीं पहले झेले अत्याचारों और हिंसा में मारे गये साथियों को याद कर रो पड़े समर्थक।

जहिर है इससे उनके अंदर एक गुस्सा पनप रहा था। लेकिन ये गुस्सा हिंसा में न बदल जाए इस आशंका से वहां विजय जुलूस पर रोक लगा दी गयी।

ईधर ममता दीदी ने नितान्त नासमझी का परिचय देते हुए इस्तीफा देने से मना कर दिया है। इससे उन्हें क्या हासिल होगा ये समझ से परे है। कानूनी रूप से वे हार चुकी हैं और अगर वे आराम से नहीं हटीं तो बलात् हटाना होगा। स्वाभाविक ही राज्यपाल को ये अधिकार है। अब ये अकड़ नहीं चलेगी दीदी।

बात राहुल की करें तो हंसी और निराशा का भाव पैदा होता है। निराशा इसलिये कि एक बेहद मजबूत पार्टी की उन्होंने बैण्ड बजा दी। तहस-नहस कर दिया। देश में एक मजबूत पार्टी विपक्ष में होती तो सरकार पर अंकुश रहता।

दूसरी बात उनकी अभी बोलती बिल्कुल बंद है। क्या हमेशा की तरह वे विदेश यात्रा पर निकल चुके हैं या फिर विदेश में कोई स्थायी ठिया ढूंढने में लगे हैं। कुछ तो बोलो भैया।
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