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धुरंधर 2, दो आंखें बारा हाथ, खोटे सिक्के, शोले, मोहरा; लोहा लोहे को काटता है, चरित्र निभाया दोहरा, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

 

 

किसी इंसान पर जुल्म किया गया या किसी और कारण से वो हथियार उठा लेता है और फिर अपने कर्माें से सजा पा जाता है। ऐसे में उसका बैकग्राउण्ड देखकर और अपराध करने के कारण की मजबूरी समझ कर उसे सजा से मुक्ति दिलाकर समाज और देश के लिये सार्थक काम करने की कहानी दिखाई गयी है।


धुरंधर जिसकी झलक धुरंधर के पहले अध्याय में दिखाई जा चुकी है। रागी एक साधारण मासूम सा युवक था जिसकी मां बहन पर जुल्म दिखाया गया है।


शायद इसीलिये ‘घायल हूं इसलिये घातक हूं’ का डायलाॅग बोला गया।
जिसने सरकार से इंसाफ मांगा, सरकार से नहीं मिला तो उसने हथियार उठा लिये।
बाद में उन्हें सजा हुई। ऐसे सजायाफता लोगों को निकाल कर उनकी उर्जा को सही दिशा देने और अपराधियों को मिटाने का काम लिया गया।

दो आंखें बारा हाथ

बरसों पहले एक भजन सुना था जो जीवन में लगातार सुनाई पड़ता रहा और आज भी सुनकर भाव विभोर हो जाता है मन। भजन है ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम’
ये भजन फिल्म दो आंखें बारा हाथ का है जिसमे छह खुंखार बदमाशों को जो जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे, जेल से निकालकर सुधारने की कवायद की जाती है। एक सहृदय जेलर उन छह लोगों को सुधारने का जिम्मा लेता है। ये सब लोग एक उजाड़ स्थान पर जाकर खेती करते हैं।
वहां पर अपराधी पहले तो तरह-तरह से जेलर को मारकर भाग जाने का मन बनाते हैं। लेकिन जेलर की सज्जनता के आगे वे हार जाते हैं और उनके अंदर एक अच्छे इंसान का उदय होता है। यहां तक कि बाजार में उन पर अत्याचार करने वाले अन्य तत्वों के साथ भी हिंसक नहीं होते।
इसमें किसी को किसी से बदला लेने की बात नही दिखाई गयी।

खोटे सिक्के, शोले, मोहरा

इसी तरह खोटे सिक्के फिल्म में शहर में पुलिस से घिरते बदमाश टाईप के पांच लोग बचने के लिये एक सुरक्षित गांव में आकर रहने लगते हैं। उस गांव में डाकूओं का आतंक था और डाकूओं से पीड़ित व्यक्ति के घर पर उनको पनाह मिलती है। ऐसे ही एक कहानी शोले में दिखी जिसने सफलता के नये आयाम स्थापित किये। इनमें बुराई से बुराई को मारा गया।


इसी थीम पर एक और फिल्म मोहरा आई थी। इसमें एक सजायाफ्ता मुजरिम सुनील शेट्टी को एक अखबार का मालिक नसीरूद्दीन शाह अपनी रिस्क पर छुड़वा लेता है। सुनील शेट्टी एक अच्छा नागरिक था पर अपने उपर जुल्म करने वालों से बदला लेने के चक्कर में जेल गया था।


अखबार मालिक उसे छुड़वाता है तो नगर के बड़े स्मग्लर और माफियाआंे को एक-एक करके मरवा देता है।
हीरो भी अपना नैतिक कर्तव्य समझकर ये काम करता है। ये बात अलग है कि अखबार मालिक खुद एक माफिया होता है और अपने कांटों को दूर करने के लिये हीरो का सहारा लेता है।
हालांकि इन सब फिल्मों में एक बात काॅमन है कि लोहा लोहे को काटता है।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700

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