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टुच्चे कामों के लिये भी मशक्कत-जनदर्शन झूठ का पुलिंदा, आमजन में निराशा वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी… 

एक वृ़द्ध सज्जन प्रतिदिन सायकल चलाते थे। हर सुबह वे सायकल में कभी सायकल लेकर पैदल चलते दिख जाते थे। पता चला कि उन्हें लकवा हो गया था मगर मनोबल उंचा था लिहाजा लकवे से निकल गये और अब स्वास्थ्य कायम रखने के लिये सायकिल चलाते हैं।

मुझ सहित कई लोगों को उनसे प्रेरणा मिलती थी। रोज सुबह उनसे मुलाकात होती थी, हम लोग काफी श्रद्धा के साथ उन्हें प्रणाम करते थे। फिर एकाएक वे दिखने बंद हो गये।

पता चला कि वे सायकल लेकर पैदल सड़क के किनारे-किनारे चल रहे थे कि राॅंग साईड से आ रही एक ई रिक्शा ने उन्हें जोर से ठोक दिया। वे गिर पड़े और आॅटो वाला भाग गया। आस पास के लोगों ने उन्हें उठाया।

प्रशासन के कारण वृद्ध योद्धा ने

बिस्तर पकड़ लिया

वो बिचारा उंचे मनोबल वाला बीमार वृद्ध सड़क किनारे चलते, पुलिस प्रशासन की रिश्वतखोरी और आॅटो वालों की निर्दय मनमानी का शिकार हो गया और कोमा में चला गया। आज वो बिस्तर पर है। पुलिस क्यों तीन सवारी को, राॅंग साईड वालों को, नो पार्किंग में पार्क करने वालों को रोक-टोक नहीं करती ?

सर्वविदित है कि यातायात नियमों के इन उल्लंघनों से कई बार किसी की जान चली जाती है। ये पुलिस का रोजमर्रा का काम है जो वो नहीं करती।

बात डूमरतराई स्थित काॅलोनियों और थोक सब्जी बाजार की हो रही है। इस बात की शिकायत कई बार कई काॅलोनी वासियों द्वारा की जाती रही है, लेकिन होता कुछ नहीं। क्यों ?

दरअसल सिस्टम ऐसा ही है। सरकारी आदमी किसी भी विभाग का हो काम करने में दिलचस्पी नहीं होती, कमाई वाली पोस्ट हो तो कमाई का काम होता है और कमाई वाली जगह न हो हुई तो काम करने का मन ही नहीं करता।

छोटे से छोटा काम भी है तो करवाने के लिये आम आदमी को चक्कर काटने पड़ते हैं। सुराज की क्या जरूरत है ? छोटे-छोटे काम के लिये क्यों भटकना पड़ता है ? क्यों सरकार अपने लोगों को टाईट नहीं करती कि अपना काम समय पर बिना हाय तौबा मचाए करते रहें ?

नाली सफाई, गड्ढे पाटना, गलत पार्किंग जैेसे कामों के लिये भटकता क्यों है नागरिक ?

जनदर्शन का ढकोसला

सुराज की तरह ही सुशासन और जनदर्शन जैसे ढकोसले भी किये जाते हैं। विभागों में भटकने के बाद जब परेशान हाल इंसान ऐसे किसी दिखावे के चक्कर में पड़ता है तो भी उसके हाथ निराशा ही लगती है वो फ्रस्टेªशन में चला जाता है।

बड़े-बड़े कामों जैसे विभागों में रिश्वतखोरी, बिना कारण दªफ्तरों मे घुमाना, बाबूओं को अपनी सीट पर नहीं मिलना। छोटे से काम के लिये इंसान का दिन खराब हो जाना ये तो जनदर्शन या ऐसे दिखावटी प्रोग्रामों में लिये ही नहीं जाते। थर्डग्रेड के कामों के लिये भी ये आयोजन सफल नहीं हैं। निगम के लिये 1100 में फोन करने की सुविधा है पर इसमें भी बिना काम किये ही काम हो गया की घोषणा कर दी जाती है।

घूस को घूसा

याद होगा कि कुछ बरस पूर्व घूस को घूसा की घोषणा की गयी थी।इसका मतलब ये कि घूस न दें और घूस को दुत्कार दें, घूस का बहिष्कार करें। लेकिन कोई कह दे कि ऐसा हो गया तो आप लंबे समय तक हंसते रहेंगे। सिर्फ और सिर्फ दिखावा था ये।

ऐसे दिखावों से अधिकांश जनता को केवल निराशा ही हाथ लगती है और कुछ नहीं। और सरकार विज्ञापन कर-कर के खुश होती रहती है। एक बात और कि जब ये मुहिम पूरी हो जाती है तो काम के नाम पर फिर वही ढाक के तीन पात, वही पुराना ढर्रा।


जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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