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जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का निधन, दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में ली अंतिम सांस

नई दिल्ली । सत्यपाल मलिक अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतिम राज्यपाल रहे. उनके कार्यकाल के दौरान ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया था और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करके दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया गया था. संयोग की बात है कि आज ही इस फैसले की छठी वर्षगांठ है और इसी दिन सत्यपाल मलिक ने अंतिम सांस ली.
वह अक्टूबर 2017 से अगस्त 2018 तक बिहार के राज्यपाल रहे. उन्हें 21 मार्च 2018 से 28 मई 2018 तक ओडिशा के राज्यपाल के रूप में कार्य करने का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया. जम्मू-कश्मीर के दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित होने के बाद सत्यपाल मलिक को गोवा का 18वां राज्यपाल नियुक्त किया गया. उन्होंने अक्टूबर 2022 तक मेघालय के 21वें राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया.
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर
सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में 24, जुलाई 1946 को एक जाट परिवार में हुआ था. उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक और एलएलबी की डिग्री हासिल की. वर्ष 1968-69 में, मेरठ विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए, जिससे उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई. राजनेता के रूप में उनका पहला प्रमुख कार्यकाल 1974-77 के दौरान उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य के रूप में रहा. उन्होंने 1980 से 1986 और 1986-89 तक राज्यसभा में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया. वह 1989 से 1991 तक जनता दल के सदस्य के रूप में अलीगढ़ से ग9नौवीं लोकसभा के सदस्य रहे.
लोकदल छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए
सत्यपाल मलिका को 1980 में, चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले लोकदल ने राज्यसभा के लिए नामित किया. लेकिन 1984 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए और पार्टी ने उन्हें 1986 में राज्यसभा भेजा. बोफोर्स घोटाले का खुलासा होने के बाद उन्होंने 1987 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और वी.पी. सिंह के साथ जुड़ गए. 1989 में उन्होंने जनता दल के उम्मीदवार के रूप में अलीगढ़ से लोकसभा चुनाव जीता और 1990 में कुछ समय के लिए केंद्रीय संसदीय कार्य और पर्यटन राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया. 2004 में मलिक भाजपा में शामिल हो गए और बागपत से लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन तत्कालीन रालोद प्रमुख अजित सिंह से हार गए. अपने पहले कार्यकाल में, मोदी सरकार ने मलिक को भूमि अधिग्रहण विधेयक पर विचार करने वाली संसदीय टीम का प्रमुख नियुक्त किया था. उनके पैनल ने विधेयक के खिलाफ कई सिफारिश कीं, जिसके बाद सरकार ने इस प्रमुख रिफॉर्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया. कश्मीर में मिलिटेंसी शुरू होने के बाद से सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद पर नियुक्त होने वाले पहले राजनेता थे.
मोदी समर्थक से उनके कट्टर आलोचक बने
जम्मू-कश्मीर से गोवा राजभवन भेजे जाने के बाद सत्यपाल मलिक के रुख में ​परिवर्तन देखा गया और वह मोदी समर्थक से उनके सबसे बड़े आलोचक बन गए. सत्यपाल मलिक ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले घोषणा की थी कि वह रालोद और समाजवादी पार्टी का समर्थन करेंगे. बागपत स्थित अपने गांव हिसावदा में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ‘मेरा सक्रिय राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है, बल्कि मैं रालोद और सपा के मार्गदर्शक के रूप में काम करना चाहता हूं और उन किसानों के कल्याण और अधिकारों के लिए लड़ना चाहता हूं, जो मोदी सरकार की किसान-विरोधी नीतियों का शिकार हुए हैं.’
किरू हाइड्रो प्रोजेक्ट स्कैम में आया था नाम
सत्यपाल मलिक ने यह भी आशंका जताई कि चूंकि राज्यपाल पद से हटने के बाद उनकी संवैधानिक सुरक्षा नहीं रही, इसलिए उन्हें केंद्रीय एजेंसियों की जांच का सामना करना पड़ सकता है. बाद में सीबीआई ने किरू जलविद्युत परियोजना के लिए 2,200 करोड़ रुपये के सिविल वर्क के ठेके देने में कथित अनियमितताओं के संबंध में सत्यपाल मलिक और 7 अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया.
सीबीआई ने इस केस में 20 अप्रैल, 2022 को मामला दर्ज किया था. आरोप है कि चिनाब वैली पावर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (CVPPPL)की 47वीं बोर्ड बैठक में शुरू में चल रहे टेंडरिंग प्रोसेस को रद्द करने और रिवर्स ऑक्शन के साथ ई-टेंडरिंग के माध्यम से पुनः टेंडरिंग प्रोसेस का विकल्प चुनने का निर्णय लिया गया था. हालांकि, 48वीं बोर्ड बैठक में कथित तौर पर इस निर्णय को पलट दिया गया और 2019 के बैक डेट में पटेल इंजीनियरिंग को ठेका दे दिया गया.

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