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India US Trade Deal : क्या मोदी ने ट्रंप को अपनी कूटनीति से झुका दिया, क्या है टैरिफ वार के सुखद अंत का राज?

India US Trade Deal : भारत और अमेरिका के बीच 2 अप्रैल 2025 से शुरू हुआ टैरिफ वार अंतत: 2 फरवरी 2026 को समाप्त हो गया है. पूरे 10 महीने तक यह वार चला, लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे भारत ने घुटने टेकने के बजाय अपने लिए नये विकल्पों की तलाश की और आम जनता के हितों से समझौता नहीं किया. इसे एक तरह से भारतीय कूटनीति की जीत कहा जा सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी ने की टैरिफ वार के खात्मे की घोषणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात इस बात की घोषणा की कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से बात हुई है और उन्होंने इस बात पर सहमति जताई है कि अब अमेरिका मेड इंडिया प्रोडक्ट्‌स पर 18% टैरिफ ही लगाएगा. पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप की इस पहल को दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहतर बताया. उन्होंने देश की 1.4 बिलियन जनता की ओर से धन्यवाद भी दिया. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने टैरिफ कम करने के पीछे वजह यह बताया है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है.

टैरिफ कम होने को किसकी जीत माना जाए?

अमेरिका ने भारत पर लगाए टैरिफ को कम तो कर दिया है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इसके पीछे की मूल वजह क्या है. क्या भारत के पीएम मोदी की नीतियों ने अमेरिका को टैरिफ कम करने के लिए मजबूर कर दिया या फिर भारत ट्रंप के दबाव में आ गया? इन सवालों पर साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने प्रभात खबर कहा कि टैरिफ कम होने के पीछे की वजहों पर अभी बहुत स्पष्टता नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति और वहां की सरकार जिस तरह के दावे कर रही है, उसमें वे इस कदम को अपनी जीत बता रहे हैं, जबकि भारत की ओर से इसे दोनों देशों के रिश्ते को मजबूत करने वाला कदम बताया गया है. इन हालत में टैरिफ कम करने के फैसले को परिस्थिति के अनुसार लिया गया फैसला कहा जा सकता है. प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि पिछले 6–7 महीने में भारत–अमेरिका के रिश्तों में जो कुछ हुआ है, अमेरिका पर बहुत विश्वास करना भी अभी जोखिम भरा हो सकता है. सरकार को हर कदम सोच–समझकर उठाना होगा.

क्या इंडिया–ईयू डील से अमेरिका पर बना दबाव?

टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पिछले 10 महीने से खींचतान चल रही थी. अमेरिका ने बार–बार भारत पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे, लेकिन भारत ने हमेशा जनहित को ऊपर रखा और कहा कि भारत अपनी जरूरतों के अनुसार ही अपनी नीतियां तय करेगा. इस बीच भारत ने अमेरिका का विकल्प भी तलाशना शुरू किया. इंडिया–ईयू डील को इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जा सकता है. धनंजय त्रिपाठी ने बताया कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए डील से बेशक अमेरिका पर दबाव बना, इसके अतिरिक्त और भी कई वजहें हैं, जिन्होंने अमेरिका पर दबाव बनाया. जबसे अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगाया था, उसके अपने ही देश में इसका विरोध हो रहा था.

 

भारत–अमेरिका संबंधों को आगे बढ़ाने में हुई नयी शुरुआत : धनंजय त्रिपाठी

टैरिफ वार के बीच भारत–अमेरिका संबंधों में एक ठहराव आ गया था. दोनों देशों के बीच होने वाले डील पर भी रोक लग गई थी, लेकिन टैरिफ 18% होने से एक नई शुरुआत हुई है. कम से कम कुछ तो हुआ. अभी तो यह कहना कि यह भारत की जीत है, थोड़ा जल्दबाजी में दिया गया बयान होगा, क्योंकि टैरिफ होने के बाद जो कुछ हुआ है, उसमें स्पष्टता नहीं है. भारत की ओर से अभी कोई ऐसा आधिकारिक बयान नहीं है, जो यह बताता हो कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, जबकि अमेरिका इस बात के दावे कर रहा है. इन हालात में यह कहा जा सकता है कि भारत–अमेरिका संबंधों में जो कुछ पिछले कुछ महीनों से चल रहा था, उसे देखते हुए टैरिफ कम करने के फैसले को एक कदम आगे बढ़ाना कहा जा सकता है. साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि अभी इस मसले पर काफी स्पष्टता की जरूरत है.

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