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बंगाल में धीरे-धीरे खिसकती गयी ममता बनर्जी की जमीन, इस बार आखिरी दुर्ग भी ढह गया

West Bengal Election Result: अमित शर्मा, कोलकाता. 1998 में ममता बनर्जी ने करीब 26 वर्षों के कांग्रेस के नाते को तोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. तृणमूल ने 1998 में सात लोकसभा सीटों से शुरुआत की और कुछ ही वर्षों में बंगाल की मुख्य ताकत बन गयी. एक वर्ष बाद ही यानी 1999 में आठ सीटें जीतकर उसने मजबूत वापसी की. 2011 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर 184 सीट जीतकर करीब 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर दिया. 2016 में 211 सीटों के साथ यह चरम पर पहुंच गयी. 2014 लोकसभा में 42 में से 34 सीट जीतना इसका राष्ट्रीय स्तर पर सबसे उम्दा प्रदर्शन रहा. इस दौर में पार्टी का वोट शेयर करीब 45 प्रतिशत तक पहुंचा और यहां विपक्ष यानी वाममोर्चा और कांग्रेस का वर्चस्व लगभग खत्म हो गया.

आंदोलन की राजनीति से जनाधार मजबूत

सिंगूर (997 एकड़ भूमि विवाद) और नंदीग्राम (2007 में हुए भूमि आंदोलन के दौरान फायरिंग से 14 मौतें) आंदोलन तृणमूल के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुए. इन आंदोलनों ने ममता बनर्जी को ‘गरीब और किसानों की नेता’ के रूप में स्थापित किया. इसका सीधा असर 2009 और 2011 के चुनावों में दिखा, जहां ग्रामीण वोट पूरी तरह तृणमूल के पक्ष में गया.

2019 में गिरावट का पहला बड़ा संकेत

2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में 34 सीट जीतने वाली तृणमूल 2019 में 22 सीटों पर आ गयी और वोट प्रतिशत 43.28 प्रतिशत रहा. वहीं, भाजपा का उत्थान शुरू हुआ. भगवा दल दो से बढ़कर 18 सीट पर पहुंच गयी और भाजपा का वोट शेयर 10 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 40.25 प्रतिशत हो गया. इसका मतलब था कि लगभग 25 से 30 प्रतिशत वोट शिफ्ट हुआ और विपक्ष पहली बार मजबूत हुआ.

2021 में खिसकने लगी जमीन

2021 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने 215 सीट जीत कर सरकार बनायी, लेकिन भाजपा 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बन गयी. तृणमूल का वोट प्रतिशत 48.02 प्रतिशत रहा, जबकि भाजपा का 38.15 प्रतिशत रहा. पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2016 में तृणमूल ने 211 सीटें जीतीं थी, जबकि वोट प्रतिशत 44.91 प्रतिशत रहा. भाजपा ने तीन सीटें जीती थीं, जबकि वोट प्रतिशत 10.16 प्रतिशत रहा था. यानी 2021 के चुनाव में भगवा दल काफी तेजी से मजबूत हुआ और चुनाव में तृणमूल व भाजपा के वोट शेयर में अंतर सिर्फ करीब 10 प्रतिशत था. इस चुनाव में तृणमूल के अर्श से फर्श आने का सबसे बड़ा संकेत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का खुद नंदीग्राम में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से 1956 वोटों से हारना था. यानी सत्ता बची, लेकिन राजनीतिक जमीन खिसकने लगी थी.

2026 में निर्णायक हार

2026 के विधानसभा चुनाव में मतगणना के अंतिम दौर में तृणमूल लगभग 90 सीटों तक सिमट गयी, जबकि भाजपा 190 से ज्यादा सीटों के साथ आगे निकल गयी. 2021 के 215 सीट से गिरकर 90 सीट पर आना मतलब करीब 55 प्रतिशत से ज्यादा सीटों का नुकसान. यह सीधे तौर पर ‘अर्श से फर्श’ की स्थिति है.

वोट शेयर का गणित यानी असली खेल यहीं हुआ

  • 2016 विधानसभा चुनाव में तृणमूल 44.91 प्रतिशत, भाजपा 10.16 प्रतिशत
  • 2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल 43.28 प्रतिशत, भाजपा 40.25 प्रतिशत
  • 2021 विधानसभा चुनाव में तृणमूल 48.02 प्रतिशत, भाजपा 38.15 प्रतिशत

आंकड़ों से स्पष्ट है कि गत कुछ चुनावों में तृणमूल का वोट ज्यादा नहीं गिरा, लेकिन भाजपा का वोट तेजी से बढ़ा. यही कारण है कि कम वोट अंतर ने सीटों में बड़ा अंतर पैदा कर दिया. 2011 और 2016 में मुकाबला ‘वन-साइडेड’ था. 2019 के बाद मुकाबला सीधा ‘तृणमूल बनाम भाजपा’ हो गया. जैसे ही वोट एकतरफा भाजपा के पास गया, सीटों का संतुलन टूट गया.

क्षेत्रीय आधार का टूटना

राजनीति के पंडितों का मानना है कि राज्य में तृणमूल के कमजोर होने के कारणों में एक अहम वजह क्षेत्रीय आधार का टूटना भी है. मसलन गत कुछ वर्षों में उत्तर बंगाल भाजपा का गढ़ बन गया. दक्षिण बंगाल में तृणमूल की सांगठनिक पकड़ का कमजोर होना. शहरी क्षेत्रों में युवा और मध्यम वर्ग के भाजपा की ओर रुझान और ग्रामीण क्षेत्र में योजनाओं के बावजूद असंतोष. पहले जहां तृणमूल हर क्षेत्र में मजबूत थी, अब उसका आधार बिखर गया.

एंटी-इनकंबेंसी – 15 साल की सत्ता का असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2011 से 2021 तक लगातार सत्ता में रहने से स्वाभाविक नाराजगी बढ़ी. आमतौर पर पांच से 10 प्रतिशत वोट सत्ता विरोध में चला जाता है और यही वोट भाजपा के पक्ष में कंसोलिडेट हो गया.

संगठनात्मक कमजोरी और दलबदल

तृणमूल की सांगठनिक कमजोरी के कारणों में से एक नेताओं का दलबदल भी माना जा रहा है. तृणमूल के कभी ‘चाणक्य’ माने जाने वाले मुकुल राय के बाद शुभेंदु अधिकारी जैसे बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ना बड़ा झटका था. भाजपा को मजबूत कैडर और जमीनी नेटवर्क मिला और तृणमूल की संगठनात्मक पकड़ कमजोर हुई.

घोटाले और विवाद का असर

सारधा चिटफंड, राज्य के स्कूलों, नगर निकायों में नियुक्तियों के घोटाले, अवैध कोयला व बालू खनन व तस्करी, राशन वितरण घोटाला, अम्फन राहत घोटाला, संदेशखाली और आरजी कर कांड जैसे मुद्दों ने खासकर ग्रामीण और गरीब वोटरों में तृणमूल पर भरोसा कमजोर किया. राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि लक्खी भंडार, स्वास्थ्य साथी, कन्याश्री जैसी योजनाओं से लाभ जरूर मिला, लेकिन ये योजनाएं ‘एंटी-इनकंबेंसी’ को पूरी तरह रोक नहीं सकीं. वोट स्थायी रूप से नहीं जुड़ पाया.

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