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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक ..जो बात दफ्तर में हुई थी वो आज बाज़ार में है, कोई तो सुराख यक़ीनन तेरी दीवार में है।

हमारा वी वी आई पी जिला जहां ईमानदारी की बाते मिशालें दे कर सुनाई जाती है ऐसा कबीरधाम जिला इन दिनों किसी विकास मॉडल या जनकल्याणकारी योजना के कारण नहीं, बल्कि “मुसुवा मॉडल ऑफ इकॉनमिक्स फ़ॉर अर्निंग ब्लैक मनी ” के कारण देश-भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। लगभग 7 करोड़ रुपये के धान बोले तो लगभग 20 से 25 हजार क्विंटल धान को इंसानों से पहले मुसुवा द्वारा खाने को लेकर देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है । मामला छोटा नहीं है अगर यह सच है तो हमें मान लेना चाहिए कि यह कोई साधारण मुसुवा नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के झोल झाल में पीएचडी किए हुए, फाइल पढ़ने वाला, कस्टम मिलिंग ट्रांसपोर्टिंग टेंडर और सुखत के खेल को समझने वाला मौका देखकर कुतरने वाला विशेष प्रशिक्षित मुसुवा है।
शुरुआत में साहब जी और अफसर जी बड़े मौन व्रती थे। मीडिया सवाल पूछ रही थी, कैमरे माइक आगे बढ़ाये जा रहे थे, पर साहब हंसी मजाक कर रहे थे – “बिना बाईट या वर्सन के समाचार लग जायेगा क्या नही ना ? तो मैं क्यों बोलूं? ” वाले मोड में थे ।
जब तक मामला सिर्फ मुसुवा तक सीमित था । जैसे ही सवाल उठा कि “इतना धान खाने वाला मुसुवा आखिर है कौन?” और इस गैंग का सरदार मुसुवा कौन है ? कि तलाश चालू हुई तो फाइलों में हलचल मच गई, कुर्सियाँ खिसकने लगीं, नोटिस उड़ने लगे और निलंबित ऐसे किये गए जैसे अचानक प्रशासन को याद आ गया हो कि नियम नाम की भी कोई चीज होती है।
कद्दू जिसे कोहड़ा, मखना या अंग्रेजी में पम्पकिन भी कहा जाता है यह हमारे समाज में केवल सब्जी नहीं, एक सामाजिक सब्जी है। जिसे लेकर एक कहावत है कि –
“कद्दू कटेगा तो सब में बंटेगा।”
यानी जब कोई बड़ा मौका आता है, तो हिस्सेदारी सामूहिक होती है।
आजकल इसे
“बकरा कटा है तो मुहल्ले में बंटेगा।”
भी कहने लगे है । आज के समय मे बस फर्क इतना है कि बकरा जनता होती है और मुहल्ला खास लोगों को कहा जाता है।
कबीरधाम के मुसुवा कांड में भी जो हुआ, वह भी कुछ ऐसा ही है। धान सरकारी था, गोदाम सरकारी था, जिम्मेदारी सरकारी थी, लेकिन जब धान गायब हुआ तो अपराध प्राकृतिक हो गया आरोपी मुसुवा बन गया । सवाल यह नहीं है कि मुसुवा ने खाया या नहीं, सवाल यह है कि मुसुवा को चाबी किसने दी? गोदाम के ताले अपने आप नहीं खुलते, रजिस्टर खुद से नहीं बदलते और वजन अपने आप कम नहीं होता।
मुसुवा को लेकर जांच बैठेगी तो पता चल ही जायेगा कि यह अकेला नहीं था। यह पूरा मुसुवा गैंग था। अब कहीं चुप्पी, कहीं लापरवाही, कहीं मिलीभगत और कहीं “ऊपर से आदेश है” वाला जुमला सुनाई देगा । अब इस गैंग का सरदार कौन है जरूर लोगो मे चर्चा का विषय है । कद्दू कटेगा तो सब में बंटेगा वाली कहावत यहां लागू होती है । जैसे एक कद्दू की सब्जी कम से कम 30–40 लोगों का पेट भर देती है।
वैसे ही कद्दू वाली कहावत हमें यह भी सिखाती है कि जब कटने का वक्त आता है, तो सब लाइन में लग जाते हैं। यहां भी लाइन लगी है लिफाफे के वजन के जरिये मामले को दबाने और कमजोर करने की । ताकि कोई चुप रहे , कोई बच जाए , कोई निलंबित हुआ तो बहाली का जुगाड़ हो जाय और कोई पदोन्नती पा ऐश करे और जनता हमेशा की तरह थाली लेकर खड़ी राशन दुकान में कनकी युक्त चावल के लिए कतार में रहेगी और हिस्से में सिर्फ खाली कढ़ाही आएगी ।
यहां समस्या मुसुवा नहीं है, समस्या वह कद्दू है जो कटता तो है, लेकिन बंटता सिर्फ चुनिंदा हाथों में है।
मुसुवा कांड को सुन गोबरहीन टुरी कहती है महराज सुने हव दफ्तर ले भारी लिफाफा बाँटत हे साहब मन । का मुसुवा अतका ताकतवर हावय कि 7 करोड़ के धान ल अकेल्ला खा ज़ाहि । ओला त चुनाव लड़ना चाही कम से कम ईमानदारी ले खाहि बहाना तो नई बनाही ।

चलते चलते :-
मुसवा के आड़ में घपला का हिस्सा कहाँ तक पहुंचा होगा ?
और अंत में :-
जो बात दफ्तर में हुई थी वो आज बाज़ार में है,
कोई तो सुराख यक़ीनन तेरी दीवार में है।
#जय_हो 11 जनवरी 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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